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जुलाई 11, 2016

नारी … (महात्मा गाँधी)

“नारी” पुरुष की सहचर है, सहगामी है, संगी है, साथी है, और उसकी क्षमताएं किसी भी मायने में पुरुष से कमतर नहीं हैं|

नारी के पास पुरुष की गतिविधियों की बारीकियों में सम्मिलित होने का अधिकार है, और उसके पास, जैसे पुरुष के पास स्त्री के प्रति है, पुरुष जैसी ही स्वतंत्रता और छूट है|

सेवा और त्याग की आत्मा के जीते जागते उदाहरण के रूप में मैंने नारी को पूजा है|

प्रकृति ने जैसे नारी को स्वहित से परे की सेवा की आत्मिक शक्ति से नारी को परिपूर्ण किया है, उस शक्ति की बराबरी पुरुष कभी भी नहीं कर सकता|”

जुलाई 18, 2011

दहशत

आजकल मै डरा हुआ हूँ
यह एक रचनाकार का डर है
शब्द ही नहीं मिलते मुझे कि
लिखूँ
विज्ञापन में नंगी देह दिखाती युवती की
विशेषतायें क्या हैं।
उसकी वाइटल स्टेटिस्टिक्स मुझे किस तरह
लुभाती है
कि मैं दो बच्चों का बाप,
और बच्चे भी बड़े हो गये हैं
किस तरह महसूसता हूँ ऐसे पलों को।

सुगंधित साबुन से नहाती युवती की
महकती देह
सुडौल गोल और चिकनी जाँघों को
सहलाना चाहता हूँ,
स्क्रीन पर ही सही
तो क्या यह पाप है?

मुझे औरत की छातियाँ और गोलाइयाँ
खींचती हैं अपनी ओर
उनके आधे-अधनंगे ब्लॉउजों में
जहाँतक झाँक सकता हूँ
डाल देता हूँ आँखें
दिखते सौन्दर्य को न देखना
उसका अपमान है।

सौन्दर्य भी तो वस्तु नहीं
आँखों में होता है
न देखूँ तो
आँखों का होना बेकार है।

मगर पूछना चाहता हूँ कि
इन ब्लॉउजों की डिजाइन
किसने की है?
जिसने की है
उसका मकसद क्या है?
और पहनने वालियाँ क्या
पाना चाहती हैं?

एक कॉम्प्लीमेंट कि
यू आर ब्यूटीफुल…
लुकिंग गॉर्जियस…
स्टनिंग…?
यकीन मानिये
बहुत सी महिलायें
इन्ही आधे-अधूरे वाक्यों से
हो जाती हैं
लहालोट।

फिर जो कुछ होता है
उसी को लिखना चाहता हूँ मैं
मगर मुझे शब्द नहीं मिलते है
क्योंकि,
बाद की स्थितियों को
गंदगी उपजाने वाला यह लिथड़ा समाज
अश्लील कहता है।

घुटनों को मोड़कर
एड़ियों पर नितम्बों को टिकाए
बैठी जवान औरतों को
घूरने वाले
लपलपाती जीभ निकाले मर्दों को
जब देखता हूँ,
उन्ही में से मैं भी हूँ,
तो डर जाता हूँ
कि
एक दिन जब सारी गोलाइयाँ
लटककर झूल जायेंगी
हड्डियों से प्यार करता माँस
चिचुककर लटक जायेगा
तब वह कितनी खूबसूरत लगेगी
तब कितना खूबसूरत दिखूँगा मैं?

यह एक ऐसी दहशत है
जो जवान और सुंदर दिखती औरत को
मेरी नज़रों में एक पल में
अचानक बियावान और बदसूरत
बना देती है।

औरत, समाज और अपने बारे में
जो मैं कहना चाहता हूँ
लिखना चाहता हूँ
उसके लिये जितने शब्दों का प्रयोग करुँगा
वे सभी शब्द आज की भाषा में
असंसदीय हैं।

मैं डरा हुआ हूँ
शब्दों के प्रयोग से
कि कहीं माफी न माँगनी पड़े
आवारा ताकतों से
मैं गालियाँ देना चाहता हूँ सबको
मगर मुझे शब्द नहीं मिलते।

{कृष्ण बिहारी}

मार्च 4, 2011

दोमुँहे…

मैं चूमता हूँ हवाएं
देखता हूँ सितारे
पूजता हूँ सागर
सहेजता हूँ नदियां
सहलाता हूँ लहरें
छूता हूँ मिट्टी
बनाता हूँ सोना
मुझे कोई कुछ नहीं कहता।

लेकिन-
जब देखता हूँ औरत
लिखता हूँ उसके बारे में
तो लोग भूल जाते हैं
अपनी आँखें
बन जाते हैं जबान
मुझे पोर्नोग्राफर और
मेरी रचनाओं को
कहते हैं अश्लील,
चाहते हैं हो जाऊँ
दोमुँहा उनकी तरह
और बकूँ बकवास।

मैं पूछता हूँ
हुजूर!
आप ईश्वर से क्यों नहीं पूछते
लगाते तोहमत
कि दो एक से इंसानों की तकदीर
उसने क्यों पलट दी है
धरती के एक हिस्से को चमन
तो दूसरे को
बनाया क्यों है रेगिस्तान
कहीं बर्फ की चादर
कहीं पर आग की बारिश
कहीं पर टॉरनेडो।
सुबह और शाम के फासले में
जो बदल देता है दुनिया
उसके खिलवाड़ को आप कहते हैं
करिश्मा।

और-
मैं जो सोचता हूँ
कहता हूँ
लिखता हूँ
उसे ईमानदारी से पढ़ने
या सुनने के बाद
चोरी से कहते हैं आप
बहुत घटिया है तुम्हारी सोच
केवल गलाज़त देखते हो
अपना कचरा दूसरों पर फेंकते हो।

हुजूर!
माफ करें मुझे
मुझमें बहती नहीं है गंगा
छटपटाती है वैतरणी
डूबना चाहेंगे?
तो हकीकत में डूबिये
मगर खुदा की कसम
झूठ मत बोलिये
एक बार तो ईमान से कहें
अपनी संतति के लिये
कि दोमुँहे नहीं हैं आप
शायद, बदल जाये यह दुनिया।

मेरे लिये मुश्किल है
बदलना
मैं कर सकता हूँ कोशिश
चलने की जमाने के साथ
मगर हो नहीं सकता हूबहू उस जैसा।

हाँ, उसे लिख सकता हूँ
ईमानदारी के साथ
आप जैसों के लिये
जो गालियाँ बकें मुझे
ताज़िंदगी ऊपर से
और मुझें पढ़ें भीतर से।

{कृष्ण बिहारी}

 

[चित्र : राजा रवि वर्मा]

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