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फ़रवरी 28, 2017

जंग न होने देंगें …अटल बिहारी बाजपेयी

gurmehar विश्व शांति के हम साधक हैं,
जंग न होने देंगे!
कभी न खेतों में फिर खूनी खाद फलेगी,
खलिहानों में नहीं मौत की फसल खिलेगी,
आसमान फिर कभी न अंगारे उगलेगा,
एटम से नागासाकी फिर नहीं जलेगी,
युद्धविहीन विश्व का सपना भंग न होने देंगे।
जंग न होने देंगे।
हथियारों के ढेरों पर जिनका है डेरा,
मुँह में शांति,
बगल में बम,
धोखे का फेरा,
कफन बेचने वालों से कह दो चिल्लाकर,
दुनिया जान गई है उनका असली चेहरा,
कामयाब हो उनकी चालें,
ढंग न होने देंगे।
जंग न होने देंगे।
हमें चाहिए शांति,
जिंदगी हमको प्यारी,
हमें चाहिए शांति, सृजन की है तैयारी,
हमने छेड़ी जंग भूख से, बीमारी से,
आगे आकर हाथ बटाए दुनिया सारी।
हरी-भरी धरती को खूनी रंग न लेने देंगे जंग न होने देंगे।
भारत-पाकिस्तान पड़ोसी, साथ-साथ रहना है,
प्यार करें या वार करें, दोनों को ही सहना है,
तीन बार लड़ चुके लड़ाई,
कितना महँगा सौदा,
रूसी बम हो या अमेरिकी,
खून एक बहना है।
जो हम पर गुजरी,
बच्चों के संग न होने देंगे।
जंग न होने देंगे।
(अटल बिहारी बाजपेयी)

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अगस्त 6, 2013

हिरोशिमा-नागासाकी में ट्रूमन का खेल

बहुत बड़ी गलती नहीं की क्या

प्रकृति ने ?

Hiroshima

इंसान तो बनाया ही बनाया

साथ उसे  प्रदान कर दी,

जरुरत से ज्यादा

सोचने और समझने की शक्ति!

प्रकृति बसाती जाती है

इंसान उजाड़ता जाता है,

विध्वंस का प्रयोग करता है

एक इंसान दूसरे इंसान के विरुद्ध

पेड़-पौधे और जानवर तो

अणु बम बनाते नहीं

ये सब कारनामें तो इंसान के ही हैं|

आइंस्टाइन की वैज्ञानिक मेधा का दुरुपयोग करके

जब ट्रूमन ने हिरोशिमा और नागासाकी

में विनाश फैलाने की योजना बनाई

तब उसे पता तो था

कि जापान आत्मसमर्पण के लिए तैयार था

फिर क्यों इतना बड़ा विध्वंस रचा उसने?

क्या उसके दिमाग पर शैतान ने कब्जा कर लिया था?

या उसे बाकी देशों को अपनी शक्ति दिखानी थी?

कारण जो भी रहा हो उसके बोये बीजों से

उपजी फसल धरती पर जीवन को

हमेशा के लिए संक्रमित कर गई है|

जिनके पास अपने नागरिकों को खिलाने के

लिए भोजन तक नहीं है ऐसे

देश भी एटम बम थैले में लिए घूम रहे हैं|

आत्मघाती तो इंसान सदा से ही रहा है-

वरना वह धरती पर प्रकृति की देन का ऐसा नाश न करता रहता-

ट्रूमन के कदम ने

उसे पूरी धरती को नष्ट करने का औजार देकर

भस्मासुर भी बना दिया|

देर-सबेर कोई न कोई

सनकी राजनीतिज्ञ

इस धरती को लील कर ही

अंतिम  शान्ति को प्राप्त होगा|

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