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जून 19, 2011

सोनिया गाँधी और संघ परिवार

बतकही : आरम्भ से आगे :-

…9 जनवरी, 2005…

सही कह रहे हो आप। उन्ही अटल जी की कविताओं को अमिताभ द्वारा स्वर दिये जाने की बात थी लोकसभा चुनावों से पहले। ये तो वक्त वक्त की बात है। भाजपा, शिव सेना ने बच्चन परिवार का जीना मुश्किल कर दिया था और शिवसेना ने तो अमिताभ की शहंशाह फिल्म की रिलीज पर जमकर हँगामा किया था। आज अमिताभ को कहना पड़ता है कि बाल ठाकरे तो उनके मित्र हैं। आज तो अमिताभ सपा के साथ खड़े दिखायी देते हैं जबकि मुलायम ​सिंह यादव ने भी बोफोर्स के दिनों में वी.पी.सिंह के समर्थन में बच्चन परिवार के खिलाफ जम कर सभायें की होंगी। आपको याद होगा कि सपा ने अमिताभ बच्चन की लोकप्रियता अपने पक्ष में भुनाने के लिये ब्लड डोनेशन कैम्प लगवाये थे क्योंकि अमिताभ अब राजनीति में सीधी भागीदारी से बचते हैं और ऐसे ही किसी जगह उन्होने कह दिया था कि मुलायम सिंह यादव तो उनके लिये पिता समान हैं। तब भाजपायी नेताओं ने पूरे चुनावों के दौरान अमिताभ की खिल्ली उड़ायी थी कि साठ साल का पुत्र और पैंसठ साल का पिता। अब अमिताभ ने जो कहा था वह एक भावनात्मक बात थी। और आप ताज्जुब देखो कि कुछ समय बाद जब अटल जी की कविताओं को लता मंगेशकर ने गाया था और कैसेट के विमोचन पर लता जी कह रही थीं कि अग्रेंजी में नाम लिखने पर लता का उल्टा अटल है और अटल का उल्टा लता और अटल जी मेरे पिता समान हैं तो भाजपायी भावविभोर होकर धन्य हो धन्य हो का कोरस गान कर रहे थे। अब भाजपाइयों जैसा कोई कह ही सकता था कि अठत्तर साल की पुत्री और अस्सी साल का पिता। पर माफ करना अशोक जी ऐसी टिप्पणियाँ सामान्यत: भाजपा के खेमे से ही निकलती रही हैं। बरसों ये लोग विपक्ष में रहे हैं सो बिना किसी जवाबदेही के कुछ भी बोलने की आदत पड़ गयी है जो छह साल की सत्ता मिलने के बाद भी नहीं गयी है।

आप तो विजय बाबू ऐसे कह रहे हो जैसे मैंने पूरी भाजपा का ठेका ले लिया हो। अरे कह दिया होगा किसी राज्य स्तर के छोटे मोटे नेता ने कुछ। सबके मुँह से फिसल जाता है। भाजपा का केन्द्रिय नेतृत्व देखिये कितना शालीन है। आडवाणी जी को देखो। मजाल है कोई फालतू बात मुँह से निकल जाये जैसे फिल्टर लगा हो मुँह में और हर बात छनकर बाहर आती हो। आपको याद दिला दूँ कि त्याग की मूर्ति सोनिया गांधी ने अटल जी के लिये कहा था कि जिनके अपने घुटने कमजोर हों वे देश क्या संभालेंगें। अभी इनकी पुत्री प्रियंका गांधी ने लोकसभा चुनाव के दौरान अटल जी जैसे वष्ठितम राजनेता के खिलाफ टिप्पणी कर दी थी वह भी थी उनके स्वास्थ्य को लेकर। अब ये हैं क्या अटल जी के सामने। अशोक बाबू भड़कते हुये बोले।

मैने पहले भी सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी की टिप्पणियों की आलोचना की थी। शारीरिक अवस्था पर टिप्पणी स्वस्थ बात नहीं है। वैसे इस तरह की शुरूआत तो चीन युद्ध के बाद डा.लोहिया की बीमार नेहरू पर की गयी टिप्पणी से ही हो गयी थी। बाद में उन्होने इंदिरा गाँधी पर भी व्यक्तिगत टिप्पणी की थी। शायद उन्होने या उनके किसी समकालीन बड़े नेता ने उन्हे गूँगी गुड़िया कहा था। किसी ने उनके बारे में कहा था कि संसद में अब एक हसीन चेहरा देखने को मिल जायेगा। वैसे अशोक जी मेरा मानना है कि भाजपा और सोनिया गांधी के मामले मे पहल भाजपा द्वारा की गयी है। बरसों ऊटपटांग टिप्पणियां सोनिया पर की गयी हैं और आज भी की जाती हैं। अभी पिछले राजस्थान चुनावों की बात ले लो। भाजपा की तो जबर्दस्त जीत हुयी थी वहाँ। इंडियन एक्सप्रेस के संपादक शेखर गुप्ता की रिपोर्ट थी। शेखर जब चुनाव की कवरेज के लिये जयपुर–कोटा राजमार्ग पर ​स्थित एक गाँव में चाय की दुकान पर ठहरे तो वहाँ भाजपा समर्थक दावा कर रहा था कि उसने आर.एस.एस की किसी पत्रिका में पढ़ा था कि कुछ पत्रकार इटली में सोनिया गांधी के गाँव में गये थे और उन्हे वहाँ बताया गया था कि सोनिया इटली में कैबरे डांसर हुआ करती थीं। शेखर ने कहा कि ऐसा नहीं है और मान लो किसंघ की पत्रिका में ऐसा छपा भी हो तो आप लोग ऐसी बात को गम्भीरता से नहीं ले सकते। पर भाजपा समर्थक मानने को तैयार नहीं थे। मान लो शेखर गुप्ता झूठ बोल रहे थे उनका भाजपा से दुराव और कांग्रेस से लगाव रहा होगा। दूसरा किस्सा सुनो जो हमारा अपना ही सुना हुआ है। लोकसभा चुनावों की बात है। उन्ही दिनों हमने बच्चों से इंटरनेट प्रयोग करना सीखा था। टाइम्स आफ इण्डिया की वेब साइट हमने खोली और समाचार पढ़ने लगे। वहाँ हमने रेडियो पर भी समाचार सुने। वहीं हमारी दृष्टि पड़ी एक खबर पर राहुल गांधी के खिलाफ खड़े भाजपा के उम्मीदवार श्री वेदांती से वार्ता। मै‍र्ने उस वार्ता के लिंक पर क्लिक कर दिया। एक से बढ़कर एक वचन सुनायी दिये वेदांती जी के सुमुख से नेहरू–गांधी परिवार के खिलाफ खासकर सोनिया और राहुल के खिलाफ। वेदांती जी को पता चला कहीं से कि राहुल का प्रेम चल रहा है किसी कोलम्बियन लड़की से तो वेदांती जी लगे पड़े थे कि अमेठी में कोलम्बिया की एक हजार लड़कियां घूम रही हैं नवयुवकों के वोट राहुल को दिलवाने के लिये। शाम को बागों में अश्लील नृत्य चल रहे हैं।

साक्षात्कार लेने वाले ने पूछा कि वेदांती जी क्या आपने खुद देखा है किसी विदेशी लड़की को। तो वेदांती जी बोले कि हमारे देखने की जरूरत नहीं है सब जानते हैं। और आगे सुनो। वेदांती जी ने सोनिया गांधी को अपशकुनी बता दिया कि सोनिया के आने से सबसे पहले संजय गांधी की अकाल मृत्यु हुयी और फिर इन्दिरा और राजीव गांधी की हत्यायें। अब वेदांती जी की परिभाषा से मेनका गांधी क्या हुयी ये तो वही जाने। और इस सोच से वरुण गाँधी कितने भाग्यशाली हुये अपने पिता के लिये? आप खुद ही बताओ ऐसी दकियानूसी बातें कहाँ मिलेंगी?

अजी विजय बाबू ऐसे एक दो तो हरेक पार्टी में होते हैं। कौन सा किसी को जीतना था राहुल गांधी के खिलाफ अमेठी से? ये तो इस फैमिली की घर की सीट है।

अशोक बाबू बात यह है कि क्या ऐसे लोगों को टिकट देकर भाजपा लोकतंत्र को मजबूत बना रही है? आज सीटे जीतने के लिये आप जनता की भावनाओं को भड़काने के लिये कैसे ही लोगों को टिकट दे दो पर इतिहास गवाह है कि अन्त में मुसीबत आपकी भी आनी है। आखिर छह साल सत्ता में रहते हुये भाजपा ने झेला ही था विहिप आदि के तानों को। ये तो भाजपा को सोचना है कि वह परिपक्व राजनीति करना चाहती है या ​सिर्फ सत्ता पाने के लिये शार्टकट इस्तेमाल करना चाहती है।

आप ये बताओ विजय जी कि ये नेहरू–गांधी परिवार और बच्चन परिवार में ऐसा क्या झगड़ा हो गया? अखबार तो ये लिखते हैं कि अब दोनो परिवार एक दूसरे से बिल्कुल नहीं मिलते और कहाँ तो ऐसी निकट की दोस्ती थी कि राजीव गांधी छुट्टियाँ तक अमिताभ बच्चन के साथ बिताते थे। हमने तो सुना है कि जब अमिताभ बच्चन को चोट लगी थी सन बयासी में तो इन्दिरा गांधी विदेश से अपनी सरकारी यात्रा अधूरी छोड़कर वापिस आ गयीं थीं और राजीव गांधी भी अमेरिका से तुरन्त आ गये थे और सीथे अस्पताल पहुँचे थे। हमने तो ये तक सुना है कि शुरू में सोनिया गांधी बच्चन परिवार के यहाँ ही ठहरी थी जब राजीव गांधी से शादी हुयी थी। अब ऐसा क्या हो गया? आप ये न कह देना कि इन दोनों परिवारों में अलगाव भी भाजपा का कराया हुआ है। अशोक बाबू हँसकर विषय बदलते हुये बोले।

अजी बड़े लोग हैं। क्यों मनमुटाव हो गया क्या हो गया ये सब बातें तो उन लोगों का आपसी मामला है। फिर सोनिया गांधी ने तो कभी कुछ कहा नहीं सार्वजनिक रूप से। या तो अमिताभ ने कहा था कि हम रंक हैं और नेहरू–गांधी परिवार राजा है और सम्बंध रखना न रखना तो राजा के हाथ में होता है। अब ये पत्रकार लोग भी तो हलक में माइक डाले खड़े रहते हैं। अब क्या पता है कि जया बच्चन ने चुनाव सभा में कहा कि नहीं कहा कि नेहरू–गांधी परिवार ने संकट में बच्चन परिवार का साथ छोड़ दिया। अब पत्रकारिता तो सेंसेशन वाली हो गयी है। पत्रकार लोग तुरन्त राहुल गांधी के पास पहुँच गये पूछने कि जया बच्चन तो उनके परिवार को धोखा देने वाला बता रहीं हैं। राहुल गाँधी का कहा भी सुर्खियाँ बन गया कि लोग जानते हैं कि किसने अपनी वफादारी बदली है और उनका परिवार कभी किसी का साथ नहीं छोड़ता।

विजय बाबू जया बच्चन ने कहा तो था ही कि नेहरू–गांधी परिवार ने बच्चन परिवार को मझदार में छोड़ दिया जब हम मुसीबतों से गुजर रहे थे और अमर ​सिंह और मुलायम ​सिंह ने उनका साथ दिया और ये लोग भरोसे वाले लोग हैं। हरेक अखबार में छपा था। बाद में राहुल गांधी ने कड़ा बयान दिया था। और अमिताभ ने भी कुछ कहा था।

अमिताभ बच्चन ने जो कहा था कि यदि जया ने ऐसा कोई बयान दिया है तो गलत किया है और नेहरू–गांधी परिवार तथा बच्चन परिवार की दोस्ती जया और सोनिया के इन परिवारों में आने से बहुत पहले की है तो वह एक संवेदनशील बात कह रहे थे और ऐसी बयानबाजी के कारण उनको हुआ दुख स्पष्ट पता चल रहा था। आप देखो कि उनके बयान के बाद कोई भी बयान इस ​सिलसिले में नहीं आया किसी का भी। अब अन्दर की बात तो वे लोग ही जाने पर हमें एक बात तो लगती ही है कि जितने खुले रूप में बच्चन परिवार अमर ​सिंह या सपा के साथ खड़ा दिखा दिखायी देता है उतने खुले रूप में वे लोग सोनिया गांधी के साथ खड़े दिखायी नहीं दिये राजीव गांधी की हत्या के बाद। या ये कह लो कि समय ही खराब था दोनो परिवारों के लिये कि जब दोनो परिवारों को एक दूसरे के साथ की जरूरत थी तब दोनो ही मुश्किलों में फंसे हुये थे। या शायद बच्चन परिवार को लगा हो कि गांधी परिवार तो हर तरह से सक्षम है उन्हे सहायता की क्या जरूरत है ? कुछ न कुछ गलतफहमी तो जरूर रही होगी। पर कोई भी बात एकतरफा नहीं हो सकती चाहे दोस्ती हो या दुश्मनी। अमिताभ हैं कलाकार और कलाकार बेहद भावुक होते हैं। बोफोर्स के आरोपों से त्रस्त होकर अमिताभ ने राजनीति से तौबा कर ली थी। जबकि हमारे विचार में राजीव गांधी उनसे कहीं ज्यादा परेशानी में थे बोफोर्स के कारण और उन्हे भी मित्रों के साथ की जरूरत थी पर अमिताभ राजनीति का ताप न सह पाये और मैदान छोड़ गये। लन्दन में भी तो उन्होने केस लड़ा अपने को निर्दोष साबित करने के लिये। ये काम वे सांसद बने रहकर भी कर सकते थे। उनका उस समय इस्तीफा देना मित्रधर्म नहीं था। बाद में भले ही वे राजनीति से हट जाते पर तब उन्हे राजीव के साथ मजबूती से खड़ा होना था। बोफोर्स मामले में राजीव को उनके मित्रों के ऐसे कदम पीछे हटाने से बहुत नुकसान उठाना पड़ा। अरूण ​सिंह का मसला भी ऐसा ही था। राजीव के जाने के बाद भी अमिताभ समय समय पर राजनीति से दूर रहने कि बात दोहराते रहे तो फिर सपा के केस में ऐसा क्या हो गया? भले ही समाज सेवा के बहाने से अमिताभ ने सपा के लिये समर्थन माँगा पर माँगा तो है ही। अब पता नहीं सच है कि नहीं पर अखबार में ही पढ़ा हमने कि अमिताभ ने एक निर्देशक की फिल्म साइन करने के बाद छोड़ दी ये कहकर कि उस निर्देशक को उनके पारिवारिक मित्र अमर ​सिंह से समस्यायें थीं और वे ऐसे निर्देशक के साथ कैसे काम कर सकते हैं। यदि इतनी दृढ़ता अमिताभ ने नेहरू–गांधी परिवार के प्रति भी दिखायी होती तो शायद दोनो परिवारों की दोस्ती बनी रहती। और एक राजनीतिक सच ये भी है कि उ.प्र. में यदि कांग्रेस मजबूत होती है तो सपा को राजनीतिक हानी होनी ही है । सपा परोक्ष रूप से कई बार सोनिया गांधी का विरोध कर चुकी है विदेशी मूल के मामले में। तो बच्चन परिवार तो धर्म संकट में रहता ही कि कैसे दो राजनीतिक रूप से प्रतिद्वन्द्वी दलों के मुखियाओं से दोस्ती निभाये। फिर कांग्रेस में कितने ही ऐसे होंगे जो कभी नहीं चाहेंगे कि बच्चन परिवार नेहरू–गांधी परिवार के पास आये ताकि वे सोनिया गांधी के नजदीक जा सकें। समय तो चलायमान है। चीजें बनती बिगड़ती रहती हैं।

अशोक बाबू लम्बा व्याख्यान सुनकर बोले अजी हमें क्या मतलब है इन लोगों की मित्रता से कल टूटती तो आज टूट जाये। न इनकी मित्रता से देश का भला हो रहा और ना ही मित्रता के न रहने से देश गर्त में जा रहा। सब ड्रामा है। और आप अमिताभ बच्चन की क्या बात करते हो। कांग्रेस ने इन साहब को इलाहाबाद से खड़ा किया हेमवती नन्दन बहुगुणा जैसे वरिष्ठ राजनेता को हराने के लिये। अमिताभ ने फिल्मी लटकों झटकों से उन्हे हराया होगा। बेचारे बहुगुणा जी का राजनीतिक जीवन ही खत्म हो गया उस हार से। ये ठीक लगता है आपको?

अशोक जी बहुगुणा जी तो हैं नहीं सो कुछ कहना ठीक नहीं पर जब आपने बात छेड़ी है तो आपको बताना जरूरी है कि उस चुनाव में बहुगुणा जी ने किन्नरों को किराये पर बुलाकर सारे लोकसभा क्षेत्र में घुमाया था और जगह जगह किन्नर अमिताभ की खिल्ली उड़ाते घूमते थे गाना गाकर कि मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है। ये अलग बात है कि इस सबके बावजूद अमिताभ ने बहुगुणा जी को अच्छी शिकस्त दी। हमारे ख्याल से तो बहुगुणा जी जैसे वरिष्ठ राजनेता को अपने प्रतिद्वन्द्वी उम्मीदवार की इस तरह से खिल्ली उड़ाना शोभा नहीं देता था। अमिताभ का फिल्मों में काम करना उसमें गीत गाना या गाने पर नाचना उनके प्रोफेशन का हिस्सा थे और किसी को भी हक नहीं कि दूसरे के व्यवसाय का मजाक बनाये। यही सब कुछ पिछले चुनाव में गोविन्दा की जीत में सहायक रहा होगा। जनता इतनी मूर्ख नहीं होती जितना कि राजनेता समझ लेते हैं। और फिर आप यह क्यों भूल जाते हैं कि अगर कांग्रेस से इतनी ही दिक्कत थी या है तो बहुगुणा जी के बेटे और बेटी क्यों कांग्रेस में बने हुये हैं? उन्हे तो आपसे और हमसे ज्यादा अपने पिता के मान-सम्मान या अपमान की चिंता होगी।

अजी हमारी समझ में तो आता नहीं कि कैसे हमारे देश के लोग एक विदेशी महिला को समर्थन देते हैं। कहाँ भाजपा की प्रचंड देशभक्ति और कहाँ सोनिया के नेतृत्व में कांग्रेस का ढ़ुलमुलपन। कहीं कोई मुकाबला है भला। दो मिनट तो सोनिया लगातार बोल नहीं सकती यदि लिखकर न दिया जाये। अशोक बाबू तैश में आकर बोले।

अशोक बाबू ने अपनी बात पूरी की ही थी कि हरि बाबू वहाँ पँहुच गये और उनकी बात लपकते हुये बोले,” कौन दो मिनट नहीं बोल सकता बिना लिखे हुये को पढ़े? जरूर आप सोनिया गांधी को गरिया रहे होगे। अरे कभी तो बेचारी को बख्श दिया करो। अब जनता ने भाजपा को फिर से सत्ता नहीं दी तो इसमें सोनिया का क्या कसूर। आपके प्रमोद महाजन के हिसाब से तो सोनिया से माफिक कोई भी नेता विपक्ष नहीं हो सकता था भाजपा के लिये। अपनी काबिलियत से ज्यादा महाजन को सोनिया की नाकाबिलियत पर भरोसा था। कहते थे कि जब तक सोनिया विपक्ष की नेता हैं भाजपा को कोई खतरा नहीं और भाजपा सत्ता में बनी रहेगी। पर हाय री भारत की जनता उसे भाजपा की शुद्ध हिन्दी के बजाय सोनिया की टूटी फूटी इटेलियन टोन वाली हिन्दी ही पसन्द आयी।

देखो जी समर्थन तो कांग्रेस को भी नहीं दिया जनता ने फिर क्यों लपक कर सरकार बना ली और रोज़ गाना गाया जा रहा है कि सोनिया ने ये त्याग किया वो त्याग किया। इतना बड़ा त्याग किया और ऐसे त्याग की मिसाल इतिहास में नहीं मिलती। त्याग मेरी जूती। अजी जब काबिल ही नहीं थी तो पद ग्रहण न करने का नाटक किया। आपने पढ़ा नहीं था बाल ठाकरे का बयान कि राष्ट्रपति ने सोनिया को बुलाकर साफ कह दिया था कि उनके पी.एम. बनने से जटिलतायें खड़ी हो सकती हैं और हो सकता है कि सेना उनका आदेश न माने। सुषमा स्वराज और उमा भारती ने ताल ठोक ही रखी थी आंदोलन करने की। इन्ही सब बातों से घबराकर इस महिला ने कुर्सी छोड़ने का नाटक किया। अजी बहुत चतुर नारी है। अशोक बाबू आवेश में आकर बोले।

बुरा न मानना अशोक बाबू पर कुछ बातों में संघ परिवार से जुड़े घटकों की बातों पर विश्वास कर पाना मुश्किल होता है। ये लोग कैसी भी बातें फैलाते रहते हैं। हमें तो इतना पता है कि बाल ठाकरे की बात जो आप कर रहे हो खुद राष्ट्रपति महोदय ने ऐसी बातों का खंडन ​किया कि उन्होने सोनिया गांधी से इस तरह की कोई चेतावनीयुक्त बात कही थी। हमारे पास तो ऐसा कोई कारण है नहीं कि राष्ट्रपति की बात पर भरोसा न किया जाये। एक तो ऐसा एक भी व्यक्तित्व वर्तमान राजनीति में नहीं है जो देशहित में ही सब बातें सोचता कहता और करता हो। इतना ऊर्जावान राष्ट्रपति हमने तो पहले देखा नहीं कोई भी। साहब हमें तो तो पहली बार कोई राष्ट्रपति पसन्द आया है।

सही बात है हरि बाबू उन्हे पता है कि देश की जरूरत क्या है और आज की वास्तविकता क्या है। तभी उन्होने अपना सारा ध्यान बच्चों पर केन्द्रित किया है। कैसे वे बच्चों में उत्साह जगा रहे हैं। ये सब कुछ सालों में नजर आयेगा। विजय बाबू ने समर्थन किया।

ये बात तो सही कह रहे हो आप आदमी तो प्रोग्रे​सिव है भाजपा बड़ा अच्छा काम कर गयी डा. कलाम को राष्ट्रपति बनाकर। अशोक बाबू ने भी समर्थन करते हुये कहा।

अरे आप दोनो कहाँ चारदिवारी से घिरे बैठे हो। चलकर पार्क में बैठा जाये कुछ घूमना भी हो जायेगा। हरि बाबू ने प्रस्ताव रखा।

हाँ ये ठीक रहेगा बातें वहीं होंगीं अब। अशोक बाबू ने कुर्सी से उठकर अंगड़ायी लेते हुये कहा।

ठीक है मैं जरा अन्दर घर में बता कर आ जाऊँ। विजय बाबू ने कहा और घर के अन्दर चले गये।

कुछ ही देर में विजय बाबू बाहर आ गये और बोले कि चलो सुनील जी को भी देख लिया जाये कहाँ रह गये?

तीनो लोग सड़क पर आ गये। पार्क के रास्ते में सुधीर बाबू का घर पड़ा तो विजय बाबू ने गेट से ही अन्दर खेलते बच्चे से पूछा बेटा बाबा आ गये बाजार से वापिस?

बच्चे ने ना में गरदन हिलायी। तब तक आवाज सुनकर सुनील जी का छोटा बेटा बाहर आया और सबको नमस्ते करके बोला कि अभी तो पापा आये नहीं हैं ।

अरे तुम तो इस बार दो तीन हफ्तों के बाद आ रहे हो। कहाँ अटक गये थे? विजय बाबू ने पूछा।

बस जी काम के चक्कर में आना हो नहीं पाया पहले। फिर सुबह और रात को इतना कोहरा हो जाता है कि ज्यादा शाम को उधर से इधर आने की हिम्मत हुयी और ये भी पता था कि शनिवार की रात को किसी तरह आ भी गया तो सोमवार की सुबह सुबह जाना मुश्किल हो जायेगा और यदि रविवार की शाम को ही वापिस जाना पड़े तो अच्छा नहीं लगता।

सही बात है इतनी भागदौड़ से क्या फायदा। अब कोहरा कम होता जायेगा तो फिर से हर हफ्ते चक्कर लगने लगेंगे। हरि बाबू बोले।

अच्छा बेटा पापा आ जायें तो बोलना कि हम लोग पार्क में बैठे हैं वहीं आ जायें। अशोक बाबू ने कहा।

…जारी…

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जून 18, 2011

बतकही : आरम्भ

चारों मित्र अपनी बैठकों को बतकही क्लब कहा करते हैं। इन बैठकों की शुरुआत तो कब हुयी यह इन मित्रों को भी याद न होगा पर सन 2005 के जनवरी माह से ये बैठकें नियमित जरुर हो गयीं। बिरला ही कोई दिन जाता है कि जब चारों घर पर हों और बैठक न लगे।

उसी दौरान की एक बैठक से :-

जनवरी का दूसरा रविवार होने के बावजूद धूप खिलकर निकली थी अत सुबह का नाश्ता समाप्त करते ही अशोक बाबू विजय जी के घर पहुँच गये थे और दोनों लोग इस वक्त धूप का लुत्फ उठाते हुये अखबार पढ़ने में लगे हुये थे।

अशोक बाबू ने अखबार के पन्ने बन्द करके कलाई घड़ी में समय देखकर कहा,” दस बज गये विजय बाबू, ये हरि बाबू और सुनील जी नहीं आये अभी तक। कहाँ रह गये कहीं टी.वी. सीरियलों से तो नहीं चिपक गये बच्चों के साथ- साथ”?

“आते ही होंगे सुनील जी तो शायद बाजार गये होंगे मिठाई लाने उनके बेटे का प्रमोशन हो गया है। मेजर से ले. कर्नल बन गया है और हरि जी भी फंस गये होंगे किसी काम में। आते ही होंगें दोनों। कौन सा यहाँ संसद लगनी है जिसके लिये कोरम पूरा नहीं हो रहा है”, विजय बाबू इत्मिनान से बोले।

सुनील जी ने आपको बताया अपने बेटे के प्रमोशन के बारे में? हमें तो बताया नहीं कल शाम पाँच बजे ही मिले थे हमसे तो। अशोक बाबू शिकायती लहजे़ में बोले।

अजी उन्हे तो खुद कल रात पता चला जब उनके बेटे ने फोन करके बताया। वो तो सुबह दूध लेने जाते समय उनसे मुलाकात हो गयी तो मुझे पता चला। अब अशोक बाबू आप यहाँ हिन्दुस्तान में रहो तब तो कोई आपको बताये कुछ। रोज़ तो आप शहर से बाहर रहते हो। विजय बाबू ने चुटकी ली।

अशोक कुछ कह पाते उससे पहले ही चाय आ गयी।

लो जी चाय पियो आप अशोक बाबू। तभी आपको रस आयेगा बातों में।

अच्छा चाय आ गयी है तो पी लेते हैं पर मुझे लगने लगा है कि चाय आदि पीने से मेरा बी.पी. कुछ बढ़ जाता है।

अजी कुछ बी.पी. ऊपर नीचे नहीं हो रहा चाय पीने से। आप थोड़ा सा ना चिन्ता कम किया करो सब अपने आप ठीक रहेगा। जमाने भर की चिन्ता करना छोड़ दो।

अजी चिन्ता कोई मैल तो है नहीं कि नहा लिये और शरीर से दूर हो गयी। जो चिन्ता है वो है। जब तक काम पूरा नहीं होगा चिन्ता दूर कैसे हो जायेगी? आप भी कैसी बात करते हो? अशोक बाबू ने चाय का कप उठाते हुये कहा।

विजय बाबू ने कोई जवाब नहीं दिया। कुछ देर दोनों चाय की चु​स्कियों के साथ चुपचाप अखबार पढ़ते रहे।

सहसा अशोक बाबू बोले,” विजय बाबू ये शाहरूख खान के बारे में आपका क्या विचार है”?

विजय बाबू ने अशोक जी के अखबार में छपी तस्वीर पर निगाह डालते हुये कहा विचार तो ठीक ठाक सा ही है। तरक्की तो कमाल की है लड़के की। देखो टी0वी के सीरियलों से कहाँ पहुँच गया। कुछ तो बात जरूर होगी उसमें। पर आप एक्टिंग की बात करो तो ये लड़कपन के किरदारों वाली फिल्में तो ठीक हैं पर परिपक्व रोल में मामला जमता नहीं। बड़ा हल्ला सुना था कि शाहरूख की देवदास आ रही है टी.वी. पर। हमने भी देखी पर साहब बात जमीं नहीं। हमारे पास तो शरत बाबू की किताब भी है। दिलीप कुमार की फिल्म देखने के बाद हमने किताब पढ़ी थी और ऐसा लगा था कि जैसे दिलीप कुमार को सोचकर किताब लिखी गयी हो। बड़ा जबर्दस्त अभिनय किया था दिलीप कुमार ने। दिलीप कुमार भी तकरीबन इसी उम्र के रहे होंगे देवदास करते समय जितनी उम्र में शाहरूख देवदास बने हैं पर दिलीप के अभिनय में गहरायी और परिपक्वता थी। या कह लो कि निर्देशक की अपनी समझ है। अपना अपना समय है हो सकता है हम लोग बूढ़े हो गये हैं और पुराना रिकार्ड बजा रहे हैं पर व्यक्तिगत रूप से हमें तो यही लगता है कि नायक के रूप में अभी तक तो कोई भी दिलीप कुमार से आगे नहीं जा पाया। अमिताभ बच्चन को ही थोड़ा करीब मान सकते हैं पर वह भी उन्नीस ही रहे दिलीप कुमार के सामने।

हमें तो विजय बाबू बिल्कुल अच्छा नहीं लगता ये शाहरूख खान और बच्चों को देखो पागल हुये रहते हैं इसके पीछे।

अजी बच्चे तो रितिक या ह्रितिक क्या है उसके दीवाने हैं आजकल।

ये देखो विजय बाबू ये लड़की कह रही है कि इसने सपने में भी नहीं सोचा था कि कभी शाहरूख के साथ काम करेगी। मुझे तो बेवकूफी लगती है ऐसी बात।

मुझे तो अशोक बाबू वो लड़का ज्यादा पसन्द है जो कोकाकोला के विज्ञापन में आता है अलग अलग रूपों में। ठंडा माने कोकाकोला कहता हुआ। विजय बाबू चहक कर बोले।

अच्छा आमिर खान। वो तो मुझे भी ठीक लगता है। बल्कि सारे खानों में सबसे सही वही है। वो तीसरा सलमान खान तो मुझे एक आँख नहीं भाता। हमेशा कुछ न कुछ घपला करे रखता है।

हम तो टीवी पर ही देखते हैं अशोक बाबू फिल्में आदि। ​सिनेमा गये तो सालों हो गये। इस सलमान खान की भी एक फिल्म अभी दुबारा देखी थी हम आपके हैं कौन। ये बहुत अच्छी लगी हमें। वैसे अब तो खान ही खान हैं फिल्मों में। अभी फिरोज खान का पुत्र ही जम नहीं पाया था कि संजय खान के पुत्र ने दस्तक देनी शुरू कर दी। पटौदी के साहबजादे हैं ही पहले से। और भी कई होंगें।

विजय बाबू खान तो हमेशा रहे हैं फिल्मों में। ये आपका दिलीप कुमार है तो ये भी कुछ खान ही। इन खानों का मन ही फिल्मों में लगता है।

हाँ अशोक बाबू उधर खान और इधर खन्ना। राजेश खन्ना विनोद खन्ना और अब इनकी सन्तानें। कपूर खानदान तो है ही हमेशा से।

हाँ जी अब तो खानदानी व्यवसाय बन गया है। बच्चन परिवार, देयोल परिवार, चोपड़ा परिवार, रोशन परिवार, कपूर परिवार, भट्ट परिवार। जैसे पहले व्यापारिक संस्थायें हुआ करती थीं एंड संस के नाम से फिल्मों में भी बाकायदा लिखा जाने लगेगा फलाना एंड संस।

अब तो अशोक बाबू ऐसा लगने लगा है कि बाहर के लोग जिनका कोई नहीं है फिल्म इंडस्ट्री में फिल्म लाइन में घुस ही नहीं पायेंगें।

सही बात है। किसी भी उद्योग में सीमित पैसा होता है। जब सारा पैसा इन स्टार संस और डॉटरों पर लग जायेगा तो बाहर से आने वालों को कौन घास डालेगा और कहाँ से डालेगा?

अजी अब तो टीवी पर भी इन फिल्म वालों का ही कब्जा होता जा रहा है। स्टार प्लस पर आप ये समझो कि कम से कम चार पाँच सीरियल रोज़ आते हैं जितेन्द्र की बेटी एकता कपूर के। करिश्मा कपूर और श्रीदेवी आ ही रही थीं सहारा टीवी पर अब हेमा मालिनी भी आने लगीं।

विजय बाबू हमारी तो समझ में आता नहीं कि हेमा मालिनी को क्या जरूरत है सीरियल आदी करने की। एक फिल्म क्या हिट हो गयी अमिताभ बच्चन के साथ फिर से मैदान में कूद पड़ीं। अब एक तरफ तो इनकी बिटिया फिल्मों में है और ये अभी तक मोह नहीं छोड़ पा रही। ये हालत तो तब है जबकि ये सांसद भी हैं। जाने कब ये जनता के लिये समय निकाल पाती होगीं जाने कौन तो इन्हे संसद में भेज देता है?

अजी ये तो इनकी मर्जी फिल्म या सीरियल करें न करें। आखिरकार इन लोगों का व्यवसाय तो यही है। जीने के लिये कमायेंगे तो है ही। और हेमा मालिनी को तो आपकी भाजपा ने ही संसद में भेजा है और इस बार तो इनके पतिदेव धर्मेन्द्र को भी भेज दिया है। भाजपा का तो पूरा इरादा टीवी वाली तुलसी को भी भेजने का था दिल्ली से संसद में पर दिल्ली की जनता को तुलसी जमी नहीं। विजय बाबू चुटकी लेते हुये बोले।

देखो विजय बाबू ऐसा तो है नहीं कि खाली मेरी भाजपा ही भेज रही है इन फिल्मी ​सितारों को संसद में। इसी लोकसभा में सुनील दत्त और गोविन्दा आये कांग्रेस के टिकट से जीतकर। जया प्रदा और राज बब्बर आये सपा के टिकट पर। सपा ने ही जया बच्चन को भेजा राज्य सभा में। और ये अमिताभ बच्चन आज भले ही सपा के साथ खड़े दिखायी दे रहें हों इन्हे राजनीति में तो राजीव गांधी ही लाये थे कांग्रेस की ओर से। अशोक बाबू कुर्सी पर पहलू बदल कर बोले।

ऐसा है अशोक बाबू सुनील दत्त का मामला ऐसा तो है नहीं कि सीधे फिल्मों से संसद में जाकर बैठ गये हों। सालों से समाजसेवा के काम में जुटे रहे। आतंकवाद से जलते पंजाब में पदयात्रा निकालने गये थे अस्सी के दशक के मध्य में। दत्त साहब आज से तो सांसद हैं नहीं। ऐसा नहीं है कि फिल्म वालों पर कोई पाबन्दी है राजनीति में आने की। पर आप यदि ये कह रहे हैं कि खाली अपनी सेलिब्रिटी छवि का सहारा लेकर ये लोग राजनीति में घुस जाते हैं जो कि गलत है तो मैं भी आपकी बात से सहमत हूँ। खाली फिल्मी ​सितारे ही नहीं बल्कि सब तरह के ​सितारों के लिये ये बात सच है। इनमें से जो लोग ऐसा समझते या करते हैं कि जब और धंधे बन्द हो जाते हैं तो राजनीति में घुसने की कोशिश करने लगते हैं तो ये राजनीतिक दलों राजनीति और देश सबका नुकसान ही ज्यादा करते हैं।

भाजपा तो इसीलिये इन फिल्मी सितारों या अन्य ​सितारों को टिकट दिया नहीं करती थी। शत्रुघन सिन्हा को भी पार्टी से जुड़ने के सालों बाद टिकट दिया। अशोक बाबू कुछ फख्र से बोले।

देखो अशोक जी गलत बयानबाजी़ तो आप करो मत। आपको शायद याद न हो सबसे पहले शत्रुघन सिन्हा, वी.पी.​सिंह के सर्मथन में उतरे थे। ये तो याद नहीं कि ये उनके साथ घूमे भी थे या नहीं पर बयानबाजी अच्छी खासी की थी। और राज बब्बर भी वी.पी के सर्मथन में ही कूदे थे जब वी.पी ने राजीव गांधी के खिलाफ बोफोर्स मामले में ताल ठोक रखी थी सन सतासी के आसपास। वो तो बाद में शत्रुघन ​सिन्हा भाजपा में जा पहुँचे और राज बब्बर सपा में। सपा के बढ़ने में खासा पसीना बहा है राज बब्बर का भी। और ऐसा नहीं है कि शत्रुघन ​सिन्हा को बहुत बाद में टिकट दिया गया हो। ये सन इक्यानवें के लोकसभा चुनाव के बाद दिल्ली में हुये उपचुनाव में राजेश खन्ना के खिलाफ भाजपा की ओर से लड़े थे। इस सीट पर पहले आडवाणी जीते थे राजेश खन्ना को ही हराकर पर उनके पास शायद गांधीनगर की सीट भी थी और उन्होने दिल्ली की सीट छोड़ दी थी। उपचुनाव में शत्रुघन ​सिन्हा हार गये थे राजेश खन्ना से और फिर सालों तक भाजपा उनका उपयोग केवल चुनाव के समय भीड़ जुटाने में ही करती रही और बाद में राज्यसभा में ले लायी। और आपको शायद याद आ जाये कीर्ति आजाद चेतन चौहान रामायण वाली सीता यानि दीपिका रावण यानि अरविन्द त्रिवेदी महाभारत के कृष्ण यानि नीतिश भारद्वाज व अन्य की जो भाजपा द्वारा सिर्फ संसद की सीटें जीतने के लोभ में राजनीति में लाये गये थे। जबकि इनमें से किसी का भी समाज सेवा से न पहले मतलब था और न ही बाद में रहा। आखिर जीतने के बाद तो ऐसे ​सितारों को गम्भीर हो जाना चाहिये राजनीति के प्रति।

चलो विजय बाबू मान लिया भाजपा ने भी ​सितारों को टिकट दे दिया। अशोक बाबू कुछ हार मानते हुये बोले। पर ये सारी शुरूआत तो कांग्रेस द्वारा की गयी थी। हमारे पास तो रिकार्ड है नहीं कि कौन कब कहाँ से खड़ा हुआ पर टक्कर में आने को भाजपा को भी ​सितारों की मदद की मदद लेनी पड़ी। कांग्रेसियों ने कितनी फजीहत की बेचारे धर्मेन्द्र की इस चुनाव में। कितना कीचड़ उछाला हेमामालिनी से शादी को लेकर? अशोक बाबू रोष से बोले।

अशोक बाबू हमें तो ये पता है कि आजकल राजनीति का जो स्तर हो गया है उसमें धर्मेन्द्र किसी भी पार्टी से खड़े होते विपक्षी दल यही सब बातें उठाते। हर दल यही सब कर रहा है। शरीफ आदमी है धर्मेन्द्र। पता नहीं क्यों राजनीति के चक्कर में आ जाते हैं ऐसे लोग। वर्तमान की राजनीति का ताप सहना इतना आसान नहीं है। मुझे तो एक बात पता है कि किसी खास राजनीतिक दल से जुड़कर ये फिल्मी ​सितारे अपना नुकसान ही ज्यादा करते हैं। अगर फिल्मों में काम न करना हो आगे तो बात अलग है वरना इन लोगों को बचना चाहिये सक्रिय राजनीति से। समाज सेवा तो आप कैसे भी कर सकते हो। भारत की जनता भावनात्मक रूप से बहुत परिपक्व नहीं है। और जब ये फिल्मी ​सितारे राजनीति में आ टपकते हैं तो अपना मार्केट ही डाउन करते हैं क्योंकि जब तक सत्तारूढ़ दल के साथ हैं तब तक तो ठीक है पर यदि वही दल हार जाये तब? भाई या तो आपके कुछ अपने राजनीतिक विचार हों और आप पूरे तौर पर राजनीति में आ जायें। पर ये हिन्दी ​सिनेमा वाले लोग दोनो नावों की सवारी करना चाहते हैं और कुछ तो पावर के लोभ में राजनीति की ओर दौडते़ हैं।

ना जी विजय बाबू भाजपा कभी ये काम ना करती यदि धर्मेन्द किसी विपक्षी दल के टिकट पर खड़े होते। भाजपा कभी व्यक्तिगत जीवन पर आक्षेप ना लगाती। भाजपा की ट्रेनिंग ही ऐसी नहीं है। भाजपा कभी शालीनता नहीं छोड़ती। सारी दुनिया जानती रही है बच्चन परिवार की नेहरू–गांधी परिवार से निकटता को। पर जब अटल जी पी.एम थे तो एक समारोह में डा. हरिवंश राय बच्चन की जमकर तारीफ की थी और ग्वालियर का उनसे जुड़ा हुआ कोई प्रसंग सुनाया था। अशोक बाबू गर्व से बोले।

अशोक जी आप मेरा मुँह न खुलवाओ। चलो आप पहले बच्चन जी की ही बात ले लो। अटल जी ने बच्चन जी की तारीफ की होगी उनके रचे साहित्य के कारण। बच्चन जी के साहित्य की गुणवत्ता और उनकी प्रसिद्धि से सब वाकिफ हैं। हरेक के अपने अपने क्षेत्र हैं। अब आप ये बुरा न मान जाना कि मैं अटल जी की कविताओं की बुराई कर रहा हूँ या उन्हे साहित्यकार के रूप में कम आँक रहा हूँ। पर हाँ उनके प्रधानमंत्री बनने से पहले हमने कभी उनकी कविता नहीं सुनी थी। मुझे याद है कई साल पहले अटल जी अमेरिका गये थे किसी सर्जरी के ​सिलसिले में और वहाँ से धर्मयुग या नवभारत टाइम्स के लिये एक संवेदनशील लेख लिख कर भेजा था। बहुत अच्छा लगा था पढ़कर। उनके साहित्यप्रेमी होने और अच्छा लिखने की क्षमता के बारे में तो कोई सन्देह है नहीं।

थोड़ा ठहरकर विजय बाबू बोले अब बच्चन जी तो रहे नहीं। पर जब अमिताभ बच्चन इलाहाबाद से एम.पी. थे और वी.पी.सिंह सारे देश में राजीव गांधी के विरूद्ध बोफोर्स की अलख जगाते हुये घूम रहे थे तो अटल जी ने भी सारे भारत में बच्चन और नेहरू–गांधी परिवार के खिलाफ मोर्चा संभाला हुआ था। हमने तो तभी अटल जी को साक्षात सुना था। अटल जी ने गरज कर कहा था कि बच्चन जी कहते हैं कि यदि उनके पुत्रों को परेशान किया गया तो वे भी जबान खोल देंगें। अटल जी ने बच्चन जी को मुँह खोलने की चुनौती दी थी और ललकार कर कहा था कि बच्चन परिवार को बताना पड़ेगा कि बोफोर्स की दलाली का पैसा कहाँ गया। तब ये बच्चन परिवार की किसी लोटस कम्पनी का जिक्र किया करते थे।

अजी अटल जी राजनीति में थे तो ​स्थितियों का फायदा तो उठाते ही। वे विपक्ष में थे उनका काम ही था मामले को हर जगह उठाना। वे भला क्यों बच्चन या राजीव गांधी परिवार पर लगे आरोपों से मुक्त होने में उनकी सहायता करते।। अशोक बाबू कुर्सी पर कमर पीछे टिकाते हुये बोले।

…जारी…

दूसरी किस्त : बतकही – सोनिया गाँधी और संघ परिवार

तीसरी किस्त :बतकही – उदारीकरण और भारत

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