Posts tagged ‘Masi’

सितम्बर 4, 2016

किताब का चर्चा … (रमेश गोस्वामी)

मेरी किताब का चरचा
कहीं कहीं पे हुआ
जहाँ उम्मीद थी मुझ को
वहीं वहीं पे हुआ
मेरी उडान भी मंसूब
ना थी चाँद तारों से
तभी तो एहतिराम
सोच की जमी पे हुआ

ना था अलफाज मे
तारीफ का उलझा हुआ चेहरा
मेरे सुखन का अक्स
डूबती नमी पे हुआ
अगर पलट दिया पन्ना
किन्हीं हाथों ने बिन बाँचे
मुझे तो रंज उस पे
तैरती कमी पे हुआ

उदास शाम थी
और जिक्र था उदासी का
मसि का रंग उजागर
मेरी जबीं पे हुआ
मेरी किताब के किरदार
सब मेरे गम हैं
उन से मिलना हुआ जब भी
किसी गमी पे हुआ
(रमेश गोस्वामी)

नवम्बर 12, 2013

गंगा@वाराणसी

बहुत मुश्किल हैBenaras

गंगा तीर पर बैठकर

गंगा पर कुछ लिखना !

शरद की सांझ की सिमटी नवयौवना

या कि ग्रीष्म की सुबह की सकुचाती ललना

और या भादों की उफान भरी कामातुरा

घाटों पर आए न आए

मसि-कागद समेत मन को बहाए ले जाती है!

आप छंदों में उसे बाँधने को कहते हैं

या कि कटोरा भर पानी से उसे परखने को

और या मेरी क्षुद्रता से उस असीम को तौलने को

समझ में आए न आए

शुभ्र-कलुष समेत मन को बहाए ले जाती है!

Yugalsign1

%d bloggers like this: