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जुलाई 24, 2017

बौनों की दुनिया …

 

हम सब बौने हैं,

मन से, मस्तिष्क से भी,

बुद्धि से, विवेक से भी,

क्योंकि हम जन हैं

साधारण हैं

नहीं हैं विशिष्ट

— क्योंकि हर ज़माना ही

चाहता है बौने रहें

वरना मिलेंगें कहाँ

वक्ता को श्रोता

नेता को पिछलगुए

बुद्धिजनों को पाठक

आंदोलनों को भीड़

धर्मों को भक्त

संप्रदायों को अतिमन्द

राज्यों को क्लर्क

कारखानों को मजदूर

तोपों को भोजन

पार्टी-बॉसों को यसमैन

राजाओं को गुलाम

डिक्टेटरों को अंधे

डिमोक्रेसी को मीडियोकर

मतवादों को बुद्धू

यूथ-वादों को सांचे ढले आदमी

हम सब उन्ही के लिए

युग-युग से जीते हैं

क्रीतदास हैं हम

इतिहास-वसन सीते हैं

इतिहास उनका है

हम सब तो स्याही हैं

विजय सभी उनकी

हम घायल सिपाही हैं

हमको हमेशा ही

घायल भी रहना

सिपाही भी रहना है

दैत्यों के काम निभा

बौने ही रहना है|

 

(गिरिजाकुमार माथुर)

 

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मार्च 30, 2014

वह जो है सबसे महान माँ…

सब माताएं महान होती हैं womanchildlabour

अपने बच्चों के लिए

वे नाना प्रकार के त्याग करती हैं

अपने बच्चों के लिए

वे अपने जीवन को

अपनी अभिलाषाओं को

काट-छांट कर सीमित बना देती हैं

अपने बच्चों के लिए

बहुत सी माताएं

छोड़ देती हैं

लाखों-करोड़ों की नौकरियां और व्यवसाय

अपने बच्चों के लिए

अपने तमाम शौक और जूनून की हद तक पाले गये शौक

भी छोड़ देती हैं कुछ अरसे के लिए

अपने बच्चों के लिए

जो कुछ भी आड़े आता है बच्चों के

सही ढंग से लालन पोषण में

वे उसे छोड़ देती हैं

पर सुरक्षित माहौल में

रहने वाली स्त्रियाँ

बेहतरीन माएँ होते हुए भी

उतनी महान नहीं होती

जितनी होती है एक कामगार गरीब माँ

वह स्त्री जो बांधकर

अपनी पीठ पर दूधमुयें बच्चे को

काम पर जाती है

पत्थर तोडती है

ईंटें धोती हैं

भांति भांति के परिश्रम करती है

ताकि अपने और बच्चे के लिए

जीविका कमा सके,

और यह कठोर परिश्रम उसे

रोज करना पड़ता है

अगर रहने का कुछ ठिकाना है तो

वहाँ से वह रोज सुबह निकलती है

 बच्चे को पीठ पर कपड़े से बाँध कर

ठेकेदार की चुभती निगाहों से गुजर कर

उस रोज की जीविका के लिए काम पाती है

बच्चे को कार्यस्थल के पास ही कहीं लिटा देती है

और काम पर जुट जाती है

और इस स्थल पर न उसकी सुरक्षा का कोई प्रबंध है

labour motherन उसके बच्चे की

पर इन् सब मुसीबतों से लड़ती हुयी

वह जीविकोपार्जन के लिए हाड तोड़ मेहनत करती रहती है

कुछ देर रोते बच्चे के पास जाती है तो

सुपरवाइजर से झिडकी सुनती है

चुनाव का वक्त होता है तो

देखती है पास से गुजरते वाहनों पर लदे नेताओं को

और सुनती है उनके नारों को

– वे उस जैसे गरीब लोगों के लिए बहुत कुछ करेंगे|

शायद उसे आशा भी बंधती हो

पर वह सब तो भविष्य की बातें होती है

वर्तमान में तो उसे रोज

जीने के लिए लड़ना है

इसलिए रोज सुबह वह अपने बच्चे को पीठ पर लाद

काम पर निकलती है

उसे जीना है

अपने बच्चे के लिए

और अपने बच्चे को जिंदा रखना है

खुद को जिंदा रखने के लिए|

उसे बीमार पड़ने तक की न तो सहूलियत है और न ही इजाज़त

चारों तरफ निराशा से भरे माहौल में भी

वह रोजाना कड़ी मेहनत करके जिए चली जाती है

घर-परिवार में रहने वाली तमाम माओं से

जिनके पास सहयोग होते हैं

तमाम तरह के

कहीं ज्यादा बड़े कद होते हैं ऐसी माओं के

यही हैं धरती पर सबसे महान माएँ!

…[राकेश]

 

 

 

 

अप्रैल 19, 2011

बगुलाभगत आये रे!

वो जो बेचते थे
जहर अब तक,
सुना है
पहने झक सफेद कपड़े
डाले गले में आला
महामारी भगाने की
अपनी क्षमता का
विज्ञापन करते
घूम रहे हैं।

भटका दिये गये थे
बहुरुपिये के स्वर्ण मृग रुपी कौशल से राम
हर ली गयी थी
साधु वेश में आये रावण के छल से सीता
दौ सौ साल लूटा
दास बनाकर भारत को
झुककर व्यापार करने की
इजाज़त लेने आये लूटेरों ने।

विदेशी लूटेरे चले गये
विशालकाय तिजोरियाँ खाली छोड़कर
पर उन पर जल्द कब्जे हो गये
वे फिर से भरी रहने लगीं
देश फिर से लूटा जाने लगा,
लूटा जाता रहा है दशकों से।

डाकुओं के खिलाफ आवाज़ें उठी
तो
छलिये रुप बदल सामने आ गये हैं
जो कहते न थकते थे
“पैसा खुदा तो नहीं
पर खुदा की कसम
खुदा से कम भी नहीं”
वे कस्में खा रहे हैं
रुखी सूखी खायेंगे
पानी पीकर
देश का स्वास्थ्य ठीक करेंगे,
भ्रष्ट हो गया है
यह देश
इसे ठीक करेंगे!

होशियार
सियार हैं ये
शेर की खाल ओढ़े हुये
सामने से नहीं
आदतन फिर से
लोगों की
पीठ में ही खंजर भोकेंगे
लोगों की
मिट्टी की
गुल्लकें
ले भागेंगे
हजारों मील दूर रखी
अपनी तिजोरियाँ भरने के लिये।

जाग जाओ
वरना ये फिर ठगेंगे
इंतजार बेकार है
किसी भगीरथ का
जो लाकर दे पावन गंगा
अब तो हरेक को
अपने ही अंदर एक भगीरथ
जन्माना होगा
जो खुद को भी श्वेत धवल बनाये
और आसपास की गंदगी भी
दूर बहा दे।

पहचान लो इस बात को
डर गये हैं कुटिल भ्रष्टाचारी
धूर्तता दिखा रहे हैं
इनके झांसे में न आ जाना
इनका सिर्फ ऊपरी चोला ही सफेद है
ये हंस नहीं
जो दूध और पानी को अलग कर दें
बल्कि ये तो बगुलेभगत हैं
जो गिद्ध दृष्टि गड़ाये हुये हैं
देश की विरासत पर।

सावधान ये करेंगे
हर संभव प्रयास
जनता को बरगलाने का
ताकि बनी रहे इनकी सत्ता
आने वाले कई दशकों तक
दबा-कुचला रहे
आम आदमी इनकी
जूतियों तले
साँस भी ले
तो इनके रहमोकरम
का शुक्रिया अदा करके।

वक्त्त आ गया है जब
इन्हे जाल में फँसा कर
सीमित करनी होगी इनकी उड़ान
तभी लौट पायेगा
इस देश का आत्म सम्मान
असमंजस की घड़ियाँ गिनने का वक्त चला गया
यह अवसर है
धर्म युद्ध में हिस्सा लेने का
जीत हासिल कर
एक नये युग का सूत्रपात करने का।

…[राकेश]

अप्रैल 3, 2011

हर पग पे लुटेरे बैठे हैं

चोर के घर मोर साहूकार के फाका है
अँधेरी है ये नगरी और चौपट राजा है

सब सफ़ेद यहाँ जो भी काला धंधा है
आ जा हाथ धोले पगले बहती गंगा है

बाढ़ जो खाए वही बागबान सयाना है
चोर चोर सब भाई कौन यहाँ मौसेरा है

लोकशाही नाम को अवाम की सत्ता है
कुर्सी का खेल बन्दर बाँट से चलता है

मलाई पर हक साहब के दलाल का है
फाइलों के तले दबा ईमानदार गधा है

ऐशगाहों की सैर कर सुबह घर लौटा है
रईसों का हर लाडला शाम का भूला है

बन्दर की बाँट से नेताओं ने सीखा है
पांच साल तू लूट आगे हिस्सा मेरा है

पसीना तो बेरोजगार भटकता फिरता है
सुगंधों का झोंका सब मौके ले उड़ता है

सब रहनुमा सियार हैं शेर की खाल में
कोई खाई है आलम तो कोई कुआँ है

(रफत आलम)

 

जून 3, 2010

खबरदार श्रीमान नेता जी

सुनो नेता जी
तुम क्यों
एक नंगे बच्चे जैसा व्यवहार करते हो
जो अपनी आँखें बंद कर लेता है
और सोचता
है कि अब उसे कोई नहीं देख रहा।

तुमने कछुआ तो देखा ही होगा
जो अपने खोल के अंदर घुस कर
छिप जाता है और
सोचता है कि खतरे से बच गया है।

तुम से किसी की सही तुलना हो सकती है तो
गिरगिट की,
जो तुम्हारी ही तरह
अपनी जरुरत के अनुसार
पल पल रंग बदलता है
पर याद रखना
एक घड़ी ऐसी भी आती है
जब उसके रंग बदलने की प्रवृति और प्रकृति भी
उसे नहीं बचा पाती।
तुम भी कितनी देर
अपने को छुपा सकते हो लोगों से?
क्या तुम समझते हो कि
इन रहस्यमयी मुखौटों के पीछे
छिपकर तुम दूर चले गये हो
लोगों की पहुँच से?
ना।
किसी समय,
एक दिन,
तुम्हारे सब मुखौटे
उतर जायेंगे
या उतार दिये जायेंगे
तुम्हारी
सारी रहस्यमयी ऐयारियाँ
दुनिया के सामने खुल जायेंगी।

तब तुम खड़े होगे नंगे
दुनिया के सामने
अपने अपराधों के
बोझ से दबे हुये।

कुछ कारीगरी काम न आयेगी तब,
भ्रष्टाचारी तो जगह जगह चौराहों पर
दौड़ते नजर आयेंगे।

खुदा न खास्ता वहाँ से भी किसी
तरह तुम बच कर निकल लिये
तो तब क्या करोगे
जब चार कँधों पर जाने की
तैयारियाँ चल रही होंगी।

तुम्हारे किये का फल
तुम्हारी पुश्तें भोगेंगी।

बाकी तुम्हारी मर्जी।
तुम्हारा जीवन है
तुम्हारा सिर
जूते तो चलने ही हैं
बच सको तो बच लो।

समय तो है अभी भी संभलने का
समझ लो इस बात को कि
जमाना बड़ा अच्छा हो चला है
अच्छा करके ही
अच्छे जीवन का बीमा करा सकते हो अपनी
अगली पीढ़ी के लिये !

…[राकेश]

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