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जनवरी 11, 2014

ठूंठ जीवन

पतित है वह RKap-001

या कि चेतना उसकी

है सुप्त प्राय:

दिवस के प्रारम्भ से

अवसान तक

धुंधलका सा है

– सोच में भी

– कर्म में भी

-देह में भी

तिरती घटिकाएं

प्रात: की अरुनोदायी आभा

या कि तिमिर के उत्थान की बेला

शून्यता की चादर से हैं लिपटीं

सूनी आखों से तकती है

समय के रथ की ओर!

अल्हड यौवन की खिलखिलाहट

गोरे तन की झिलमिलाहट

युगल सामीप्य की उष्णता

युवा मानों की तरंगित उर्जस्विता

को-

सराहकर भी अनमना सा,

अन्यमनस्क शुतुरमुर्ग!

पहिये की रफ़्तार से

संचालित जीवन

जैसे कि हो पहिये ही का एक बिन्दु

एक वृत्ताकार पथ पर

अनवरत गतिमान

पर दिशाहीन!

– कोई इच्छा नहीं

– कोई संकल्प नहीं-कोई माया नहीं

-कोई आलोड़न नहीं

बस एक मशीन भर!

एहसास है कचोटता

जीवन चल तो रहा है

पर कहीं बुझ रही है आग

धीरे-धीरे, मर-मर कर

आत्मा की चमक

होती जाती है मंद

क्षण-प्रतिक्षण!

Yugalsign1

मई 19, 2011

पानी मयस्सर नहीं, और कहीं जाम छलकते हैं

कारीगरों के हिस्से में इनाम आ गये
हम औजारों का क्या था काम आ गए

वो खेल तो शाहों की शह-मात का था
मजबूर प्यादे बेगार में काम आ गए

प्रजा को बेच रहे हैं ज़मीर-फरोश शाह
ये कैसा दौर है कैसे निज़ाम आ गए

सियाहकारों के गुनाहों के चश्मदीद थे
मुल्जिमों की फ़ेहरिस्त में नाम आ गए

साकी तेरे मयकदे का खुदा ही हाफिज
कमज़र्फ रिन्दों के हाथों जाम आ गए

बस्तियों में तो पीने का पानी भी नहीं
नेता के वास्ते छलकते जाम आ गए

अंधेरनगरी में अवाम ने चुने थे शाह
मालायें ले के चाटुकार तमाम आ गए

हम अपना पता भूले हुए थे ए आलम
गनीमत जानिये घर सरे शाम आ गए

(रफत आलम)

ज़मीर्फारोश -अंतरात्मा विक्रेता,
निजाम -सत्ता,
सियाहकारों – काले कार्य करने वाले (बेईमान ),
फेहरिस्त -सूची,
चश्मदीद – प्रत्यक्षदर्शी,
रिंद – शराबी

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