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मई 23, 2016

मुसलमान … (देवी प्रसाद मिश्र)

कहते हैं वे विपत्ति की तरह आए
कहते हैं वे प्रदूषण की तरह फैले
वे व्याधि थे

ब्राह्मण कहते थे वे मलेच्छ थे

वे मुसलमान थे

उन्होंने अपने घोड़े सिन्धु में उतारे
और पुकारते रहे हिन्दू! हिन्दू!! हिन्दू!!!

बड़ी जाति को उन्होंने बड़ा नाम दिया
नदी का नाम दिया

वे हर गहरी और अविरल नदी को
पार करना चाहते थे

वे मुसलमान थे लेकिन वे भी
यदि कबीर की समझदारी का सहारा लिया जाए तो
हिन्दुओं की तरह पैदा होते थे

उनके पास बड़ी-बड़ी कहानियाँ थीं
चलने की
ठहरने की
पिटने की
और मृत्यु की

प्रतिपक्षी के ख़ून में घुटनों तक
और अपने ख़ून में कन्धों तक
वे डूबे होते थे
उनकी मुट्ठियों में घोड़ों की लगामें
और म्यानों में सभ्यता के
नक्शे होते थे

न! मृत्यु के लिए नहीं
वे मृत्यु के लिए युद्ध नहीं लड़ते थे

वे मुसलमान थे

वे फ़ारस से आए
तूरान से आए
समरकन्द, फ़रग़ना, सीस्तान से आए
तुर्किस्तान से आए

वे बहुत दूर से आए
फिर भी वे पृथ्वी के ही कुछ हिस्सों से आए
वे आए क्योंकि वे आ सकते थे

वे मुसलमान थे

वे मुसलमान थे कि या ख़ुदा उनकी शक्लें
आदमियों से मिलती थीं हूबहू
हूबहू

वे महत्त्वपूर्ण अप्रवासी थे
क्योंकि उनके पास दुख की स्मृतियाँ थीं

वे घोड़ों के साथ सोते थे
और चट्टानों पर वीर्य बिख़ेर देते थे
निर्माण के लिए वे बेचैन थे

वे मुसलमान थे

यदि सच को सच की तरह कहा जा सकता है
तो सच को सच की तरह सुना जाना चाहिए

कि वे प्रायः इस तरह होते थे
कि प्रायः पता ही नहीं लगता था
कि वे मुसलमान थे या नहीं थे

वे मुसलमान थे

वे न होते तो लखनऊ न होता
आधा इलाहाबाद न होता
मेहराबें न होतीं, गुम्बद न होता
आदाब न होता

मीर मक़दूम मोमिन न होते
शबाना न होती

वे न होते तो उपमहाद्वीप के संगीत को सुननेवाला ख़ुसरो न होता
वे न होते तो पूरे देश के गुस्से से बेचैन होनेवाला कबीर न होता
वे न होते तो भारतीय उपमहाद्वीप के दुख को कहनेवाला ग़ालिब न होता

मुसलमान न होते तो अट्ठारह सौ सत्तावन न होता

वे थे तो चचा हसन थे
वे थे तो पतंगों से रंगीन होते आसमान थे
वे मुसलमान थे

वे मुसलमान थे और हिन्दुस्तान में थे
और उनके रिश्तेदार पाकिस्तान में थे

वे सोचते थे कि काश वे एक बार पाकिस्तान जा सकते
वे सोचते थे और सोचकर डरते थे

इमरान ख़ान को देखकर वे ख़ुश होते थे
वे ख़ुश होते थे और ख़ुश होकर डरते थे

वे जितना पी०ए०सी० के सिपाही से डरते थे
उतना ही राम से
वे मुरादाबाद से डरते थे
वे मेरठ से डरते थे
वे भागलपुर से डरते थे
वे अकड़ते थे लेकिन डरते थे

वे पवित्र रंगों से डरते थे
वे अपने मुसलमान होने से डरते थे

वे फ़िलीस्तीनी नहीं थे लेकिन अपने घर को लेकर घर में
देश को लेकर देश में
ख़ुद को लेकर आश्वस्त नहीं थे

वे उखड़ा-उखड़ा राग-द्वेष थे
वे मुसलमान थे

वे कपड़े बुनते थे
वे कपड़े सिलते थे
वे ताले बनाते थे
वे बक्से बनाते थे
उनके श्रम की आवाज़ें
पूरे शहर में गूँजती रहती थीं

वे शहर के बाहर रहते थे

वे मुसलमान थे लेकिन दमिश्क उनका शहर नहीं था
वे मुसलमान थे अरब का पैट्रोल उनका नहीं था
वे दज़ला का नहीं यमुना का पानी पीते थे

वे मुसलमान थे

वे मुसलमान थे इसलिए बचके निकलते थे
वे मुसलमान थे इसलिए कुछ कहते थे तो हिचकते थे
देश के ज़्यादातर अख़बार यह कहते थे
कि मुसलमान के कारण ही कर्फ़्यू लगते हैं
कर्फ़्यू लगते थे और एक के बाद दूसरे हादसे की
ख़बरें आती थीं

उनकी औरतें
बिना दहाड़ मारे पछाड़ें खाती थीं
बच्चे दीवारों से चिपके रहते थे
वे मुसलमान थे

वे मुसलमान थे इसलिए
जंग लगे तालों की तरह वे खुलते नहीं थे

वे अगर पाँच बार नमाज़ पढ़ते थे
तो उससे कई गुना ज़्यादा बार
सिर पटकते थे
वे मुसलमान थे

वे पूछना चाहते थे कि इस लालकिले का हम क्या करें
वे पूछना चाहते थे कि इस हुमायूं के मक़बरे का हम क्या करें
हम क्या करें इस मस्जिद का जिसका नाम
कुव्वत-उल-इस्लाम है
इस्लाम की ताक़त है

अदरक की तरह वे बहुत कड़वे थे
वे मुसलमान थे

वे सोचते थे कि कहीं और चले जाएँ
लेकिन नहीं जा सकते थे
वे सोचते थे यहीं रह जाएँ
तो नहीं रह सकते थे
वे आधा जिबह बकरे की तरह तकलीफ़ के झटके महसूस करते थे

वे मुसलमान थे इसलिए
तूफ़ान में फँसे जहाज़ के मुसाफ़िरों की तरह
एक दूसरे को भींचे रहते थे

कुछ लोगों ने यह बहस चलाई थी कि
उन्हें फेंका जाए तो
किस समुद्र में फेंका जाए
बहस यह थी
कि उन्हें धकेला जाए
तो किस पहाड़ से धकेला जाए

वे मुसलमान थे लेकिन वे चींटियाँ नहीं थे
वे मुसलमान थे वे चूजे नहीं थे

सावधान!
सिन्धु के दक्षिण में
सैंकड़ों सालों की नागरिकता के बाद
मिट्टी के ढेले नहीं थे वे

वे चट्टान और ऊन की तरह सच थे
वे सिन्धु और हिन्दुकुश की तरह सच थे
सच को जिस तरह भी समझा जा सकता हो
उस तरह वे सच थे
वे सभ्यता का अनिवार्य नियम थे
वे मुसल

मान थे अफ़वाह नहीं थे

वे मुसलमान थे
वे मुसलमान थे
वे मुसलमान थे”

 

 (देवीप्रसाद मिश्र)
मार्च 15, 2011

मीर-ओ-ग़ालिब की गज़ल का सहारा

मौत की तलाश जीने का हौसला देने लगी
जिंदगी मुस्कुरा कर फिर से सजा देने लगी

लंबा था दर्द का सफर आँखों के सूखने तक
चोट पुरानी हो कर और भी मज़ा देने लगी

सुबह का भूला लुटपिट के घर को लौटा था
गिरती दीवार ही काम आई सहारा देने लगी

चौराहे पे थक कर बैठ गए जाते किधर हम
और लोगों को मंजिल खुद रास्ता देने लगी

आँखों में झिलमिलाने लगे मजारों के चिराग
सफर की थकन मंजिल का पता देने लगी

बिक गयी थी ये भी तेरे मीठे होटों की तरह
खाली एक बोतल प्यास का अंदाजा देने लगी

अहसास की रग-रग में ज़हर घोलने के बाद
जिए जाने का सबक हमें दुनिया देने लगी

नेता चालीसा बांचने वाले पुरोहितों के साथ
बस्ती! माटी के खुदाओं को सजदा देने लगी

रूठी हुई नींद पल दो पल ही आई थी पास
टीस दिल की मुझे सपने में सदा देने लगी

तन्हाई का अहसास अब नहीं होता आलम
मीर-ओ-ग़ालिब की गज़ल साथ मेरा देने लगी

(रफत आलम)

जुलाई 23, 2010

मुल्ला नसरुद्दीन: दो उपलब्धियों वाली दास्तान

युगों युगों से महान हिमालय पर्वत श्रंखला के साये में रहने वाले लोग जानते हैं कि उनके आदि पुरुष, देवों में श्रेष्ठतम स्थान पाने वाले शंकर महादेव कितने भोले थे, उन्हे तो भोले शंकर के नाम से भी जाना जाता है। मुल्ला नसरुद्दीन में भी यही भोलापन कूट कूट कर भरा था। भोले शंकर से मिलते जुलते कई गुण उनमें थे।

रावण द्वारा रचित शिव-ताण्डव-स्त्रोत को वे बहुत पसंद करते थे और उसे पूरे भाव से गाते भी थे और नाचते भी थे। उनके गायन को सुन और नृत्य को देख पाने वाले चुनींदा अतिभाग्यशाली मित्र दर्शकों के रोंगटे खड़े हो जाते थे। कुछ होने लगता था सबको।

उनके करीबियों को इस बात का पता था कि जब वे करीब पैंतीस साल के थे तो उनके एक परिचित, जिनका बहुत योगदान था पर्वतों से घिरे एक स्थान पर एक खूबसूरत से विश्वविद्यालय की शुरुआत करने में, ने उन्हे उस विश्वविद्यालय में पढ़ाने के लिये राजी कर लिया था। नसरुद्दीन उनका बेहद सम्मान करते थे अतः उन्हे राजी होना पड़ा परंतु वे राजी हुये इस शर्त पर कि वे किसी भी तरह का वेतन न लेंगे छात्रों को पढ़ाने के लिये। उन्होने कहा कि छात्रों को विद्या देकर धन न कमायेंगे, आजीविका के और बहुत सारे साधन हैं। विवाह उन्होने तब तक किया नहीं था और उनके मुताबिक एक अकेली जान को कितना पैसा चाहिये जीने के लिये? वे विवाह के खिलाफ न थे, पर जो काम वे करते थे और बाकी की जिन्दगी में उन्हे करने थे उनकी प्रकृति को देख कर उन्हे लगता था जिससे भी उनका विवाह होगा वह अकारण कुछ परेशानियाँ झेलेगी। मजाक करते हुये वे कहते थे कि वे भी बजरंग बली की तरह पचास साल तक ब्रह्मचर्य को साधना चाहते थे। हालाँकि कुछ साल बाद अड़तीस साल की आयु में उनका विवाह हुआ। कैसे हुआ, किन परिस्थितियों में हुआ, वह कथा किसी और दिन के लिये मुनासिब है।

बहरहाल, विश्वविद्यालय में पढ़ाने से इतना हुआ कि एक तो उन्हे अपनी रुचि के विषयों में शोध करने के लिये एक व्यवस्थित रास्ता मिल गया और बाद में तो वे एक घुमंतु अध्यापक बन गये। आज यहाँ ज्ञान बाँट रहे हैं तो कल किसी और जगह। विभिन्न विश्वविद्यालयों में अनेक मित्र बने, अनगिनत शिष्य और प्रशंसक बने। उनके घनघोर प्रशंसकों और शिष्यों में से एक थे शांतनु।

वे दसवीं में ही रहे होंगे जब उनके माता पिता का देहांत एक दुर्घटना में हो गया था। उनके सामने बहुत मुश्किलें आयीं पर मेहनत, सूझबूझ और अपनी प्रतिभा के दम पर पायी छात्रवृत्ति के बलबूते वे पढ़ते रहे। संयोग से उन्हे बाबा नसरुद्दीन की छत्रछाया मिल गयी।

शांतनु ने नसरुद्दीन के मार्गदर्शन में डाक्टरेट की और बाद में उनकी ही छत्रछाया में उपनिषदों पर बहुत शोध किया और एक सूक्ति ने उन्हे जीवन भर के लिये काज दे दिया। उपनिषद का वह वाक्य था,

अज्ञान तो अंधकार में रखता ही है, ज्ञान उससे भी बड़े अंधकार में धकेल सकता है“।

ये वाक्य उन्हे रात दिन कचोटता और इस एक वाक्य ने उन्हे एक सजग विधार्थी और शोधार्थी बना दिया।

बाद में शांतनु भी एक अन्य विश्वविद्यालय में पढ़ाने लगे। कुछ साल गुजर गये।

इस बीच शांतनु कुछ साल के लिये अमेरिका भी रह आये एक अमेरिकन विश्वविद्यालय के निमंत्रण पर। वे जाना नहीं चाहते थे और उन्होने नसरुद्दीन से सलाह की तो उन्होने कहा कि जाओ बरखुद्दार उधर की दुनिया भी तो देख आओ। जाने से कुछ अरसा पहले ही उनका विवाह भी सम्पन्न हो गया|

जब शांतनु अमेरिका में ही थे तो वहाँ उन्हे एक अन्य भारतीय प्रोफेसर मिले जो कि उनकी तरह ही कुछ समय के लिये वहाँ पढ़ाने के लिये गये हुये थे। प्रोफेसर साब की पत्नी भी उनके साथ थीं और शांतनु की पत्नी और उनमें परदेस में खूब छनने लगी। बच्चे प्रोफेसर साब के थे नहीं। आयु उनकी इकतालिस बयालिस के आसपास ही होगी उस समय, उनकी पत्नी उनसे कोई दसेक साल छोटी थीं।

यूँ तो वे विद्वान थे पर उनमें कुछ सनकें भी थीं। उन्हे अपना तखल्लुस रखने की सनक थी। तखल्लुस तो बहुत लोग रखते हैं पर इन साहब के साथ दिक्कत ये थी कि ये अब तक कम से तीन तखल्लुस बदल चुके थे। उन दिनों वे हिन्द्स्तानी शायरी पर शोध कर रहे थे और उलझन में थे कि क्या तखल्लुस रखें। उनके सामने बहुत सारे विकल्प मौजूद थे।

मीर की शायरी की तर्ज पर अपना तखल्लुस रखें “तीर” कयोंकि बकौल उनके मीर की शायरी एक तीर की तरह सुनने वाले के ह्र्दय में प्रवेश कर जाती है और वह मीरमयी हो जाता है। अमीर खुसरो का काव्य उन्हे “प्रेम” कहकर पुकार रहा था तो गालिब शरारत कर रहे थे कि मियाँ “विद्रोही” हो जाओ| मजाज़ पेश कर रहे थे उन्हे “मिजाज़“।

शायरी की बात हो तो नसरुद्दीन का जिक्र शांतनु को करना लाजिमी था, आखिरकार नसरुदीन ठहरे शायरी के बहुत बड़े कद्रदानों में से एक। शांतनु ने प्रोफेसर से बातचीत करते वक्त्त अपने गुरु नसरुद्दीन के शायरी के प्रति प्रेम को बताया और उनकी विद्वता का बखान भी किया और बखान इतना किया कि प्रोफेसर के दिल में नसरुद्दीन के दर्शन करने की तलब हिलोरे मारने लगी।

उस समय भारत के शायरों पर काम कर रहे प्रोफेसर को कुछ दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा था। खासकर मजाज़ पर शोध करने में उन्हे कठिनाइयाँ आ रही थीं। शांतनु ने उन्हे बताया कि गुरुदेव नसरुद्दीन उनकी सहायता कर सकते हैं। प्रोफेसर साब खिल उठे उन्होने हाथ पकड़ लिये शांतनु के कि तुरंत खत लिखो अपने गुरु को। दिल में कहीं उनके नसरुद्दीन को आजमाने की बात भी थी कि जरा देखें इन नसरुद्दीन साहब का दम खम।

कुछ ही दिन बाद शांतनु को एक बड़ा सा पैकेट पार्सल द्वारा मिला। अपने लिये भेजे गये व्यक्तिगत सामान को निकाल उन्होने प्रोफेसर को नसरुद्दीन द्वारा भेजे गये कागजात दे दिये। प्रोफेसर सारी रात सो नहीं पाये। डिनर करने के बाद नसरुद्दीन द्वारा भेजी गयी सामग्री पढ़नी शुरु की तो कब रात बीती उन्हे पता ही नहीं चला, जब सुबह के सूरज ने अपनी लालिमा से खिड़की के शीशों की मार्फत अंदर आकर कमरे के बाकी स्पेस और साजो सामान को जगा दिया तब उनका ध्यान भंग हुआ।

“कमाल कर दिया गुरु” बड़बड़ाते हुये वे कुर्सी से उठे और एक भरपूर अंगड़ायी लेकर वे तैयार होने चले गये। शांतनु से मिलते ही उन्होने घोषणा कर दी कि वे भी आज से उनके गुरु नसरुद्दीन के मुरीद और शिष्य हो गये हैं और उन्होने तय कर लिया है कि भारत लौटते ही चल रहे शोध कार्य से इतर वे हिन्दुस्तानी शायरी पर एक किताब भी लिखेंगे जो नसरुद्दीन को समर्पित होगी। उन्होने भावविभोर होकर नसरुद्दीन को एक लम्बा सा आभार पत्र लिख भेजा और उसमें भी उन्होने अपने द्वारा उनके शिष्य होने की घोषणा लिख भेजी और उनसे प्रार्थना की कि वे भी उन्हे शिष्य रुप में स्वीकार करें।

अमेरिका से लौटने के कुछ अरसे बाद संयोग कहिये या प्रोफेसर साब के प्रयास, वे भी शांतनु के विश्वविद्यालय में आ गये पढ़ाने। उन्होने दो शोध छात्रों को शायरी पर चल रहे अपने शोध कार्य से जोड़ लिया। भारत आते ही वे नसरुद्दीन से मिलना चाहते थे पर संयोग ऐसा बैठा कि शांतनु और प्रोफेसर के अमेरिका से लौटने से पहले ही नसरुद्दीन चले गये तजाकिस्तान और वहाँ से उन्हे तुर्की जाना था। वे खुद रुमी पर शोध कर रहे थे उन दिनो और इसी सिलसिले में वे दो साल के लिये बाहर चले गये थे। मजाज़ पर शोध के संदर्भ में प्रोफेसर साब उनसे नियमित पत्र व्यवहार करते रहे और नसरुद्दीन भी पत्रों के द्वारा ही उनका मार्ग दर्शन करते रहे। जहाँ भी नसरुद्दीन कहते प्रोफेसर अपने दोनों दोनों शोधार्थियों को वहाँ भेज देते। काम बड़ी तन्मयता से चल रहा था।

नसरुद्दीन के वापिस आने से कुछ अरसा पहले ही प्रोफेसर साब ने शोध कार्य खत्म कर दिया और एक किताब भी तैयार कर दी। प्रोफेसर साब तो नसरुद्दीन को भी सहलेखक के रुप में शामिल करना चाहते थे पर नसरुद्दीन ने विनम्रता पूर्वक मना कर दिया। प्रोफेसर ने किताब को छपवाने के लिये नहीं भेजा, उन्होने कहा कि नसरुद्दीन आयेंगे और पांडुलिपी का ही विमोचन करेंगे और किताब का नाम तय करेंगे और उनसे मूल पांडुलिपी पर ऑटोग्राफ लेकर ही उसे छपने के लिये प्रेस में भेजा जायेगा।

सारा कार्यक्रम उन्होने शांतनु के साथ मिल कर तय कर दिया कि भारत आते ही नसरुद्दीन वहाँ आयेंगे और पांडुलिपी का विमोचन करेंगे। नसरुद्दीन को मानना पड़ा और पत्र द्वारा उन्होने स्वीकृति और भारत वापसी का अपना कार्यक्रम भेज दिया।

आज का किस्सा सीधे उनके द्वारा की गयी किसी कारगुजारी से सम्बंधित नहीं है पर वे भी उस घटना के एक महत्वपूर्ण पात्र थे।

संयोग अगर संयोग ही उत्पन्न न करें तो उन्हे संयोग ही क्यों कहा जाये? इधर प्रोफेसर साब का शोध पूरा हुआ, पांडुलिपी तैयार हुयी और उधर प्रोफेसर की पत्नी की कोख से भी एक कृति का जन्म हो गया और उन्होने एक पुत्र को जन्म दिया। प्रोफेसर तो नहीं परंतु उनकी पत्नी ग्रह नक्षत्र को बहुत मानती थी। उनके विवाह के लगभग दस ग्यारह साल बाद उन्हे संतान की प्राप्ति हुयी थी सो वे किसी किस्म का कोई रिस्क लेना नहीं चाहती थी। बच्चे के जन्मते ही उसकी जन्मकुंडली बनवाने का इंतजाम उन्होने अस्पताल जाने से पहले ही कर दिया था और ऐसा ही हो भी गया। परंतु दिक्कत ये आ गयी कि पंडित ने घोषणा कर दी कि बालक ने ऐसे नक्षत्रों में जन्म लिया है कि बालक की माता के मातापिता भाई बहन आदि बच्चे को तीन माह तक न देखें। पर दिक्कत ये थी कि प्रोफेसर की पत्नी के परिवार में पीढ़ियों से रिवाज चला आ रहा था कि नवजात शिशु का नामकरण बच्चे का नाना या अगर वह जीवित नहीं है तो बच्चे का मामा करेगा। अगर दोनों ही जीवित नहीं हैं तो जिसे भी बच्चे की माता दिल से अपने पिता या भाई स्वरुप मानती है वह यह कार्य करेगा। और बड़ी दिक्कत यह आयी कि पंडित ने आगे कहा कि बच्चे का नामकरण दो माह के अंदर करना बहुत जरुरी है और जो भी बच्चे का नामकरण करेगा उसे बच्चे के जन्म के बारे में कुछ मालूम नहीं होना चाहिये और बच्चे को एकदम से उसके सामने लाया जाना चाहिये और उसे कुछ ही क्षणों में एक सुयोग्य नाम बच्चे को देना चाहिये।

प्रोफेसर इन सब ग्रह नक्षत्रों की बातों को नहीं मानते थे पर पत्नी को नाहक नाराज भी नहीं करना चाहते थे। नसरुद्दीन वहाँ आ ही रहे थे सो प्रोफेसर की पत्नी और शांतनु की पत्नी ने भी तय कर लिया कि नसरुद्दीन के आने के अवसर पर ही बच्चे के जन्म की खुशी का समारोह आयोजित किया जाये और नसरुद्दीन ही बच्चे का नामकरण भी करें। पर ये बात दोनों ही स्त्रियों ने प्रोफेसर को न बतायी और साथ ही साथ शांतनु को भी विवश कर दिया कि यह बात प्रोफेसर को न बतायी जाये।

प्रोफेसर अपनी पुस्तक की पांडुलिपी के विमोचन की तैयारी में व्यस्त थे पर इसी बीच उपकुलपति के आदेशानुसार उन्हे एक सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिये कुछ दिनों के लिये बम्बई जाना पड़ गया और अब उन्हे उसी दिन वापिस आना था जिस दिन नसरुद्दीन का वहाँ पधारने का कार्यक्रम था। प्रोफेसर ने अपनी पत्नी को निमंत्रण पत्र का मसौदा और किसे किसे निमंत्रण भेजना है, उन सब नामों की लिस्ट दे दी और कहा कि शांतनु और उनके छात्रों की सहायता से वे निमंत्रण पत्र छपवा कर सबको भेज दें। वे नसरुद्दीन के समारोह में आगमन को एक यादगार घटना बनाना चाहते थे। उनके जाने के बाद प्रोफेसर की पत्नी ने किताब के विमोचन के निमंत्रण पत्र को बच्चे के जन्म की खुशी में आयोजित समारोह का निमंत्रण पत्र बना कर सब लोगों को भिजवा दिया। वैसे लगभग सारे नाम तो उन्ही परिचितों के थे, जिन्हे चाहे किसी भी कारण से बुला लो। अतिथियों को भी इस बात का अहसास था कि प्रोफेसर और उनकी पत्नी को निस्संदेह बहुत ज्यादा खुशी होगी विवाह के इतने साल बाद संतान प्राप्ति से। आखिर उनका आँगन भी बच्चे की किलकारियों से गूँजेगा।

नियत दिन आ गया। नसरुद्दीन तो पहुँच गये। शांतनु उन्हे स्टेशन से ले आया और उन्होने बच्चे के नामकरण की रस्म भी विधिवत अदा कर दी और बच्चे को नाम दिया “पुलकित”।

समारोह में अतिथिगण आने लगे पर प्रोफेसर साब न पहुँच पाये थे, रेलवे स्टेशन पर पता किया गया तो पता चला की गाड़ी कुछ देरी से आयेगी।

उधर प्रोफेसर साब भी इस चिंता में घुले जा रहे थे कि नसरुद्दीन वहाँ पहुँच गये होंगे और वे अभी भी रेल में ही हैं। जाने क्या सोचते हों नसरुद्दीन? उन्होने उपकुलपति को थोड़ा कोसा।

ऐसे ही बैचेनी में भरे वे रेल के स्टेशन पर पँहुचने का इंतजार करते रहे और जैसे ही रेल स्टेशन पर पँहुची वे गाड़ी के रुकने से पहले ही रेल के डिब्बे से बाहर प्लेटफॉर्म पर कूद पड़े और तीर की तरह बाहर की ओर भागे। टैक्सी लेकर वे फौरन से पेश्तर घर पँहुचे।

उनका ही इंतजार हो रहा था। घर पँहुचते ही वे सबसे पहले नसरुद्दीन से मिले। उनकी पत्नी ने उन्हे याद दिलाया कि मेहमान कितनी देर से इंतजार कर रहे हैं उनके आने का।

प्रोफेसर ने हाथ मुँह धोकर वस्त्र बदले और अपनी लिखी पुस्तक की पांडुलिपी लेकर वे घर के बाहर ही स्थित समारोह स्थल पर पँहुच गये। लोगों ने ताली बजाकर उनका स्वागत किया।

प्रोफेसर के हाथों में हल्के लाल रंग के रेशमी वस्त्र में लिपटी पांडुलिपी थी। वे नसरुद्दीन, अपने छात्रों और शांतनु को लेकर मंच पर चले गये जहाँ उनकी पत्नी नवजात शिशु को गोद में लिये बैठी थी और पास ही शांतनु की पत्नी भी खड़ी थी। प्रोफेसर ने सबको शांत रहने के लिये अपना एक हाथ उठाकर इशारा किया सब उनकी तरह देखने लगे।

प्रोफेसर ने बोलना शुरु किया।

आज मेरी जिंदगी का बहुत अहम दिन है। आज हमारे बीच शांतनु के गुरु नसरुद्दीन जी मौजूद हैं। उनकी उपस्थिति मुझे कितनी खुशी दे गयी है मैं उसका वर्णन नहीं कर पाऊँगा और आप लोग शायद अनुमान न लगा पायेंगे। उनकी यहाँ उपस्थिति एक बहुत महत्वपूर्ण काम की परिणति होने के परिणामस्वरुप संभव हो पायी है अतः मेरा फर्ज बनता है कि मैं उस महत्वपूर्ण काम पर कुछ प्रकाश डालूँ।

लोगों ने तालियाँ बजानी शुरु कर दीं। वे तो समझ रहे थे कि जैसे उन्हे बच्चे के जन्म की खुशी बाँटने के लिये आमंत्रित किया गया है वैसे ही नसरुद्दीन भी निमंत्रण पर आये होंगे।
प्रोफेसर लोगों को शांत करते हुये आगे बोले।

कई बरसों से मैं जिस काम में लगान हुआ था वह अपनी परिणति को पँहुच गया है। मेरे गुरु नसरुद्दीन ने इतना मेरा मार्गदर्शन किया है इस कठिन कार्य को सम्पन्न करने में कि मैं ताउम्र उनका शुक्रगुजार रहूँगा। आज वे उस कृति को अपने आशीर्वाद से सुशोभित करने आये हैं जिसका जन्म ही उनके आशीर्वाद से सम्पन्न हो पाया है।

लोग नसरुद्दीन की तरह कौतुहल की दृष्टि से देखने लगे। उन्हे नसरुद्द्दीन कोई पीर या संत लगे। प्रोफेसर लोगों का ध्यान नसरुद्दीन की तरफ देख कर बहुत प्रसन्न हुये और उन्होने कहा।

मैं बहुत ज्यादा आभारी हूँ डा. शांतनु का जिन्होने मुझे गुरु के सम्पर्क में लाने का सौभाग्य प्रदान किया। यह उनका कर्ज रहा मुझ पर। अब तो वे मेरे गुरुभाई हैं।

अपने दोनों छात्रों को स्नेहमयी दृष्टि से देखकर मुस्कुराते हुये उन्होने कहा।

उम्र अपना असर दिखाती है और मेरे लिये इतना कठिन कार्य करना संभव न हो पाता यदि ये दो नौजवान अपनी भरपूर शक्ति, लगन और मेरे प्रति भक्ति से इस कार्य को पूरा करने में मेरी सहायता न करते। इन्होने दिन देखा न रात, जब भी मुझे इनकी जरुरत पड़ी ये उपस्थित रहे। इनके कठिन परिश्रम की बदौलत ही यह कार्य सम्पूर्ण हो पाया है। मैं इनके उज्जवल भविष्य़ को साफ साफ देख पा रहा हूँ।

बच्चे के जन्म के अवसर पर आयोजित समारोह में प्रोफेसर और उनकी पत्नी की खुशी में सम्मिलित होने आये अतिथिगण थोड़े भौचक्के से खड़े प्रोफेसर, नसरुद्दीन और प्रोफेसर के छात्रों को देख रहे थे। कुछ मुस्कुरा भी रहे थे।

खैर उन सबको अनर्गल लगने वाले प्रोफेसर के भाषण का रहस्य तब खुल ही गया जब प्रोफेसर ने रेशमी कपड़े में बंधी पांडुलिपी बाहर निकाली पर उन क्षणों की कल्पना ही की जा सकती है जब अतिथि प्रोफेसर के भाषण को बच्चे के जन्म से सम्बंधित समझ रहे थे और प्रोफेसर यह सोचकर बोल रहे थे कि सब अतिथि उनकी पुस्तक की पांडुलिपी के विमोचन के अवसर पर वहाँ एकत्रित हुये हैं।

किस्सा बहुत साल तक विश्वविद्यालय में हास्य उत्पन्न करता रहा।

…[राकेश]

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