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सितम्बर 12, 2011

प्रीत मुझे पहचानेगी ही

आज नहीं तो कल ये दुनिया मेरे सच को जानेगी ही
लाख गलत तुम कहो मुझे पर तुम्हे गलत वो मानेगी ही

ऐसा कोई दिन जीवन में
अब तक तो मेरे ना आया
संग मेरे तस्वीर तुम्हारी
नहीं रही हो बनकर छाया
मैं हर पल बैचेन रहा जब रुह खाक तो छानेगी ही
आज नहीं तो कल ये दुनिया मेरे सच को जानेगी ही

दोषी सरे आम तुम मुझको
जी चाहे अब कहो जहाँ पर
मैं तो लेकिन साँस आखिरी
लूँगा, नाम तुम्हारा लेकर
हर अवगुन भी यहाँ तुम्हारे मेरी प्रीत बखानेगी ही
आज नहीं तो कल ये दुनिया मेरे सच को जानेगी ही

तू मुझमें मैं तुझमे लय तय था
जीवन, जीवन से परिचित था
फिर अब मुझको तुम्ही बताओ
यह संबंध कहाँ अनुचित था
चलो भरम भी टूट गया ये प्रीत मुझे पहचानेगी ही
आज नहीं तो कल ये दुनिया मेरे सच को जानेगी ही

याद आज भी वह आती है
जब घड़ियाँ गिनते थे
ऐसे नहीं, रहेंगे ऐसे –
कड़ियां सपनों में बिनते थे
आधी रात नींद जो टूटी बैर सुबह तक ठानेगी ही
आज नहीं तो कल ये दुनिया मेरे सच को जानेगी ही

{कृष्ण बिहारी}

मई 11, 2011

हुस्नेमुजस्सम

खुशबू कहाँ हूँ मैं जो गुलाब छू लूँ
चाह थी पलकों से तेरे ख्वाब छू लूँ

जिंदगी सकून देने का वादा तो कर
तौबा मेरी जो फिर जामेशराब छू लूँ

बिन पढ़े ही सीख जाऊँ सबके इश्क
आँखों से जो हुस्न की किताब छू लूँ

इश्क की आग में शमा पर जलता हूँ
पतंगा बोला चाहूँ तो अफताब छू लूँ

तुम्हारी याद के सहारे नींद आ जाए
ख्वाब में आओ तुम तो ख्वाब छू लूँ

सहरा की दरियादिली भी परखी जाए
प्यास की जिद है आज सराब छू लूँ

किस्मत में काँटों की चुभन लिखी है
दिल फिर भी चाहता है गुलाब छू लूँ

कौन देख सका हुस्नेमुजस्सम आलम
मेरी कहाँ है मजाल जो नकाब छू लूँ

(रफत आलम)

अफताब                   – सूर्य,
सहरा                       – मरुस्थल,
सराब                       – मरीचिका,
हुस्नेमुजस्सम         – साक्षातसौंदर्य (ईश्वर)

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