Posts tagged ‘mother’

जुलाई 21, 2017

माँ – अनोखे रूप

काशी दशाश्वमेघ घाट पर अनेक छोटे-बड़े मंदिर हैं, उन्ही में से एक छोटा- सा मंदिर गंगा में अधडूबा सा है, नौका-विहार करते समय एक मल्लाह  ने मुझे उस भग्न अध डूबे मंदिर की कहानी सुनाई|

एक बुड्ढी विधवा थी, उसका एक बेटा था| बुढ़िया ने मेहनत मजदूरी करके बेटे को पढ़ाया-लिखाया| बेटा बुद्धिमान था, पढ़-लिखकर बड़ा अफसर बन गया|वह अपनी माँ के दिन भूला नहीं , गंगा-तट पर उसने मंदिर बनवाया|

मंदिर बन गया तो माँ से बोला – माँ तूने मेरे लिए इतना किया| मैंने तेरे लिए मंदिर बनवा दिया है, अब तू इधर-उधर मत जा| इसी मंदिर में भगवान की पूजा कर| तूने मेरे लिए इतना किया मैंने भी मंदिर बनवा कर तेरे ऋण से मुक्त हो गया|

कहते हैं कि जैसे ही बेटे ने कहा- मैं तेरे ऋण से मुक्त हो गया वैसे ही मंदिर टूटकर गंगा जी में डूब गया|

मल्लाह ने मुझे बताया – वह यही मंदिर है|

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मेरे स्वर्गीय मित्र डॉ. बिंदु माधव मिश्र की वृद्धा माता बीमार थीं| ९० से ज्यादा की उम्र थी| लोग उनके स्वास्थ्य को लेकर बहुत चिंतित थे| घर भर सेवा में लगा था|

मैं भी उन्हें देखने गया, चरण स्पर्श किया, बोलीं – सोचती हूँ इतने जाड़े में मरी तो बच्चों को बड़ी तकलीफ होगी, किरिया कर्म, सर मुंडाना, सर्दी लग जायेगी|

(विश्वनाथ त्रिपाठी)

साभार: कथादेश, जून २०१७

मई 8, 2016

माँ – एक चित्रकार और एक कवि की निगाहों से

Mother Child-001

Painting : Gustav Klimt , कविता – असद जैदी

जून 7, 2010

शिशु जन्म : ममता नहीं सुरक्षित केवल स्त्री के लिये

शिशु को जन्म देने का विशेष अहसास ही ऐसा प्रतीत होता है जो मानव और पशु दोनों वर्गों की स्त्री प्रजाति में एक जैसा है। एकदम शांत किस्म के जानवरों की मादाओं को भी अपने नवजात शिशु की रक्षा के लिये आक्रामक रुख अपनाते हुये देखा गया है।

नीचे दिये गये वीडियो में देखा जा सकता है कि धरती की सतह पर चलने वाले सबसे बड़े चौपाये जीव समूह की मादा हाथी कैसे अपने अभी अभी जन्मे शिशु हाथी के निश्चल पड़े शिशु की काया को देख वह बैचेन हो उठी है और अपने शिशु को साँस लेने के लिये प्ररित करने के लिये किये प्रयासरत हो जाती है। बिना देखे हुये भी अपने विशाल शरीर को मादा हाथी इस तरह से हिला डुला रही है जिससे शिशु के ऊपर उसका पैर न पड़ जाये। उसकी सहायता के लिये कोई डाक्टर या नर्स या दाई नहीं है। सब कुछ उसे अपने आप ही करना है। उसे जीवन की पहली साँस लिवाने के बाद वह इस बात के लिये प्रयासरत है कि अब उसका शिशु अपने मुँह से कुछ आवाज निकाले और सब कुछ सामान्य करने के बाद वह शिशु को अपने पैरों पर खड़ा होने के लिये प्रेरित करने में लग जाती है और तभी चैन की साँस लेती है जब शिशु के साथ सब कुछ सामान्य हो जाता है। उसके प्रयास संवेदनशील ह्र्दय वाले व्यक्तियों की आँखों में आँसू ला सकते हैं।

वाह! प्रकृति कितनी खूबी और खूबसूरती से सब जीवों को संभालती है।

सावधानी की नैतिक सलाह : अगर किसी को शिशु के जन्म लेने की प्रक्रिया देखने में अजीब महसूस होता है तो वे कृपया इस वीडियो को न देखें हाँलाकि यह भी सच है कि न देखने वाले एक विलक्षण दृष्य को देखने से वंचित रह सकते हैं।

मई 20, 2010

मातृत्व की विरासत

माँ,
क्या कभी भी बड़ी हो पाती है अपने बच्चों की बढ़ती उम्र के साथ?
क्यों उसके अन्दर आधुनिक जमाने की समझदारी नहीं आती?

बड़े होकर बच्चे अपनी अपनी राह पकड़ कर चल देते हैं
वे आगे चले जाते हैं अपनी जिन्दगी जीने
माँ को पीछे छोड़कर।

माँ जानती है इस बात को शुरु से
पर फिर भी वह क्यों नहीं अपनी जिन्दगी जीती?

वह तो खाना भी वही खाती है
जो उसके दूध के रास्ते बच्चे को नुकसान न पहुँचाये।

बड़े होते बच्चे इस बात को नहीं समझ पाते कि
माँ ने कितनी ही रातों की नींद त्याग दी थी
उन्हे शांति से सुलाने के लिये।

वे नहीं जान पाते इस बात को कि
माँ बिस्तर के उस हिस्से पर लेटी रहीं
जो उन्होने गिला किया था
और उन्हे सूखे में आराम से सुला दिया गया था।

जब भी प्रश्न बच्चों का आता है,
मेरा, अपना, सिर्फ मेरे लिये जैसे शब्दों से
हरदम घिरी रहने वाली दुनिया में
माँ ही क्यों इन शब्दों को महत्व नहीं देती?

इस रहस्य को लोग तब समझ पाते हैं
जब उनके अपने बच्चे हो जाते हैं
तब वे समझ पाते हैं कि
किसी माँ के लिये अपने
बच्चों के जीवन को ऊपजाऊ बनाने के लिये
खुद को खाद बनाने का मतलब क्या होता है?

…[राकेश]

मई 3, 2010

नेह भरा काजल

बचपन,
कभी लगता है कि बस अभी ही तो बीता था,
और आज भी इतना पास है कि हाथ बढ़ाया और छू लिया,
और कभी लगता है कि किसी और ही जन्म में
बचपन भी जीवन में आया था।

पर जब जब बचपन
इसी जन्म की बात लगता है,
तब यह आकर बिल्कुल पास में बैठा रहता है,
आज फिर से यह सखा बन कर तन-मन को स्पर्श करे बैठा है|

कौंच कौंच कर याद दिला रहा है,

माँ अक्सर उस दिए से कालिख लेकर,
जो वह पूजा के लिए देसी घी से जलाया करती थी,
मेरी आँखों में काजल लगाया करती थी,
कहा करती थी,
काजल लगाने से
आखें बड़ी होंगी,
नजर कमजोर नहीं होगी,
और
जमाने की बुरी निगाहों से बचायेगा काला काजल|

इतने बरस बीत गए,
बचपन पीछे छूट गया,
पहले अपने घर से दूर आना पड़ा,
फ़िर अपने शहर से दूर आना पड़ा,
शिक्षा लेने की जरुरत जो न करवा दे,
फ़िर एक दिन अपने देश से भी दूर आना पड़ गया|

माँ आज बहुत याद आ रही है,
आज माँ का काजल लगाना भी याद आ रहा है,
आज बचपन बहुत याद आ रहा है,
साथ याद आ रही है एक एक बात,
जो बीते ज़माने की है,
पर लगती बिल्कुल अभी की हैं|

एक स्नेह भरे काजल की याद,
जाने कहाँ कहाँ ले जाती है,
एक ममता भरा स्पर्श,
जो यूँ तो हमेशा साथ रहता है,
पर केवल एक अहसास की तरह,
और उसके भौतिक साथ की
जरुरत अक्सर महसूस होती है,
आज इतने बरसों बाद
आसुओं ने बहा दिया जिसे,
जाने वह माँ का लगाया काजल था
या उसके स्नेह भरे सुरक्षा कवच का अहसास|

…[राकेश]

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