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जनवरी 14, 2014

रूह और जिस्म

जिस्म मिलते हैं तो रूहें मिलती हैं…akhiri-001

या रूहें मिलती हैं तो जिस्म…

रूह और जिस्म जुदा नहीं कभी

एक के बिना दूसरे का मरण तय

रूह और जिस्म के इस झंझट में

कौन तय करे…

कौन ऊपर

कौन नीचे…

रूह अगर मरती नहीं

तो जिस्म चुकते ही क्यों अपने

अस्तित्व को खो देती है?

मरना ही तो हुआ?

जिंदा अगर यादों में रहने को भी कहते हैं

तो जिस्म तेरा मेरी यादों में

न सिर्फ जिंदा है…

जवान भी है…

हर चेहरे में…

तेरे जैसे रंग में

Rajnish sign

दिसम्बर 13, 2013

तुम्हारी पीड़ा

morgan-001तुम्हारी पीड़ा

आसुंओं को अंतर में पी लेने की विवशता है

कायरता का श्राप पाए पुरुष में

अनिश्चय के भंवर में डूबते नर में,

कोमल ह्रदय के स्वामी मानव में

अपनी सार्थकता तलाशने की पीड़ा है|

शब्दों को छल के लिए उगालना

योग-संयोगों से अर्थ बदलना

आत्मसंतुष्टि हेतु ओढें कर्त्तव्य

तुम्हारी पीड़ा

गहनतम भाव समझ कर अंजान बनने की पीड़ा है|

क्या देता है जगत जीव को

क्या लेता है जगत जीव से

क्या सार्थकता, क्या श्रेष्ठता

आखिर क्या है, पराकाष्ठा?

तुम्हारी पीड़ा

चादर के चारों कोने तलाश न कर पानी की पीड़ा है|

सहज सजीली राह छोड़कर

ऊंचे – नीचे,

दुर्गम पथ की चोटी को तकना

तकना, उतरना, चढ़ना सबकी भूलभुलैया

तुम्हारी पीड़ा,

भीड़ में गुम होने के डर की

पीड़ा है!

राग-मोह-शान्ति-खुशी-द्वेष-दर्प

क्रोध-स्नेह-प्रलाप-जीवट-विवशता

चक्रव्यूह पर चक्रव्यूह से घिरे हुए

तुम्हारी पीड़ा

द्वार न तोड़ पाने की

पीड़ा है!

Yugalsign1

नवम्बर 20, 2013

लोअर माल रोड

आडू बेचता युवकfruit-001

खूब मोलभाव करता है-

चिथड़े कपडे,

तन मैला,

मेरी आँखों के दर्पण में :

अनरोमांटिक,

सुबह से शाम तक

ठण्डी सी इस सड़क के उजले कोने में|

अब,

उसकी बीवी

पास आ बैठ गई है

सहेजती है आड़ू

लाल-लाल ऊपर

पीली रंगत नीचे|

सड़क पर आवाजाही नहीं है

किसी गिरफ्तारी के विरोध में

बंद है बाजार

सन्नाटा है परसा,

हर ओर,

और उनके बीच भी|

Yugalsign1

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