Posts tagged ‘NDTV’

अक्टूबर 29, 2014

गरीब की “छठ” और भारतीय रेल : रवीश कुमार (NDTV)

Chhathये कौन सा भारत है जहां पखाने में लोग बैठकर अपना सबसे पवित्र त्योहार मनाने घर जा रहे हैं। क्या हम इतने क्रूर होते जा रहे हैं कि सरकार, राजनीति और समाज को इन सब तस्वीरों से कोई फर्क नहीं पड़ता। हर राज और हर साल की यह तस्वीर है। राजनीति और सरकार की समझ पर उस खाते पीते मध्यम वर्ग ने अवैध कब्ज़ा कर लिया है जो ट्वीटर और फेसबुक पर खुद ही अपनी तस्वीर खींच कर डालता हुआ अघाए रहता है। जो अपनी सुविधा का इंतज़ाम ख़ुद कर लेता है। लेकिन रेल आने से घंटों पहले कतार में खड़े उन ग़रीबों की कोई सेल्फी कहीं अपलोड नहीं हो रही है जिनकी आवाज़ अब सिस्टम और मीडिया से दूर कर दी गई है। ये बिहारी नहीं हैं। ये ग़रीब लोग हैं जो छठ मनाने के लिए दिल्ली या देश के अन्य हिस्सों से बिहार जाना चाहते हैं। हर साल जाते हैं और हर साल स्पेशल ट्रेन चलाने के नाम पर इनके साथ जो बर्ताव होता है उसे मीडिया भले न दर्ज करे लेकिन दिलों दिमाग़ में सिस्टम और समाज के प्रति तो छवि बन रही है वो एक दिन ख़तरनाक रूप ले लेगी। साल दर साल इन तस्वीरों के प्रति हमारी उदासीनता बता रही है कि देखने पढ़ने वाला समाज कितना ख़तरनाक हो गया है। वो अब सिर्फ अपने लिए हल्ला करता है, ग़रीबों की दुर्गति देखकर किनारा कर लेता है।

न्यूज़ चैनलों पर जो तस्वीरें दिखाईं जा रही हैं उन्हें ध्यान से देखिये। दस बारह लोग उस शौच में किसी तरह ठूंसे पड़े हैं। नीचे से लेकर ऊपर की सीट भरी पड़ी है। चलने के रास्ते पर लोग बैठे हैं। आदमी की गोद में आदमी बैठा है। आदमी की गोद में औरत बैठी है और औरत की गोद में बच्चा। बच्चे किसी तरह ट्रेन की बोगी में घुस गए हैं और वे वहीं कहीं घुसिया कर खड़े हैं। कोई शौचालय तक के लिए नहीं उठ सकता। पिछले साल कई लोगों ने बताया था कि चौदह पंद्रह घंटे हो जाते हैं शौचालय गए। पुरुष और औरतें दोनों बीमार पड़ जाते हैं। कुछ लोग वहीं बैठे बैठे बोतल में पेशाब करने के लिए मजबूर हो जाते हैं। बच्चों की हालत का अंदाज़ा कीजिए और बस एक मिनट के लिए समझ लिए कि आपके बच्चे के साथ ऐसा हुआ हो तब आपकी क्या प्रतिक्रिया होगी। किसी तरह घुट घुट कर लोग सफर करने के लिए मजबूर किये जा रहे हैं।

आपके मन में यह ख़्याल आ रहा होगा कि इतनी आबादी हो गई है कि क्या किया जाए लेकिन आबादी के कारण मध्यम वर्ग को तो ऐसी सज़ा नहीं भुगतनी पड़ती है। कुहासे के कारण दो चार फ्लाईट देर से चलने लगती है तो सारे न्यूज चैनलों पर लाइव कवरेज़ होने लगता है। लोग अपनी सेल्फी भेजने लगते हैं कि एयरकंडिशन एयरपोर्ट पर दो घंटे से बैठे हैं। रेल तो रोज़ दो चार घंटे चलकर पहुंचती रहती है। कोई शोर नहीं होता बस बुलेट ट्रेन का ख़्वाब परोस दिया जाता है। एक बुलेट ट्रेन की लागत में कितनी धीमी रफ्तार की ट्रेनें राजधानी में बदल जाएंगी  इसका हिसाब मध्यमवर्ग नहीं करेगा क्योंकि इससे ग़रीबों को लाभ होगा। आख़िर क्यों इन तस्वीरों को हिन्दी न्यूज़ चैनलों के भरोसे छोड़ दिया गया। अंग्रेज़ी के अख़बार लोगों की इन तकलीफों से क्यों दूर रहे। क्यों मध्यमवर्ग ने हंगामा नहीं किया कि देखो ये मेरा इंडिया है। पहले इसे देखो इसे कितनी तकलीफ हो रही है। रविवार शाम प्रधानमंत्री कई सांसदों के साथ चाय पी रहे थे। सबको सही सलाह दी कि लोगों के बीच जाइये। गांवों में जाइये। यह बात तो सही है और यही होना भी चाहिए लेकिन क्या उनके रेल मंत्री उस वक्त प्लेटफार्म पर थे जब लोग मल मूत्र के कमरे में ठूंस कर सफर करने के लिए मजबूर हो रहे थे। उनकी पार्टी या किसी भी पार्टी का कोई सांसद था जो इन लोगों की तकलीफ के वक्त साथ हो।

ट्रेनों में ठुसाएं हुए इन लोगों की तस्वीरों को फिर से देखियेगा। किसी के चहरे पर रौनक नहीं है। किसी का कपड़ा महंगा नहीं हैं। चेहरे पर थकान है। हताशा है और ठगे जाने की हैरत। बच्चों के कपड़े लाल पीले रंग के हैं जो हम जैसे मध्यमवर्गीय कुलीन लोग पहनाना भी पसंद न करें। कोई मां किसी तरह तीन चार महीने के बच्चे को कलेजे से लगाए किसी की गोद में बैठी थी। ये वो लोग हैं जिनसे दिल्ली ,लुधियाना और सूरत का काम चलता है। ये जीने भर कमा लेते हैं और साल में एक बार घर जाने भर बचा लेते हैं। अचनाक असहाय ग़रीबों की तस्वीरों से टीवी का स्क्रीन भर गया लेकिन उस अनुपात में नहीं जिस अनुपात में भरना चाहिए। सबको पता है इनके पास अखबारों की खबरें छांट छांट कर पढ़ने और सत्ता के खेल को समझने का वक्त नहीं है। ये वो लोग हैं जो चुनाव के वक्त प्रबंधन और नारों से हांक लिये जाते हैं। महानगरों के मध्यमवर्ग को इनकी सूरत ठीक से देखनी चाहिए। ये वही लोग हैं जिनके सामने वो अपने रोज़ाना के काम के लिए गिड़गिड़ाता है। सारा दिन काम कराकर दिवाली की बख्शीश के नाम पर ठीक से पचास रुपये भी नहीं देता। फिर भी एक करीब का रिश्ता तो है इनसे लेकिन ऐसा कैसे हो रहा है कि हम देखकर चुप हो जा रहे हैं।

दुनिया में जब तक गरीबी रहेगी तब तक बहुत से लोग जाते रहेंगे। इनका घर जाना इस बात का ज़िंदा प्रमाण है कि तमाम घोषणाओं के बाद भी ग़रीबी है और गर्वनेंस के तमाम दावों के बाद भी सिस्टम इनके प्रति सहानुभूति नहीं रखता। अचानक कहीं से बजबजाकर निकल आए इन लोगों की तस्वीर कुछ वक्त के लिए टीवी पर छा गई है। फिर धीरे धीरे गायब हो जाएगी और यही लोग तमाम बड़ी कंपनियों की कामयाबी के किस्से में ठेके के मज़दूर बनकर बिला जाएंगे। इनके रहने की जगह और ट्रेन के उस शौचालय में कोई फर्क नहीं जिसमें वे ठूंस ठूंस कर भरे जा रहे हैं। जिन झुग्गियों में ये रहते हैं आप एक बार वहां जाएं तो पता चलेगा। बल्कि पब्लिक स्कूल बच्चों को नहीं ले जाते तो आप अपने बच्चों को इन झुग्गियों में लेकर जाइये ताकि बच्चे के साथ साथ आप भी संवेदनशील हो सकें कि आपके उस इंडिया का नागरिक किन हालात में रहता है जो इंडिया चीन और अमरीका को हराने निकला है। वैसे चीन और अमरीका में भी ग़रीबों को ऐसे ही हालात में रहना पड़ता है। अगर सिस्टम इन ग़रीबों के प्रति उदार नहीं हुआ तो एक दिन ये बुलेट ट्रेन पर भी इसी तरह कब्ज़ा कर लेंगे। वो मिडिल क्लास को ठेल कर अपने आपको हर उन खांचों तक में ठूंस देंगे जिनमें मध्यमवर्ग का नया सेल्फी क्लास मल मूत्र त्याग करता है। छठ की इस यात्रा की ये तस्वीरों हम सबके लिए शर्मनाक प्रसारण है।

आजकल कई लोग पूछते हैं कि सबको छठ पर जाने की क्यों पड़ी है। छठ में हम इसलिए जाते हैं ताकि जो घर ख़ाली कर आए हैं उसे फिर से भर सकें। छठ ही वो मौका है जब लाखों लोग अपने गांव घर को कोसी की तरह दीये और ठेकुए से भर देते हैं। गांव गांव खिल उठता है। इस खुशी के लिए ही वो इतनी तकलीफदेह यात्राएं करते हैं। छठ गांवों के फिर से बस जाने का त्योहार है। आप जाकर देखिये गांवों में कहां कहां से लोग आए होते हैं। हिन्दुस्तान का हर हिस्सा बिहार में थोड़े दिनों के लिए पहुंच जाता है। हम बिहारी लोग छठ से लौट कर कुछ दिनों बाद फिर से ख़ाली हो जाते हैं। छठ आता है तो घर जाने के नाम पर ही भरने लगते हैं। इसलिए इस मौके पर घर जाने को कोई दूसरा नहीं समझेगा। किसी समाजशास्त्री ने भी अध्ययन नहीं किया होगा कि क्यों छठ के वक्त घर आने का बुलावा आता है। सबको पता है बाहर की नौकरी और ज़िंदगी एक दिन इस रिश्ते को कमज़ोर कर देगी फिर सबकुछ हमेशा के लिए छूट जाएगा। छठ ही वो आख़िरी गर्भनाल है जो इस रिश्ते को छूटने नहीं देता। साल में एक बार घर बुला लेता है। जो नहीं जाते हैं वो भी छठ में घर ही रहते हैं। मैं नहीं जा रहा हूं लेकिन मेरा सिस्टम अपने आप किसी वाई फाई की तरह बिहार के गांव घरों से कनेक्ट हो गया है।

 

(रवीश कुमार)

साभार – प्रभात खबर,  एवं रविश कुमार का ब्लॉग “कस्बा”

Advertisements
अप्रैल 30, 2014

ध्रुवीकरण के धुरंधर – रवीश कुमार (NDTV)

Muslim tirangaमुसलमान एक तरफ़ जाएगा तो उसके ख़िलाफ़ हिन्दू दूसरी तरफ़ जाएगा। इससे मिलता जुलता विश्लेषण आप टीवी पर ख़ूब सुनते होंगे। मतदान की आती तस्वीरों के साथ टीवी स्टुडियो में बैठे जानकार किस आधार पर यह बात कह रहे होते हैं समझना मुश्किल है। हमारी राजनीति में धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण एक तथ्य है मगर यह मिथक भी है। ध्रुवीकरण सतही और सामान्य व्याख्या का ऐसा औज़ार हो गया है जिसके सहारे जानकार एक मतदाता को साम्प्रदायिक रंग से पेंट कर देते हैं। इसी के साथ एक और मिथक की रचना करने लगते हैं। ‘टैक्टिकल वोटिंग’ का मिथक। क्या अन्य जाति धर्म समूह इस तरह से वोटिंग नहीं करते अगर करते हैं तो क्या वो इस कथित टैक्टिकल वोटिंग के जैसा ही है।

एक साइड मुसलमान तो दूसरी साइड हिन्दू। ऐसा लगता है कि स्टुडियो में बैठे जानकार एक ख़ास समुदाय की तरफ़ इशारा कर रहे हैं कि मुसलमान एकजुट हो रहे हैं । भाजपा के ख़िलाफ़ एकजुट हो रहे हैं लिहाज़ा स्वाभाविक रूप से हिन्दुओं को भी भाजपा के पक्ष में एकजुट हो जाना चाहिए। अख़बारों में भी ऐसी बातें ख़ूब लिखी जा रही हैं। कई बार लगता है कि एक रणनीति के तहत ऐसा किया जा रहा है। मतदान प्रक्रिया का एक अदना सा एक्सपर्ट भी जान सकता है कि कुछेक अपवादों को छोड़ सामान्य रूप से यह बात सही नहीं है। कई बार लगता है कि चुनाव के समय ऐसे विश्लेषणों के सहारे समाज में साम्प्रदायिकता को भड़काने का काम किया जाता है।

क्या हिन्दू हमेशा यह देखकर वोट देता है कि मुसलमान किस तरफ़ वोट दे रहा है या मुसलमान यह देखकर वोट देता है कि हिन्दू किस तरफ़ देता है । इसका वैज्ञानिक आधार क्या है। हर चुनाव में मुस्लिम मतदाता को ब्रांड करने का खेल खेला जाता है। जैसे उसकी अपनी कोई आकांक्षा नहीं है और वो सिर्फ मुसलमान बनकर वोट करता है। अगर ऐसा होता तो यह बात सही होती कि एक आम मुस्लिम मतदाता इमाम बुख़ारी जैसे धर्मगुरुओं के कहने पर ही वोट कर देता। किसी भी चुनाव का आँकड़ा देखेंगे तो यह ग़लत साबित होता है। आम मुस्लिम मतदाता बड़े आराम से मतदान के फ़ैसले में मुल्ला मौलवियों की दख़लंदाज़ी को पसंद नहीं करता। खुलकर बोलता भी है लेकिन मीडिया ऐसे धर्मगुरुओं के बहाने मुस्लिम मतदाताओं का सांप्रदायिकरण करता रहता है।

इसी संदर्भ में एक और बात कहना चाहता हूँ। बाबा रामदेव जैसे कई योग गुरु और धर्मगुरु भी तो किसी पार्टी के लिए वोट मांगते हैं। इमाम बुख़ारी का अपील करना साम्प्रदायिक और बाबा रामदेव या शंकराचार्य का अपील करना राष्ट्रभक्ति। कैसे? मैं दोनों की तुलना नहीं कर रहा लेकिन मूल बात यह है कि सभी प्रकार के मज़हबी नेता चुनाव के वक्त सक्रिय होते हैं। कोई आशीर्वाद के नाम पर इनके पास जाता है तो कोई अपने भाषणों में देवी देवताओं के प्रतीकों का इस्तमाल करके धर्म का इस्तमाल करता है। खुद को ईश्वर का दूत बताना क्या है।

आम मतदाता को इससे सचेत होने की ज़रूरत है। यह भी ध्यान में रखने की बात है कि हमारे तमाम धर्मों के गुरुओं का समाज से गहरा नाता होता है। झट से उनके किसी राजनीतिक आचरण को साम्प्रदायिक क़रार देने से पहले देखना चाहिए कि वे क्यों ऐसा कर रहे हैं। उनका आधार सांप्रदायिक है धार्मिक है या राजनीतिक। अगर विरोध करना है तो एक साथ डेरों, मठों, मस्जिदों की राजनीतिक दख़लंदाज़ी का विरोध कीजिये।

मैं फिर से लौटता हूँ अपनी मूल बात पर। तमाम अध्ययन बताते हैं कि मुस्लिम मतदाता अपनी पसंद के हिसाब से अलग अलग राज्यों में अलग अलग पार्टी और नेता को वोट करता है। मुसलमान एक नहीं कई दलों को वोट करने के साथ साथ बीजेपी को भी वोट करता है। मध्यप्रदेश राजस्थान और गुजरात में भी करता है। हो सकता है कि प्रतिशत के लिहाज़ से कम हो लेकिन आप यह भी तो देखिये कि बीजेपी ने इन राज्यों में लोकसभा के चुनावी मैदान में कितने मुस्लिम उम्मीदवार उतारे हैं। उत्तर प्रदेश में कितने उतारे हैं। पिछले लोक सभा चुनाव में बीजेपी को पचीस छब्बीस प्रतिशत मत मिले थे शेष और पचहत्तर फ़ीसदी मत अन्य दलों को। अगर हिन्दू वोट जैसा कुछ होता तो बीजेपी को पचहत्तर फ़ीसदी वोट मिलते। जो हिन्दू बीजेपी को वोट नहीं करते उनके न करने के आधार क्या हैं। हमारे ये जानकार हिन्दू मतदाताओं के विवेक के साथ भी अन्याय करते हैं। मतदाताओं का अति हिन्दूकरण कर साम्प्रदायिक रंग देते हैं।

चलिये इस बात को एक और तरीके से देखते हैं। हर समुदाय या जाति के लोग अपने उम्मीदवारों को वोट देते हैं। इसी आधार पर कांग्रेस बीजेपी सब अपने उम्मीदवार तय करते हैं। तब भी बीजेपी को हराने के लिए मुसलमान किसी मुसलमान उम्मीदवार को वोट नहीं करता है। वो उसी दल या उम्मीदवार को वोट करेगा जिसके पास पर्याप्त वोट हो। यह वोट कहाँ से आता है। कथित रूप से हिन्दू समाज से ही न। तो यह बात कैसे उचित ठहराई जा सकती है कि हिन्दू एक तरफ़ जाते हैं और मुस्लिम दूसरी तरफ़ । क़ायदे से तो एक दूसरे की पार्टी को हराने के लिए दोनों मिल-जुल कर एक दूसरे के ख़िलाफ़ गोलबंद होते हैं। इसके बाद भी सारे मुसलमान किसी एक व्यक्ति या दल को वोट नहीं करेंगे।

मुसलमानों को कथित रूप से बीजेपी के ख़िलाफ़ पेश किये जाने के बाद भी जानकार जानते हैं कि वे कहीं भी एकमुश्त वोटिंग नहीं करते। यह संभव भी नहीं है। ऐसा होने लगा तो समझिये कि मुस्लिम समाज के भीतर आपसी टकराव ही समाप्त हो जायें। आप भी जानते हैं कि मुसलमानों के बीच अगड़े पिछड़े और दलित मुसलमानों के हक़ को लेकर ज़बरदस्त टकराव है। पिछले दिनों कई राज्यों में जैसे उत्तर प्रदेश, केरल और असम, मुस्लिम दलों का उदय हुआ है क्या ये सभी बीजेपी के ख़िलाफ़ उभरे हैं? नहीं। इनसे चुनौती कांग्रेस सपा बसपा लेफ़्ट को भी मिलती है।

इसीलिए जानकारों को ध्रुवीकरण की बेहद सतही और ख़तरनाक व्याख्या से बचना चाहिए। बनारस में नरेंद्र मोदी जब अपने नामांकन के लिए जा रहे थे तो उस भीड़ में भी कैमरे मुसलमान ढूँढ रहे थे। उनका क्लोज़ अप दिखा रहे थे। मुझे इस बात से आपत्ति है। क्या कैमरे उस भीड़ में शामिल अन्य लोगों को भी उसी निगाह से देख रहे थे। अगर नहीं तो फिर एक या दो मुसलमान की तलाश क्यों हो रही थी। तब भी जब नरेंद्र मोदी के साथ मुख़्तार अब्बास नकवी नज़र आ रहे थे। बीजेपी भले हिन्दुत्व या संघ के कहने पर चले पर उसे मिलने वाला हर वोट इसके लिए नहीं मिलता। बीजेपी के कार्यकर्ता चाहें जितना हिन्दुत्व के रंग रूप में ढल कर आक्रामक हो जायें उनकी पार्टी को मिलने वाला हर वोट हिन्दू वोट नहीं है। ज़्यादातर दलित मतदाताओं को खुद को इस पहचान से जोड़ कर देखे जाने से आपत्ति हो सकती है जबकि हो सकता है कि वो वोट बीजेपी को दें।

हमें जनमत का साम्प्रदायिकरण नहीं करना चाहिए। सांप्रदायिकता और ध्रुवीकरण हमारी राजनीति की ख़तरनाक सच्चाई है लेकिन ऐसा हर जगह किसी एक फ़ार्मूले के तहत नहीं होता कि मुसलमान इधर गए तो हिन्दू उधर चले जायेंगे । कई बार लगता है कि जानकार मुस्लिम मतदाताओं का मज़हबी चरित्र चित्रण करते हुए ग़ैर मुस्लिम मतदाताओं को इशारा कर रहे होते हैं कि उन्हें वोट कहाँ देना चाहिए।

(रवीश कुमार)

अप्रैल 30, 2014

शहीद कैप्टन विक्रम बत्रा की माँ का पत्र नरेंद्र मोदी के नाम

CaptBatraMom69 वर्षीय कमल कांत बत्रा, हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर से लोकसभा का चुनाव “आम आदमी पार्टी” के टिकट पर लड़ रही हैं| श्रीमती बत्रा, ने पाकिस्तान द्वारा भारत पर जबरदस्ती थोपे गये कारगिल युद्ध में अपने 24 वर्षीय बेटे कैप्टन विक्रम बत्रा को खोया था| शहीद होने से पहले NDTV को दिए साक्षात्कार में विक्रम बत्रा द्वारा कहा गया जुमला ” ये दिल मांगे मोर” उस समय भारतीय सेना का उत्साह बढाने के लिए चलाये जा रहे कार्यक्रम का नारा बनकर बहुत प्रसिद्द हो गया था|

श्रीमती बत्रा ने भाजपा के पीएम उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के नाम खुला पत्र लिखा है|

प्रिय श्री मोदी जी,

आपने अपने चुनाव प्रचार में मेरे शेर बेटे का नाम और उसका नारा – ये दिल मांगे मोर, इस्तेमाल किया है| लोग मेरे बेटे को कारगिल का शेर शाह कहते हैं| जसी समय वह कारगिल युद्ध में शहीद हुआ तब उसकी आयु मात्र 24 साल की थी|

अब आप विक्रम का नाम और उसका नारा इस्तेमाल कर रहे हैं| मुझे आपसे पूछना है कि 1999 से अब तक 15 सालों में न तो आपने न ही भाजपा को न मेरे बेटे की याद आयी न उसके नारे की| अब चुनाव में आपको अचानक ही यह सब याद आ गया और चुनावी फायदे के लिए आपने एक वीर सैनिक की शहादत का सहारा लेना शुरू कर दिया|  यह भ्रष्ट राजनीति का नमूना है|

 

श्री मोदी जी, अगर आप सेना और उसके शहीदों का सम्मान करते हैं तो शहीदों के परिवार आपके लिए ईश्वर के समान होते| अगर मैं आपकी जगह होती तो शहीद के परिवार के नुमाइंदे के खिलाफ खड़े भाजपा उम्मीदवार को चुनाव मैदान से हटने के लिए कहती|

अगर आपके दिल में कैप्टन बत्रा के परिवार के लिए सम्मान है तो आपको याद रहता कि मैं विक्रम की माँ हूँ| मेरे बेटे की प्रशंसा करते हुए “ये दिल मांगे मोर” कहते हुए आपको स्मृति में रहता कि शहीद के परिवार को सम्मान देने के लिए क्या किया जा सकता है|

ऐसा क्यों है कि भाजपा ने कभी भी शहीदों के परिवारजनों को टिकट नहीं दिये?

मेरे लिए यह व्यक्तिगत लड़ाई नहीं है, यह किसी एक व्यक्ति के खिलाफ लड़ाई नहीं है| यह भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई है| लोगों को भष्टाचार से निजात चाहिए|

सारा भारत विक्रम बत्रा को जानता है|

कुछ गाँवों में आम आदमी पार्टी के स्वयसेवकों ने लगों से मेरे लिए कहा,” ये शहीद विक्रम बत्रा की माँ हैं”| इसमें क्या गलत है? विक्रम ने देश के लिए अपनी जान कुर्बान की| उसे गर्व होगा जानकार कि मैं भी उसकी भांति देश सेवा करने उतरी हूँ| क्या मेरे बेटे का नाम मुझसे अलग किया जा सकता है? मेरा नाम मेरे बेटे के साथ आएगा और मेरे बेटे का नाम मेरे साथ जुड़ा रहेगा| कोई इस सत्य को झुठला नहीं सकता|

इस लोकसभा के चुनाव प्रचार में आपका नाम हर जगह है|

आपको ज्ञात होना चाहिए कि केवल अरविंद केजरीवाल की पार्टी ने हमें इस तरह सम्मान देने के बारे में सोचा| उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मैं चुनाव लड़कर लोगों की सहायता करना चाहूंगी?

मैं केवल एक स्त्री ही नहीं बल्कि भारतीय नागरिक भी हूँ| मेरा अधिकार है राजनीति में प्रवेश करने का| हर भारतीय नागरिक का अधिकार है यह|

जब आम आदमी पार्टी ने मुझसे हिमाचल प्रदेश से चुनाव लड़ने का अग्राह किया मैं इंकार नहीं कर पाई| उनके आग्रह में सच्चाई की ताकत थी|

और दलों ने हमें बुरी तरह निराश किया है|

भवदीय,

कमल कांत बत्रा

अप्रैल 22, 2014

गुजरात का विकास : मोदी से बहुत पहले की कहानी है!

(Reetika Khera, Assistant Professor, Humanities and Social Sciences department, IIT-Delhi)

मेरी ही उम्र का एक सोलह साल का लड़का पटना से बड़ोदा आया, जो कि मेरा शहर था| उसके लिए बड़ा ही आश्चर्यजनक यह देखना कि बड़ोदा में बिजली नियमित रूप से रहती थी| सड़कें बहुत अच्छी थीं| महिलायें देर रात्री में भी सड़कों पर दिखाई दे जाती थीं, अकेली जाती हुयी या दोपहिया वाहन पर, आकर्षक कपड़े पहने हुए, बैकलेस चोली पहने हुए गरबा करती हुयी… उसे अपनी आँखों पर विश्वास नहीं होता था| मैंने कभी बिहार नहीं देखा था अतः मेरे लिए अचरज भरा था उसका यूं आश्चर्यचकित रह जाना|

एक और समय, जब मेरे पिता अपने व्यापार के सिलसिले में पंजाब के दौरे पर ज रहे थे| ट्रेन में उन्हें एक पंजाबी व्यापारी मिले, और दोनों व्यापार में लाभ की बातें करने लगे| जब मेरे पिता ने उनसे बिजली के बिल के बारे में बताया तो वे सज्जन अचरज में पड़ गये और बोले,” आप को बिजली का बिल देना पड़ता है तब लाभ कैसे होता है?” ऐसा सुनकर मेरे पिता को भी उतना ही आश्चर्य हुआ जैसा मुझे पटना से आए लड़के की बातों से हुआ था|

ये दनों घटनाएं 1989 की हैं| आजकल दूसरे प्रदेशों से गुजरात में पहली बार जाने वाले लोग ऐसे ही आश्चर्यचकित होकर बातें करते हैं जैसे बिहार से आआ हुआ 16 वर्षीय लड़का करता था| वास्तव में गुजरात में नियमित बिजली आपूर्ति, अच्छी सड़कें, विकसित होता उधोग जगत, अच्छे सरकारी स्कूल, मिड-दे मील (1984 से सुचारू रूप से चल रहा है), आंगनवाडी (बालवाड़ी), राज्य परिवहन की बसें, और जनहित के बहुत से कार्यों समेत बहुत कुछ था (और है) जिसकी प्रशंसा की जा सकती थी (आज भी की जा सकती है)| बहुत से क्षेत्रों में गुजरात ने पहल की थी| केरल जैसा नहीं पर उससे बहुत पीछे भी नहीं था नई शुरुआत करने में|

प्री-स्कूल में, हम लोगों को ठंडे दूध का एक गिलास मिलता था (हम लोग इसलिए पीते थे क्योंकि दूध रंगबिरंगे प्लास्टिक के गिलासों में मिलता था)| वर्तमान में मीडिया न्यौछावर हो जाता है इस खबर पर कि किसी राज्य ने लड़कियों को शिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रेरित करने के लिए उन्हें मुफ्त में साइकिलें देने की योजना पर अमल करना शुरू किया है| गुजरात में बहुत समय से लड़कियों को मुफ्त में शिक्षा दी जाती रही है, कम से कम तबसे तो निश्चित रूप से जब मैं आठवीं से बारहवीं कक्षाओं की पढ़ाई कर रही थी (सहायता प्राप्त स्कूलों में भी)|  विश्वविधालय में मेरी बी.ए   (1992-1995) का शुल्क  मात्र 36 रुपये प्रति वर्ष था|

ग्रामीण इलाकों में भी दृश्य अच्छा था| स्कूली छात्र के सरंक्षित रूप में हमने प्रकृति-शिक्षा-कैम्प के द्वारा ग्रामीण गुजरात देखा, और हम गिर के वनों में और पिरोटन द्वीप पर भी गये| स्कूल की वार्षिक पिकनिक के दौरान नर्मदा के किनारे भी गये| बड़े होने पर मैंने जाना कि गुरुदेश्वर, ज़देश्वर, और उत्कंठेश्वर गुजरात के आदिवासी इलाकों के भाग हैं जो कि तुलनात्मक रूप से राज्य का पिछडा इलाका माना जाता था| तब भी उस समय जैसी सड़कें हमने वहाँ देखीं, वैसी सड़कें, शोध के सिलसिले में 2005-2007 के दौरान मध्य प्रदेश, झारखंड और छत्तीसगढ़ के राष्ट्रीय राजमार्गों पर भे इन्हीं पाईं (हालांकि अब वहाँ भी कफी सुधार हो गया है)| केवल आज के दौर में ये स्थान ऐसे हाइवे पा रहे हैं जैसे गुजरात नब्बे के दशक में ही इस्तेमाल में ला रहा था| पिछले चौदह सालों में देश के बहुत सारे राज्यों में शोध के सिलसिले में दौरे करने के बाद मुझे यह एहसास हो गया है कि क्यों मेरे विधार्थी जीवन में भी गुजरात में पहली बार आने वाले वहाँ पर विकास का स्तर देखकर क्यों आश्चर्यचकित रह जाते थे और कि गुजरात ने वास्तव में बहुत पहले से ही अच्छा इन्फ्रास्ट्रक्चर खड़ा कर लिया था|

बड़ोदा को अपने क्षेत्रीय और धार्मिक बहुलतावाद पर गर्व रहा है| स्कूल में मेरे साथ हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, पारसी, और सिंधी छात्र पढते थे| मुझे आज भी ओणम, पोंगल, और पतेती के अवसर पर मिलने वाली दावतों की याद है| पर वर्तमान में दुखद रूप से सब बदल चुका है| 2007 में जब संजय दत्त को आतंकवादियों से संपर्क करने के कारण सजा हुयी थी तब मेरी सात साल की भतीजी ने मासूमियत से पूछा था,” वह आतंकवादी कैसे हो सकता है, वह तो मुस्लिम नहीं है?”

ऐसा नहीं है कि गुजरात में पहले साम्प्रदायिक भावनाएं नहीं थीं| पर बड़े होने तक इन् सब भावों से कभी भी सीधी मुठभेड़ नहीं हुयी थी|

गुजरात में पाले पढ़े होने में सबसे ज्यादा (स्वादिष्ट खाद्य सामग्रियों के अलावा, जिनमें हमेशा ही चीनी नहीं डाली जाती!) महत्वपूर्ण बात जो मुझे लगती है  वो है स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता के भाव जो मुझे मिले क्योंकि चारों और बेहद सुरक्षित वातावरण था|  दिल्ली स्कूल ऑफ इकनॉमिक्स से एम ए (1995-7),  करते हुए मैं कई बार राजधानी एक्सप्रेस से सुबह तीन बजे बड़ोदा पहुँची और मेरे लिए यह बड़ा स्वाभाविक ठ अकी मैं अकेली स्टेशन से बाहर ऑटो स्टैंड पर जाऊं और उतना ही स्वाभाविक था मेरे औटो में बैठने के बाद मीटर चालू करके ऑटोवाले का मुझसे पूछना कि मुझे कहां जाना है? गहरी नींद में सोये हुए अपने माता-पिता को मैं जाकर जगाती थी| उन्हे कभी चिंता में नींद खराब नहीं कानी पड़ी कि मैं कैसे अकेली घर तक आउंगी|  दिल्ली में ऐसा कर पाना आज भी एक स्वप्न सा लगता है, मेरे जैसे सामाजिक पृष्ठभूमि के इंसान के लिए भी| बिना भय के कहीं भी घूमने की स्वतंत्रता का मोल हम अक्सर हल्के में लेते हैं|

इन स्व-अनुभवों से भरे किस्सों के अलावा तथ्य क्या कहते हैं? नीचे दी गई तालिका में गुजरात और राष्ट्रीय स्तर परपांच समाजिक और आर्थिक सूचकांकों का औसत दिया गया है 90 के दशक के बाद के काल में| आंकड़े बताते हैं कि नब्बे के दशक में ही गुजरात का औसत दश के औसत से बेहतर था| तब गुजरात देश के दस ऊँचे राज्यों में से एक था| 2000 के बाद के दशक में यह सफल नहेने हो पाया अपनए ही पिछले प्रदर्शन को कायम रखने में (मुफ्त शिक्षा, मिड-डे मील, शिशु-विकास योजनाएं, विस्तृत और उच्च विकास आधारित इकोनॉमी)| अन्य राज्यों की तुलना में गुजरात का सामाजिक सूचकांक नीचे गिरा है|  स्पष्टतः गुजरात कोई एक दिन में नहीं बना था और गुजरात को बनाने में किया गया कठोर परिश्रम मोदी काल से कम से कम एक दशक पहले की बात है|

मेरा यह कहना नहीं है कि अस्सी और नब्बे के दशकों में गुजरात के पहले के विकास का श्रेय कांग्रेस को दिया जाना चाहिए जिसने उन सालों में सबसे अधिक सालों तक गुजरात में सत्ता चलाई| उपलब्धियों की निरतंरता ऋणात्मक सूचकांकों की रोशनी में भी देखी परखी जा सकती है| भ्रष्टाचार कम से कम अस्सी के दशक से हमारे साठ साठ विचरण कर रहा है| नब्बे के दशक में एक चुटकला प्रसिद्द था – “CM”, “Chief Minister” का संक्षिप्तीकरण न रहकर “Crore-Making” का संक्षिप्त रूप हो गया था – CM के बारे में यह माना जाने लगा था कि वह एक दिन में करोड़ों कमा रहा था|  मुझे बताया गया है कि गुजरात में आजकल अगर सारी नहीं तो अधिकतर प्रोपर्टी डील काले धन के इस्तेमाल के बगैर सम्पन्न नहीं होतीं| देश के बाकी स्थानों की तरह ही रोजमर्रा के स्तर पर भ्रष्टाचार घर कर चुका है वहाँ| आपातकालीन स्थितियों में यात्रा करने की मजबूरी के कारण एक व्यक्ति को ट्रेन छोटने से दो घंटे पहले स्टेशन पर 1000 रुपयों की घूस देकर टिकट मिला|

भाजपा की प्रचार मशीनरी गुजरात को “ईश्वर की अपनी धरती” के रूप में प्रचारित कर रही है| जबकि उत्तर भारतीय मैदानों से गये आदमी की निगाहों से देखें तो गुजरात की विकास की कहानी मोदी काल से बहुत पहले ही कायम हो चुकी थी| दक्षिण की दृष्टि से देखें तो गुजरात एक धनी राज्य दिखाई देता है पर सामाजिक सूचकांकों के आधार पर पिछडा हुआ राज्य है, तमिलनाडु की तुलना में, केरल की बात तो अलग ही है|

reetika-khera-gfx.jpg.png
Original article

%d bloggers like this: