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अप्रैल 15, 2011

निगाह में ठहरने तक

फूल पैमाना-ए-हुस्न है खिल के बिखरने तक
वो भी खूबसूरत है किसी नज़र में ठहरने तक

हर सांस के साथ इम्तेहान ले रही है जिंदगी
सौ तरह मरता है आदमी एक बार मरने तक

निगाहें साकी कुछ खास ही मेहरबान है आज
जाने कितने दौर चल गए पैमाना भरने तक

समंदर तो दिल खोले था पर तह कहाँ मिली
तैराक जन्म गवां बैठे गहराई में उतरने तक

उजाले की मौत की गवाह हैं सुर्ख होती शामें
लाखों किरणे क़त्ल हुई अंधेरे में उतरने तक

वक्त की ठोकरों में बचे रह गये कुछ पत्थर
शीशे तो चूर चूर हुए सपनो के बिखरने तक

आँखों से गिरते ही आँसूओं को मौत आ गयी
हम भी थे आलम  उस निगाह में ठहरने तक

(रफत आलम)

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