Posts tagged ‘Mehfil’

दिसम्बर 4, 2013

सर्द काली रात का इलजाम

इंतज़ार की रातेंtum-001

ठंडी

काली

लम्बी अँधेरी  सुरंग जैसी

पता  नहीं

रहूँगा भी या नहीं

मिलने तक

एक कतरा रौशनी|

तुम न थीं जब

तो जिंदा था ही

पर दुनिया ऐसी ही थी…

बस खुद में मैं नहीं था,

बदला क्या है तुमसे…

मैं कभी समझूंगा भी या नहीं…

तुम्हारे न होने से मैं

मर तो नहीं जाऊँगा लेकिन…

तुम्हारे बाद लेकिन फिर

मैं…

मैं रहूँगा भी या नहीं…

हरेक तन्हाई में तुम मेरे पास होती हो

तुम्हारे बिन

हरेक महफ़िल में

तन्हा ही रहूँगा मैं…

तेरी निगाहें-मुहब्बत का अहसान है मुझ पे

औ’ मेरी हर सर्द काली रात का  इलजाम  है तुझ  पे

Rajnish sign

सितम्बर 13, 2011

ज़हर भी है मुस्कान में

 

काबे में मिले ना हमको सनमखानों
कुछ होश वाले जो मिले मयखानों में

मेरे जुनूं को तलाश जिस होश की है
फरजानों में पाया न मिला दीवानों में

अक्ल के फ़रमान सहन होते किससे
शुक्रिया तेरा जो रखा हमें दीवानों में

हुस्न, इश्क, यारी, ईमान, अकीदे खुदा
क्या नहीं बिकता है आज दुकानों में

मौत को भी जाने ठौर मिले न मिले
जिंदगी तो कटी किराए के मकानों में

कसले दौर में सांस लेने की है सज़ा
कांटे उग आये लोगों  की ज़बानों में

कभी खापों के रुलाते फैसले भी देख
लैला मजनू तो पढ़े तूने दास्तानों में

नर्म मैदान ने गंदा कर के खा लिया
नदी पाक थी जब तक बही चट्टानों में

हँसी की महफ़िल में ज़रा होश आलम
ज़हर का भी पुट होता है मुस्कानों में

(रफत आलम)

फरजानों – बुद्धिमानों , फ़रमान – आदेश

%d bloggers like this: