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जून 30, 2011

प्रेम से भय कैसा

प्रेम में
खोना पड़ता है
बहुत सारी बातों को
बल्कि खो देना पड़ता है खुद को ही
इस भय से
प्रेम में पूर्ण-समर्पण
न कर पाने वालों
की संख्या अनगिनत है।

सतह पर ही तैरते रहने से
जल की गहराई
नहीं आँकी जा सकती
उसके लिये गहरे पानी पैठना
ही पड़ता है।

प्रेम में होने से
भय कैसा?
मानव जीवन
का सारा लेखा-जोखा बाँच
पता यही चलता है –
चिर काल से ही
प्रेम में उत्थान पाये
अस्तित्व ही
जी पाये हैं
काल की सीमाओं को
पार कर पाये हैं।

इस अदभुत अनुभव
को जी पाने
की संभावना
से मुँह क्यों मोड़ना?

प्रेम करो
प्रेम पाओ
प्रेम में होकर ही तो
पता चलता है
कि प्रेममयी मानव
इतना सब कुछ देख, जान,
और जी सकता है
जो कभी भी संभव न हो पाता
और जीवन कितने ही अनदेखे पहलुओं से
अनभिज्ञ ही रह जाता
अगर प्रेम उसके जीवन में न आया होता।

…[राकेश]

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