Posts tagged ‘Nishan’

जून 4, 2014

आखिरी ख़त

बहुत देर से शब्द मिल नहीं रहे हैं…tum-001

खाली कुएं से तो अपनी ही आवाज़ लौटेगी न

अब किसको आवाज़ दूं?

किसको पुकारूं??

दिल का खला भरा नहीं अब तक

तेरे इंतज़ार में आँखें पत्थर हो गयीं

आवाज़ भी अपनी ग़ुम गयी जैसे

दिल के कुएं से टकरा के वापस जो नहीं आई…

सोचता हूँ कि आखिरी ख़त भी लिख रखूं

तुम इस का जवाब मत देना

मैं मुन्तजिर न रहूँगा

ये सिलसिला-ऐ-तबादला-ऐ- ख्याल रुक जाये अब

बेवज़ह गर्म ख्यालों का जवां रहना ठीक तो  नहीं

ये सिलसिला सौ नए अरमानो का वायस बनता है

ये नहीं टूटेगा तो लाजिमी दिल टूट जायेंगे

बंद करना ही होगा हर रास्ता

हर झरोखे के मुंह पे पत्थर रखना ही होगा

मुलाकात की हर वज़ह मिटानी ही  होगी

मिटाने होंगे

इस किराये के मकां के पते के निशां

कल से मैं तुम्हे नहीं मिलूँगा यहाँ…

Rajnish sign

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दिसम्बर 15, 2013

कौन समझेगा तेरे सिवा?

इस घर की हरेक दीवार पे home-001

तेरी ही उँगलियों के निशां चस्पा हैं

हरेक ईंट में सिहरन है अभी भी

तेरे छूने की…

तेरी ही रिहायश से मकां घर हुआ

दिल तो वैसे मेरा

कुछ क़तरा खूँ ‘औ

कुछ वज़न ग़ोश्त

ही ठहरा

तेरे रहने फकत ने इसे इस काबिल किया

कायनात समेटे फिरता हूँ मैं

कई तूफ़ान

कई समंदर

कई साहिल

बस एक तेरे रहने से

कौन समझेगा तेरे सिवा?

Rajnish sign

नवम्बर 5, 2013

उफ़! कभी यूँ भी तो हो

mausam1-001उफ ये जागती आँखों के सपने!

आँखों में चुभते हैं किरच किरच…

अभी देखा एक ख्वाब मैंने खुली आँखों से

देखो तो ज़रा कितना गहरा जा धंसा है…

तुम्हारा दौड़ते हुए आना मुझ तक

उलझे हुए श्यामल रेशम बाल

एक लय में उठता गिरता सीना

माथे पर चुहचुहाती बूंदे पसीने की

आरक्त गालों पर शर्म से जन्मी लाली की छटा

एक दूसरे से लडती उलझती साँसे

नशे से झुकती हुयी सी आँखे

तुम्हारा आके लिपट जाना मुझसे

फिर शर्मा के कुछ और सिमट जाना मुझमे

मेरा तुम्हे कुछ चिढाना और

तुम्हारा मुक्का बनाके डराना मुझको

देखो उस मुक्के का निशान

चस्पा है अब तक यहाँ मेरे सीने पे…

उफ़ तुम्हारा मौन निमंत्रण!

पढ़ सके जिसे मेरे लरजते होंठ…

वो जुड़ना अधरों का

वो फिसलना बाहों का

वो पोर पोर चुम्बन

वो सीने का स्पंदन

वो दो दिलों का मिल के धडकना

वो मेरा नशा नशा बहकना

न तुम्हारा कुछ सुनना

न अपना कुछ कहना

गर्म होना साँसों का

और कसना बांहों का

देखो तुम्हारे निशान

यहाँ मेरे सीने पे…

सपना जो उतरा खुली आँखों में

आओ पढ़ लो उसके गहरे धंसने के निशान

यहाँ मेरे सीने पे…

अभी भी फिर रही हैं तुम्हारी

बाहें जैसे मेरे बदन पे हर ओर

पोर पोर हैं स्पंदित अभी भी

सपना किरच किरच होने पे भी…

कभी यूँ भी तो हो कि दिल चाहे और तुम आ जाओ

पीछे से आके मेरी आँखों  को अपने हाथों से ढक

मुझे आनंद की यात्रा पर भेज दो मुझको…

स्पर्श तुम्हारे हाथों का कभी ख्वाब से निकल कर

हकीकत तो बने…

खुशबू तुम्हारे सीने की

एक बार तो आ बसे साँसों में…

कभी यूँ भी तो हो…

और कभी ऐसा भी हो

छुअन कांपते हाथों की सिमट जाए मुझमे

लरजते, थरथराते होंठों की तपन

रह जाये मेरे साथ तेरे बाद भी

मैं पा जाऊं वो सब जो अभी अभी खवाब में

तुमने दिया है मुझे…

कभी हो ऐसा भी…

(रजनीश)

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