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नवम्बर 24, 2013

प्रथम प्रेम-मिलन

तब क्या होगाsilentlove-001

जब मुखातिब होंगे

हम तुम,

होंठो पे जमी बर्फ को

कैसे पार करेंगे लफ्ज़ तब?

बहुत समय से लफ्ज़ जमे हैं लब पे

तपते हुए लबों से अपने पिघला सको तो

पी सकोगे इन्हें

पर देह के कम्पन अनुनाद में

पुल टूट नहीं जायेंगे क्या?

थरथराते लब

क्या इतनी ही आसानी से

कह सकेंगे तब –

मुझे तुमसे प्यार है…

होगी दरकार आवाज़ की मौन को

या कि

मौन खुद ही आवाज़ बनेगा?

अगर सुनोगी मेरे सीने पे अपना सर  रखकर

तुम अपना नाम

मेरी आती जाती साँसों में

ये तो झंझावत में न

बदल जायेंगी क्या?

तुम्हारी मादक  देह गंध

रहने देगी ज़मीन पैरों तले क्या?

गिरने से कैसे बचाएंगी बाहें तुम्हारी?

क्या होगी उतनी ही तेज़ तुम्हारी सांसें भी?

उठाना गिरना वक्ष का कैसे सिमट पायेगा आँखों में?

हाथ में रखा हाथ कापेंगें नहीं क्या?

शिकायत

इनकार

इज़हार

मनुहार

रूठना

मनाना

लाज शर्म

मिलन विरह

पास दूर

सारे ये शब्द खो नहीं  जायेंगे क्या

आवेशित हृदयों के स्पंदन में?

प्रथम प्रेम मिलन में होगा क्या?

इसी सब में

घिरा बैठा रहता हूँ

दिन रात आजकल…

Rajnish sign

मार्च 12, 2012

सौ बार कहेंगे

तुम आये तो रंग मिले थे

गए तो पूरी धूप गयी

शायद इसको ही कहते हैं

किस्मत के हैं रूप कई

भटकी हुयी नदी में कितनी बार बहेंगे हम|

फूल-फूल तक बिखर गए हैं

पत्ते टूट गिरे शाखों से

एक तुम्हारे बिना यहाँ पर

जैसे हों हम बिना आँखों के

फिर भी इस अंधियारे जग में हंस कर यार रहेंगे हम|

ह्रदय तुम्हारे हाथ सौंपकर

प्यार किया पागल कहलाये

तुमसे यह अनमोल भेंट भी

पाकर कभी नहीं पछताए

यहीं नहीं उस दुनिया में भी यह सौ बार कहेंगे हम|

संधि नहीं कर सके किसी से

इसलिए प्यासा यह मन है

इतने से ही क्या घबराएं

यह तो पीड़ा का बचपन है

इसे जवान ज़रा होने दो वह भी भार भी सहेंगे हम|

मिलने से पहले मालूम था

अपना मिलन नहीं होगा प्रिय

अब किस लिए कुंडली देखें

कोई जतन  नहीं होगा प्रिय

कल जब तुम इस पार रहोगे तब उस पार रहेंगे हम …

{कृष्ण बिहारी}

मई 29, 2010

पुनर्मिलन


दूर कहीं एक तारा टूटा
पास यहीं एक कोयल कूकी

पास यहीं किसी ने यादें उगायीं
दूर कहीं किसी ने हिचकी ली

दूर कहीं किसी के नयनों में अश्रु छलके
पास यहीं किसी ने आँखे पोंछी

पास यहीं किसी ने ऊपर उड़ता जहाज देखा
दूर कहीं किसी ने चाँद को आँखों से पिया

दूर कहीं किसी ने उपवास किया
पास यहीं किसी ने सालों बाद खट्टे बेर चखे

पास यहीं किसी ने नज़्म पढ़ी
दूर कहीं किसी ने सितार छुआ

दूर कहीं किसी से लिपट गया एक मासूम बालक
पास यहीं किसी के काँधे झूल गया एक नन्हा बालक

पास यहीं से कोई काँपता हुआ उठा, चला और सो गया
दूर कहीं से कोई काँपता हुया उठा, चला और सो गया

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दूर कहीं से कोई दशकों और हजारों मीलों के फासले तय कर गया
पास यहीं से कोई दशकों और हजारों मीलों के फासले तय कर गया

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महसूस सबको हुआ होगा
जब क्षण भर को बिजली कौंधी थी
जब क्षण भर को बादल गरजे थे
जब क्षण भर को पक्षी मौन हुये थे
जब क्षण भर को चंदा सूरज एक साथ थे
जब क्षण भर को पेड़ पौधे फूल सब सिहर उठे थे
जब क्षण भर को पानी बरसा था
दो आत्माओं का मिलन हुआ था बस तभी।

…[राकेश]

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