Posts tagged ‘Mausam’

जून 14, 2013

तन्हाई में रो दोगे तुम

बेमौसम जब फूल खिले थे

इन्द्रधनुष के रंग मिले थे

तभी लगा था बहुत जल्द ही

इक दिन मुझको खो दोगे तुम

तन्हाई में रो दोगे तुम…

सुनो अकेले मत होना तुम

बोझ अकेले मत ढोना तुम

मित्र! न ऐसा कर पाए तो

बाग बबूल का बो दोगे तुम

तन्हाई में रो दोगे तुम…

तुमने जो उपहार दे दिया

लेने से इनकार कब किया

मैं सब कुछ स्वीकार करूँगा

मुझे खुशी से जो दोगे तुम

तन्हाई में रो दोगे तुम…

सूख नदी का जल जाएगा

औ’ सागर भी घट जाएगा

खुशबू से जो नाम लिख दिया

उसको कैसे धो दोगे तुम

तन्हाई में रो दोगे तुम…

{कृष्ण बिहारी}

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अप्रैल 15, 2013

मेरे गीत तुम्ही गाओगे

नयन के बादल घने हो गये

क्यों इतने अनमने हो गये

सुनो सुनो ऐ बंधु!

न रूठो, मुझको जीत तुम्ही पाओगे,

मेरे गीत तुम्ही गाओगे…|

छोडो तुम यह रोना-धोना

चलो सजाओ स्वप्न सलोना

इतना तो विश्वास करो तुम

मेरी प्रीत तुम्ही पाओगे

मेरे गीत तुम्ही गाओगे…|

यह मौसम तूफानी देखो

कितना रेगिस्तानी देखो

ऐसे में मालूम मुझे था

मेरे मीत तुम्ही आओगे

मेरे गीत तुम्ही गाओगे…|

तुमने जीवन दान दिया है

गीतों का वरदान दिया है

इन्हें अमर भी कर जाए जो

वह संगीत तुम्ही लाओगे

मेरे गीत तुम्ही गाओगे…|

{कृष्ण बिहारी}

जुलाई 29, 2011

गुलाबी दुपट्टा

ऐसी ही भीगी रातों में
कांपते थे हाथ, दिल और दिमाग
जब परत दर परत
जिस्मों के तलिस्म खुलते थे।

अधखुली पलकों में
ठहर जाती थी रात
होठों के जाग उठे उभारों पर
सियाह बदलियाँ अमृत बरसा जाती थी।

चाहत की मदिरा पीकर
मदहोश हो जाता था अहसास
विस्मरति के भवँर में डुबाते
आत्मबोध के वे लम्हे
शरीर के बंधनों से परे
आत्माओं का मिलन करा जाते थे
जहाँ अंतर मिट जाता है
मैं और तू के बीच
वही पल तो थे अपनी पहचान के।

आज भी खुल कर बरस रही है घटा
खिड़की के गीले शीशों से परे
धुंधला गए है सब मंज़र
उसी तरह के जब
मैंने माटी के अंधे घर में छोड़ा था तुम्हे।

साथ गुज़ारे लाखो लम्हे
एक साथ जल रहे थे
सुन्न हो गये ज़हन के अलाव में
आखों के चश्मे में भाप थी मगर
उस रोज रो कब पाया था मैं।

सुहाग का जोड़ा पहने
दूर जाते,
बहुत दूर जाते देखता रहा था तुम्हे,
तब से एक गुलाबी दुपट्टा
मेरे ख्यालों में लहरा जाता है अक्सर
सुहाने मौसमों में रुला जाता है अक्सर।

(रफत आलम)

जुलाई 22, 2011

मौसम

रिमझिम मौसम में
हरी दूब पर
नंगे पाँव चलाना सुहाता है,
बे-एतबार फुहारों में
अक्सर खिलते हैं
रिश्तों के मासूम फूल,
सर्द रूत जमाने लगती है
गुलाबों की पंखडियों पर ओस,
बर्फ होते दिलों के
अजनबी बनते एहसास
बेरुखी के लिहाफ में
करवटें बदल कर सो जाते हैं।

बल खाती नदियों की जवानी
सोख लेती हैं बेदर्द गर्मियां,
जज़्बात की जलन में
चिता होते देखे रेश्मी आँचल
और चौड़े-चकले फौलादी सीने,
संबंधों के सूखे तीरों के बीच
समय का चिरस्थाई समुद्र
बचा रह जाता है.
सूनी आँख से रिसता
मौसमों के बदलाव में।

(रफत आलम)

जुलाई 13, 2011

दिल की लगी

फ़िक्र बहुत थी हमें दुनिया जहान की
सर पे गिरी छत अपने ही मकान की

दिल से दुआ हो हर एक मेहमान की
अल्लाह इज़्ज़त रखे मेरे मेज़बान की

किसी ने कुत्तों में खोजी वफ़ा की बू
वो समझ गया था फितरत इंसान की

कौन समझा दिल की कतरनों का दर्द
लोग तो कैंचियाँ चला गए ज़बान की

रिश्ते बहुत थे मगर कौन से रिश्ते थे
हमने जिनके वास्ते दुनिया वीरान की

मुस्कानों का बहरूप धरे अपनी काया
असल में बस्ती है जंगल बयाबान की

गुलशन के उजड़ने में किसका है दोष
मौसम का फरेब के भूल बागबान की

दीवाने तो तिरछी चितवन पे मर मिटे
ज़रूरत कहाँ पड़ी प्यारे, तीर-कमान की

सर इबादत से उठे ही कब दीवानों के
सजदों को ज़रूरत कहाँ थी अज़ान की

यूँ तो ज़मीन माटी का गोला है मगर
उठाए फिर रही है बुलंदी आसमान की

हमने कब कहा ये है गज़ल ऐ आलम
है दिल की लगी जो दिल ने बयान की

(रफत आलम)

अप्रैल 12, 2011

जय जवान

बर्फीले तूफान के कारण गाड़ी बहुत धीमे धीमे  चल पा रही थी। कप्तान साहब परेशान थे कि अगर समय रहते सुंरग तक न पहुँच पाये और किसी दुर्घटनावश सुरंग बंद हो गयी तो बहुत दिक्कत आ जायेगी। वे चालक से तेज चलाने के लिये कह भी नहीं पा रहे थे। इतने भारी हिमपात में वह गाड़ी चला पा रहा था यही बहुत बड़े साहस की और मूर्खता की बात थी। जब मैदानी बेस स्टेशन से चले थे तो हल्के हिमपात के ही आसार थे और उन्होने अनुमान लगाया था कि अगर हिमपात बढ़ा तो भी वे समय रहते सुरंग पार कर जायेंगे और उसके बाद तो धीरे धीरे भी गाड़ी चलायी तो भी अगले दिन तक कैम्प तक पहुँच ही जायेंगे। इसलिये वे सुबह छह बजे ही बेस स्टेशन से चल पड़े थे। पर दुर्भाग्य से रास्ते में ही हिमपात अनुमान से ज्यादा होने लगा और वे अपने अनुमानित समय से कुछ घंटे की देरी से सुरंग के पास पहुँचे। उनकी गाड़ी से पहले ही ट्रकों एवम अन्य वाहनों की कतारें सड़क पर खड़ी थीं। उनकी गाड़ी सुरंग से कम से कम १ किमी पहले ही रुक गयी। नीचे उतर कर पहले से खड़ी गाड़ियों से मालूम किया तो पता चला कि वहाँ लैंड-स्लाइडिंग होने से सुरंग का मुँह बंद हो गया है। बर्फबारी रुकने से पहले सुरंग की सफाई का काम शुरु नहीं हो सकता। इतनी भारी बर्फबारी में मशीने और मजदूर ही वहाँ तक नहीं आ सकते। बर्फबारी रुक भी जाये तो भी आड़े तिरछे खड़े वाहनों को हटाने में ही बहुत समय लग जाना है।
कप्तान साहब चिंतित हो गये। दुश्मन ने पर्वतों की चोटियों पर स्थित उनकी चौकियों पर चुपके से कब्जा कर लिया था। उनके लिये गाड़ी में रखी अत्यंत जरुरी सामग्री को अपने कैम्प तक ले जाना बहुत जरुरी था। चालक के अलावा उनके साथ सिक्योरिटी के लिये दो जवान और थे। उन्होने गाड़ी में मौजूद वायरलैस से बेस स्टेशन या कैम्प पर सम्पर्क साधने के लिये एक जवान से कहा परंतु सम्पर्क स्थापित नहीं हो पाया। आतंकवादियों ने अलग दहशत फैला रखी थी राज्य में।

वे चिंतित होकर इधर उधर टहल रहे थे। कभी सुरंग की ओर जाते वाहनों के बीच स्थान खोजते हुये और कभी अपनी गाड़ी के पीछे की तरफ जाते। पीछे से उनके बाद भी कई वाहन आ गये थे।
समय बीत नहीं रहा था।

कुछ देर बाद उन्होने सेना की वर्दी पहने कुछ जवानों को कमर पर पिट्ठू बैग कसे हुये पास के ढ़लान से उतरते हुये देखा। उन्हे ऐसा लगा जैसे वे सुरंग के दूसरी ओर से आये हैं। वे लपक कर उनके उतरने की जगह के करीब पहुँचे। छह जवान सावधानी से ढ़लान से नीचे उतर रहे थे। जवान भी अपने सामने सेना के एक अधिकारी को खड़े देखकर कुछ चौकन्ने हो गये। उन्होने कप्तान साहब को सेल्यूट किया।

कप्तान साहब ने पूछा,” क्यों मेजर, क्या सुरंग के दूसरी तरफ से आ रहे हो आप लोग”।

जी साहब, उधर भी ऐसा ही हाल है। सुरंग बंद हो गयी है और वाहन अटके खड़े हैं। हम लोग तो कोई चारा न देखकर पैदल ही चढ़ाई करके आ रहे हैं। हमें लगा था कि इधर आ जायेंगे तो हो सकता है कि कोई वाहन वापिस जाने की तलाश में हो और हमें जगह मिल जाये

कहाँ जा रहे हो आप लोग?

साहब हम लोग तो छुट्टी पर घर जा रहे हैं। आप यहाँ कैसे अटक गये?

कप्तान साहब बातें करते करते उन्हे अपनी गाड़ी तक ले आये थे। कप्तान के साथ सेना के जवानों को देखकर उनकी गाड़ी में बैठे चालक और दोनों जवान भी गाड़ी से बाहर आ गये।

उन्होने जवानों से पीछे गाड़ी में बैठने को कहा। सब अंदर बैठ गये तो कप्तान साहब ने अपने साथ आये जवानों से थर्मसों में रखी चाय सबको देने के लिये कहा।

चाय पीकर सबके शरीर भी खुले और दिमाग में भी चुस्ती आयी।

कप्तान ने जवानों को बताया कि कैसे वे यहाँ अटक गये हैं और कैसे उनका कैम्प पर पहुँचना बहुत जरुरी है। उन्होने समस्या की गम्भीरता उन्हे बतायी।

जवानों ने कहा,” साहब सुरंग के दूसरी ओर तो सड़क का भी बहुत बुरा हाल है। बर्फ हटाये बिना वाहन चल भी नहीं सकते। अगर आप हमारी तरह चढ़ाई करके उधर पहुँच भी गये तो उधर कोई वाहन मिल भी सकता है परंतु इंतजार तो करना ही पड़ेगा जब तक कि रास्ता साफ न हो जाये”।

कप्तान साहब चिंतित स्वर में बोले,” अरे बहुत दिक्कत हो जायेगी अगर सामान न पहुँचा समय पर”।

थोड़ी देर गाड़ी में चुप्पी समायी रही। जवान एक दूसरे की ओर देख रहे थे। नये आये जवानों ने आँखों-आँखों में कुछ बातें कीं और उनमें से एक जवान ने कहा,” साहब एक काम हो सकता है। हममें से दो पिछले साल सर्दियों में भी ऐसे ही सुरंग के पास फँस गये थे। इतना खराब मौसम नहीं था पर सुरंग के दूसरी ओर वाहनों की दुर्घटना होने के कारण रास्ता बंद हो गया था और जाम लग गया था। बर्फ भी पड़ने लगी थी पर इतनी भारी बर्फबारी नहीं थी उस वक्त। हम आठ लोग थे और हम लोगों को ड्यूटी ज्वाइन करनी थी। हम लोगों ने पैदल ही रास्ता पार किया था। सुरंग से करीब दस किमी चलना पड़ेगा पर आगे शायद मौसम ठीक हो और वाहन मँगवाया जा सके”।

कप्तान साहब की आँखों में चमक तो आयी पर उन्होने सीमायें भी जता दीं,” हम तो केवल तीन लोग हैं, चालक को तो यहीं गाड़ी के साथ रहना होगा, सामान हमारे पास बहुत है, बिना सामान के जाने का कोई मतलब नहीं और उसे छोड़ा भी नहीं जा सकता, बल्कि यहाँ गाड़ी के साथ भी एक और जवान चाहिये”।

कप्तान साहब कुछ कहना चाहते थे पर हिचकिचाहट के मारे कह नहीं पाये और गाड़ी से बाहर धुआँधार गिरती बर्फ को देखने लगे।

जवान कप्तान साहब की परेशानी समझ गये। सैनिकों के दिमाग और ह्रदय एक ही तरीके से काम करते हैं। उन्होने फिर से आपस में इशारों में बात की। आशायें, लाचारियाँ और फर्ज आपस में गुत्थमगुत्था हुये पर जो निकल कर आया उसने कप्तान साहब को चौंका दिया।

एक जवान ने कहा,” साहब, हम लोग आपके साथ चलते हैं। अपने अपने पिट्ठुओं में सामान भर लेंगे”।

“पर आप लोग छुट्टी पर जा रहे हैं। कितने समय बाद जा रहे होंगे। घर-परिवार के लोगों से मिलने की उत्सुकता होगी”।

“साहब आप इस बात की चिंता न करें। फर्ज छोड़कर तो भागेंगे नहीं। पीठ दिखाकर चले गये तो कैसी छुट्टियाँ? घरवालों के साथ रहते हुये भी कैसे कटेंगी वे”।

कप्तान साहब के पूरे चेहरे और आँखों में गर्व दमकने लगा। गर्वीले और जोशीले स्वर में उन्होने कहा,” शाबास मेजर! आप जैसे जाबांजों पर सेना और पूरा देश फख्र करता है”।


जवानों ने साहसी स्वर में कहा,” साहब चूँकि गाड़ी यहीं रहेगी आप चालक से इतना इंतजाम करने के लिये कह दीजिये कि हमारे घरों पर सूचना दे दे कि शायद आने में देरी हो जाये और एक दो दिन में हम सम्पर्क कर लेंगे।”

कप्तान साहब ने कहा,” उसकी आप लोग चिंता न करें। मैं कोशिश करुँगा कि आपके अधिकारी आपकी छुट्टियाँ रीशेडयूल कर दें। चालक के पास वायरलैस है वह बेस स्टेशन पर सम्पर्क साधने की कोशिश करता रहेगा और आप अपने डिटेल्स उसे देंदें वह सब सम्भाल लेगा”।

उन्होने झट से योजना बना दी। उन्होने कहा चूँकि हमारे पास केवल दो हथियारबंद जवान हैं सो दोनों हमारे साथ चलेंगे। गाड़ी के साथ चालक और आप में से कोई एक रुक जाओ।

जवानों ने झटपट अपने अपने पिट्ठुओं को खाली करके उनमें कप्तान साहब की दी हुयी सामग्री भर ली।

थोड़ी देर बाद ही बर्फीले तूफान को मात देते हुये अपने फर्ज़ को अंजाम देने के लिये भारतीय सेना के आठ जांबाज सैनिक अपने अपने कंधों पर भारी पिट्ठुओं को लादे चढ़ाई चढ़ते जा रहे थे।

…[राकेश]

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