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जून 13, 2011

अमर गान कैसे हो?

सागर किनारे पहुंचा मैं!

लहरें गा रही थी
अथाह गहराई में बैठा
गुनगुना रहा था कोई
वही अमर गीत
जिसकी मुझे तलाश थी।

चमन की राह से गुज़रा मैं!

फूलों का दिल बन कर
खुशबूओं में फैला रहा था कोई
वही अमर गीत
जिसकी मुझे तलाश थी।

आकाश को तकने लगा मैं !

तारों की महफ़िल में
चांदनी को सुना रहा था कोई
वही अमर गीत
जिसकी मुझे तलाश थी।

वही अमर गीत!
रुमी-तुलसी की ज़बान में है
कबीर-नानक के बयान में है
सूर–मीरा के भक्तिभाव में डूबा
राधा-किशन के बखान में है।
मासूमियत का अहसास बन कर
बच्चे की कोमल मुस्कान में है
प्रीत की कसोटी बनकर
लैला-मजनू की दास्तान में है
इश्क की बुलंदिया छूता हुआ
खुसरो ओ रसखान में है
ग़ालिब–निराला की भाषा बन कर
कविता की आन-बान में है
मंजिलों का पता देता
पक्षियों की उड़ान में है।

खय्याम से मस्ती में गवा रहा है कोई!
प्यारे, तू किराए के मकान में है।

जिस्म में रूह फूंकने वाले ने
मेरे शब्दों को शान नहीं बख्शी
कवि का दिल दे तो दिया
कलम को जान नहीं बख्शी

वह अमर गीत कैसे गाता मैं?

(रफत आलम)

जनवरी 1, 2011

शाश्वत रहेगा प्यार …(कविता – कृष्ण बिहारी)

 

तुम्हे देखने के लिये
कभी पीछे नहीं मुड़ा मैं
गुजरते वक्त्त के साथ-साथ
तुम चलती रही हो साथ ही मेरे
एक परछाई की तरह
सम – विषम राहों पर।

दूरियों का भी मुझे
कभी हुआ नहीं एहसास
ऎसा भी लगा नहीं कभी
कि तुम नहीं हो मेरे पास
तुम्हारी याद रह रही है
मेरे साथ
एक सघन विश्वास की तरह
आस्था बनकर।

तुम्हारे लिखे प्रेम-पत्रों को
इसलिये नहीं पढ़ता बार-बार
कि तुम्हारी याद को
रखना है ताजा
नहीं ऐसा नहीं है…
पत्र नहीं पढ़ता हूँ मैं
तुम्हे पढ़ता हूँ
एक महाकाव्य की तरह
जिज्ञासु होकर
और पाता रहता हूँ ब्रहमानंद।

अरसा गुजरने के बाद भी
भूल पाता है कोई
एक बार बस गई मेंहदी की गंध
अपनी आत्मा में रचाकर, बसाकर।

तुम मीरा हो, राधा हो
मेरे लिये
परकाया प्रवेश की तरह
उतरती हो तुम उनमें
और इच्छा धारियों की तरह
मेरा प्रेम
धरता रहा है रुप
ढ़ालता रहा है स्वयं को
तुम्हारे अनुरुप
होता रहा है युवा और नवीन
आने वाली पीढ़ियों के लिये
एक अमिट अनुभव की तरह
थाती बनाकर।

किसी को यकीन दिलाने का
कसमें खाने का
प्रश्न ही नहीं उठता
क्योंकि
मरकर भी प्रेम
कभी नहीं मरता
शाश्वत है
और शाश्वत रहेगा प्यार
धरती पर

{कृष्ण बिहारी}

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