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जून 21, 2011

पिता की पाती पुत्र के नाम

अनचाही दूरियों का
अनचाहा दायरा
क्या किसी दिन हटेगा,
मिटेगा?
मैं तुम्हें आँखों से छूना और
हाथों से देखना चाहता हूँ,
मुझे पता है
तुम्हारे पास सब कुछ है,
सब कुछ …यानी कि माँ है
तुम्हे नहीं पता है कि
मेरे पास भी सब कुछ है
सिर्फ तुम नहीं हो
तुम्हारा मेरे पास न होना
किस कंगाली से कम है!

काश!
वह दिन आता
मेरी बाहों में मेरा आकाश होता
यानि कि तुम होते
और,
तुम्हारे कंधों पर मेरे आँसू
अविराम गिरते,
अजस्त्र…निर्भय…
जानता हूँ कि
प्रायश्चित से ही तो
सब कुछ सामान्य नहीं हो जाता
स्वीकारोक्ति भर से ही तो
सब कुछ मान्य नहीं हो जाता
फिर भी मुझे लगता है कि-
मैं अपने अधूरेपन को पाट गया हूँ
और,
स्वयं को सही ढ़ंग से बाँट गया हूँ।

मेरी आँखों में इंतजार के
दीप जल रहे हैं
मेरे सपने
अगन की मीठी आँच में पल रहे हैं
तुम इसमें ईँधन की ज्योति
जलाये रखना
मैं तुम्हे अवश्य मिलूंगा
एक सही समय पर।

{कृष्ण बिहारी}

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