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नवम्बर 2, 2014

अरविंद केजरीवाल : रहस्य स्टील के गिलास का

AKHungerstrikeअरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, और गोपाल राय, सैंकड़ों अन्य स्वयंसेवकों के साथ 25 जुलाई July 2012 को भ्रष्ट मंत्रियों के खिलाफ SIT घोषित करने की मांग के साथ अनिश्चितकालीन अनशन पर बैठ गये| अरविंद केजरीवाल के मधुमेह के रोगी होने के कारण बहुत से लोग उनके अनशन करने के निर्णय से चिंतित थे| अनशन न करने के लोगों हजारों लोगों के अनुरोध एवं मेडिकल क्षेत्र के विशेषज्ञों की चेतावनी को दरकिनार कर अरविंद अपने फैसले पर अडिग रहे और अनशन पर बैठ गये|

मैं मधुमेह रोग का विशेषज्ञ चिकित्सक हूँ और मुझे पता था कि वे एक जिद्दी रोगी हैं और उनका एलोपैथिक पद्धति पर कम और नेचुरोपैथी (प्राकृतिक चिकित्सा) पर ज्यादा विश्वास है| एक चिकित्सक के नाते मेरे लिए वे पहले ही catabolic अवस्था के मरीज थे, और उनका शुगर लेवल कुछ समय से अनियंत्रित था, और यह तय था कि अगर वे उपवास पर जाते हैं तो ketosis का ख़तरा उन पर छायेगा ही छायेगा|

उनके अनशन से पहले मुझे बहुत सी मेडिकल सामग्री पढनी पड़ी यह सीखने के लिए कि अगर मधुमेह का रोगी उपवास करता है तो उसकी शारीरिक स्थितियों को कैसे नियंत्रित किया जा सकता है| कुछ ऐसी रिपोर्ट्स थीं जहां मधुमेह के रोगी लम्बी भूख हड़ताल के बावजूद जीवित बच गये| मैं अरविंद के लगातार संपर्क में था और जंतर मंतर पर उनके अनशन के दौरान उनके साथ रहने के लिए सहमत था| Dr Atul Gupta (Anesthesiologist) और Dr Vipin Mittal (dentist) अरविंद और अन्य उपवासियों की देखभाल कर रही मेडिकल टीम के मुखिया थे| दोनों फोन के दवारा निरंतर मेरे संपर्क में थे, क्योंकि उपवास के तीन दिनों तक मुझे जयपुर में ही रुकना पड़ा जहां मेरे कुछ साथी अनिश्चितकालीन भूख-हड़ताल पर जमे हुए थे|

28 जुलाई 2012 को सुबह-सवेरे ही मैं जंतर-मंतर पहुँच गया| मैंने अरविंद की जांच की और उनकी मेडिकल स्थिति की ताजा रपटें पढीं| जैसा कि अपेक्षित था वे ketosis की अवस्था में पहले ही आ चुके थे| सुनीता केजरीवाल (अरविंद की धर्मपत्नी), ड़ा. मित्तल, और रणसिंह आर्य (प्राकृतिक चिकित्सक) मेरे साथ थे और मधुमेह रोग का विशेषज्ञ होने के नाते मैं उन्हें अरविंद की मेडिकल स्थिति और संभावित खतरों के बारे में समझा रहा था| एलोपेथिक चिकित्सा की परिभाषा से वे पहले ही उस स्थिति में पहुँच चुके थे जहां उन्हें अस्पताल में भर्ती किया जाना जरूरी था, हालांकि वे बाहर से ठीक दिखाई दे रहे थे और आत्मविश्वास से भरे हुए थे पर उनकी मेडिकल जांच रपट में ketone का स्तर बहुत ज्यादा था| अरविंद को अस्पताल में भर्ती करे जाने के लिए तैयार करना बहुत कठिन था, वे जब तक कि बेहोश न हो जाएँ तब तक वहाँ से हटने को तैयार नहीं थे| हमारे पास उस समय तक उन पर निगाह रखने के सिवा कोई चारा नहीं था जब तक कि वे गंभीर रूप से बीमार न हो जाएँ| ड़ा. मित्तल को सांत्वना मिली यह जानकर कि मैं उपवास के खत्म होने तक चौबीसों घंटे वहाँ रहूंगा और अरविंद की मेडिकल स्थितियों पर नजर रखूंगा| चिकित्सक की दृष्टि से देखूं तो यह एक चमत्कार ही था कि अरविंद अगले एक हफ्ते तक अनशन पर डटे रहे|

अरविंद के राजनीतिक विरोधियों ने उनकी मेडिकल स्थितियों और मधुमेह के बावजूद अनशन जारी रखने के बारे में कई कहानियां उडानी शुरू कर दीं| सोशल मीडिया पर उनके स्टील के गिलास को चर्चाओं का केन्द्र बनाया गया| क्योंकि अरविंद कैमरे पर स्टील के गिलास में पानी पीते दिखाए गये थे तो उनके विरोधियों ने कहना शुरू कर दिया कि स्टील के गिलास में जीवन रक्षक द्रव अरविंद को दिया जा रहा था अगर ऐसा न होता तो वे पारदर्शी शीशे के गिलास में पानी पीते| मुझे अब तक आरोप आश्चर्य में डालता है अगर अरविंद स्टील के गिलास में छिपा कर लिक्विड डायट ग्रहण करते तो उन्हें यह सरेआम कैमरों के सामने करने की क्या जरुरत थी?

बहरहाल इन् फिजूल बातों से अलग यह बात मार्के की है कि बिगड़े हुए मधुमेह के रोगी होने के बावजूद वे कैसे 10 दिनों से ज्यादा समय तक अनशन करके जीवित रह पाए?

उनके उपवास की तैयारियां तकरीबन एक माह पूर्व शुरू हो चुकी थीं| हम जैसे एलोपैथिक चिकित्सक ऐसे मामलों से सबन्धित साहित्य पढ़ रहे थे और प्राकृतिक चिकित्सकों की टीम उनके शरीर को एक लंबे उपवास के योग्य बनाने में जुटी हुयी थी| तथ्यात्मक रूप से अगर अरविंद इतने लंबे उपवास के बावजूद बच पाए तो इस एक कारण से कि उन्होंने प्राकृतिक चिकित्सकों दवारा उनके लिए तैयार किये गये प्रोटोकोल का पूरी तरह से पालन किया| अरविंद का विश्वास एलोपैथी पर नहीं था और हम वहाँ केवल किसी आपातकालीन स्थिति से निबटने के लिए उपस्थित थे| हमने उनके स्वास्थ्य का नियमित रिकार्ड बनाया और मीडिया को इसके बारे में नियमित रूप से अपडेट करते रहे| प्राकृतिक चिकित्सकों की टीम अनुभवी थी और मधुमेह के रोगियों के उपावास को पहले संभाल चुकी थी| बल्कि उन्होंने यह तक दावा किया कि वे लमने उपास के माध्यम से ही मधुमेह के कुछ रोगियों को ठीक कर चुके थे| उनकी तैयारी अच्छी और उनका आत्मविश्वास दृढ़ दिखाई देता था|

प्राकृतिक चिकित्सकों ने उपवास से एक माह पहले अरविंद की डायट को इस तरीके से संचालित किया जिससे उनका शरीर भरपूर मात्रा में प्रोटीन ग्रहण कर सके और उनके भोजन में कार्बोहाइड्रेट की मात्रा न्यूनतम हो| इस डायट से संभावना थी कि उनके शरीर की पाचन व्यवस्था anabolic अवस्था की ओर अग्रसारित होगी| जब उन्होंने उपवास शुरू किया अताब तक उनके शरीर में प्रोटीन की अच्छी खासी मात्रा संचयित हो चुकी थी और अब तक उनका शरीर भोजन में कार्बोहाइड्रेट के निम्न स्तर का आदि हो चुका था|

अरविंद एरोबिक्स, योग और प्राणायाम के संयुक्त प्रोटोकोल (तीनों एक एक घंटे की अवधि के लिए) का भली भान्ति पालन कर रहे थे| व्यायाम और प्राणायाम के इस संयुक्त कार्यक्रम ने उनके शरीर की Insulin संवेदनशीलता को बढ़ाया होगा और beta cell function में बढोत्तरी की होगी| इसी अनुशासन के कारणउपवास के शुरुआती दिनों में glycemic नियंत्रण स्थायी रहा जबकि उनकी मधुमेह की दवाइयां बंद की जा चुकी थीं| वास्तव में उनकी सारी anti-diabetic medicines उपवास से कुछ दिन पहले ही बंद कर डी गई थीं और ऐसा करना इसलिए उपवास के दौरान hypoglycemia की स्थिति न उत्पन्न हो जाए|

उपवास के दौरान शरीर में एक उचित हाइड्रेशन बनाए रखने के लिए उन्हें समुचित मात्रा में पानी पीने के लिए दिया गया| शरीर में हाइड्रेशन का स्तर अच्छा बनाए रखने के साथ पानी का काम उपवास के कारण शरीर में उत्पन्न ketone को बाहर निकाल भी था| उपवास के दौरान, जब कि रोगी को खाना नहेने दिया जाता तो उसके शरीर में जमा वसा (फैट) ऊर्जा देने के काम आती है| पर इस क्रिया के दौरान Ketone bodies भी उत्पन्न हो जाती हैं जो शरीर के लिए बेहद हानिकारक हैं|

समुचित हाइड्रेशन स्तर बनाए रखने के साथ साथ शरीर से ketone bodies और अन्य toxins को बाहर निकालने के लिए अरविंद को प्राकृतिक चिकित्सा के महत्वपूर्ण तरीके कुंजल और एनिमा भी दैनिक स्तर पर अपनाने पड़े|

अरविंद की शारीरिक गतिविधियों को न्यूनतम स्तर पर नियंत्रित करके कैलोरीज के खर्च होने पर नियंत्रण पाया गया| उन्हें न ताली जा सकने वाली बिल्कुल आवश्यक गतिविधियों से ज्यादा चलने फिरने नहीं दिया गया| कैलोरीज क्रचने के स्तर को नियंत्रित करके ketone bodies के उत्पन्न होने को नियंत्रित किया जा सकता है क्योंकि अब वसा की कम मात्रा शरीर में पचाई जा रही है|

उनकी शारीरिक जांच नियमित रूप से की जा रही थी और उनके शरीर की बायोकमिस्ट्री भी नियमित जांची जा रही थी| उन्हें नियमित रूप से जांच के लिए खून के सैम्पल देने में एतराज था| उपवास के अंतिम पांच दिन एलोपैथी में विश्वास करने वाले सभी लोग बेहद चिंतित हो चले थे| उनका ketones का स्तर 4+ और 5+ के बीच झूल रहा था, electrolytes असामान्य अवस्था में थे और अंतिम 3 दिनों में bilirubin भी बढ़ना शुरू हो गया था| लेकिन रपट में इन् सब आकंडों में लगातार वृद्धि होने से शरीर के लगातार कमजोर होते रहने के बावजूद अरविंद पूरी तरह से जीवंत थे और अपने निश्चय पर अडिग|

उपवास के छठवें दिन ketone bodies का स्तर स्थायीत्व को प्राप्त कर गया और उससे ज्यादा नहीं बढ़ा| उस समय तक उनके शरीर ने शायद सारे संचित फैट का क्षय कर लिया था, और नके शरीर की कैलोरीज की आपूर्ति के लिए प्रोटीन्स टूट गये थे और यह यूरिक एसिड लेवल के बढे होने से भी सिद्ध हो रहा था|

सरकारी डाक्टरों की एक टीम अरविंद की जांच करने आई और उन्होंने दबाव डाला कि अरविंद को अविलम्ब अस्पताल में भर्ती करवाना चाहिए| हमारे डाक्टरों की टीम तब तक अरविंद के अपने विश्वास में अपना विश्वास समाहित कर चुकी थी और सब अरविंद के समर्थन में खड़े रहे| जीवन और मृत्यु का मामला आते ही कोई भी चिकित्सक तनिक भी ख़तरा नहीं उठाना चाहता| सरकारी डाक्टरों ने वही सलाह डी थी जो मैंने उपवास के चौथे दिन अरविंद को दे थी| भोपाल से आए हुए cardiologist, Dr Ayyar, ने भी यही सलाह दी|

चौबीसों घंटे जंतर मंतर पर उपस्थित देशभक्ति के गीत गाते, उन पर झूमते, और तिरंगा लहराते दीवाने लोगों और स्वयंसेवकों के मध्य हम लोग भी केवल मेडिकल जांच रपटों पर ही विश्वास करने वाले चिकित्सक न रहकर उन जैसे आम भारतीय ही बन चुके थे, जिनका प्रारब्ध पर पूर्ण विश्वास था|

मैं 2 अगस्त के शाम को जीवन भर नहेने भूल सकता जब अन्ना हजारे ने घोषित किया कि अरविंद एवं साथी अगले दिन उपवास तोड़ देंगें| मेरे हाथ में अरविंद की नवीनतम मेडिकल रपट थी और उनका serum pottasium 3.2,(सामान्य स्तर 3.5-5 meq/l) था| Hypokalemia एक बेहद खतरनाक स्थिति है और उनके स्तर खतरनाक स्थिति की ओर जा रहे थे| Further drop in Potassium के स्तर में और घटोत्तरी का मतलब था एकदम से ह्रदय समस्या के खतरे का उत्पन्न होना|

मैं उस जगह गया जहां अरविंद को रखा गया था| वे उस वक्त अकेले थे| मैंने उन्हें potassium के कम स्तर के बारे में सूचित किया और इससे होने वाले खतरों के प्रति सचेत किया| मैंने उनके सामने तर्क दिया – “अन्ना पहले ही देश के सामने घोषित कर चुके हैं कि उपवास कल टूट जायेगा और हम लोग देश को एक राजनीतिक विकल्प देने जा रहे हैं तो आज की रात के खतरे को नजरअंदाज करना ठीक नहीं होगा| जब कल उपवास टूटना ही है तो आज की रात आपके जीवन को खतरे में डालने का क्या मतलब है| अगर आप थोड़े से नारियल पानी का सेवन कर लें तो potassium का स्तर सामान्य हो सकता है, और आपके जीवन से एक बड़ा ख़तरा टल सकता है और नारियल पानी के सेवन से आपका उपवास भी नहीं टूटेगा| इसे आपद-धर्म समझा जाए”|

अरविंद ने कहा,

“ड़ा. पारिख, मैं ईश्वर को धोखा नहीं दे सकता, हम दोनों के सिवा यहाँ कोई और नहीं है पर ईश्वर तो हमारे साथ सदैव ही है| अन्ना ने कहा है कि उपवास कल टूटेगा तो यह कल ही टूटेगा उससे पहले नहीं| चाहे जो कुछ भी मेरे साथ हो जाए, और चाहे मेरा निश्चय सार्थक न लगता हो, पर मैं मुँह से कुछ भी ग्रहण नहीं करूँगा जब तक कि कल अन्ना घोषणा न कर दें”|

क्या उन्हें जिलाए हुए था तमाम प्रतिकूल शारीरिक परिस्थितियों में? क्या रहस्य था स्टील के गिलास का? ये रहस्य हैं – कर्म में दृढ़ विश्वास, लक्ष्य में पूर्ण आस्था और अगर आवश्यकता हो तो अंतिम त्याग करने की पूर्ण तैयारी|
जंतर मंतर पर व्यतीत किये गये सात दिनों में मैं मुश्किल से ही सो पाया और उस रात तो मैं एक झपकी तक न ले पाया| Potassium के घटते स्तर का ग्राफ मेरी आँखों के सामने तैरता रहा| लेकिन, यह आदमी- अरविंद केजरीवाल, जिसे यह विश्वास नहीं था कि वह अगली सुबह जीवित उठ पायेगा या नहीं, शान्ति से अपने बिस्तर पर सो रहा था|
अगले दिन, अरविंद के उपवास तोड़ने के बाद, जयपुर जाने के लिए जंतर मंतर से निकलने से पहले मैं भीड़ से घिरे अरविंद के पास गया| मैंने उनके कक्ष के दरवाजे से उनकी ओर हाथ हिलाया और अरविंद ने मुझे अंदर बुलाया और बाहें खोल कर मुझे गले लगा लिया| मेरे सब्र का बाँध टूट गया और उनकी बाहों में बंध कर मैं एक बच्चे की भांति फूट-फूट कर रो पड़ा| मैं इस भावुकतापूर्ण क्रंदन के पीछे कोई कारण नहीं खोज पाता| यही वे क्षण थे जब मैं एक बहुत बड़े तनाव और दबाव से मुक्त हुआ| मेरे कन्धों पर एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी थी एक ऐसे आदमी की मेडिकल देखरेख की जिसे लाखों भारतीय युवा प्रेम करते हैं और जिसकी ओर समूचा देश आशा भरी दृष्टि से देख रहा था| हर क्षण उनका जीवन ईश्वर की दया के वश लगता था जबकि बाकी लोगों का विश्वास था कि उनकी देखरेख एक कुशल चिकित्सक के हाथों हो रही है| शायद इसी दबाव से मुक्ति आंसुओं के रास्ते बह निकली|

 

[ड़ा. राकेश पारिख]

मूल लेख

मई 30, 2014

योगेन्द्र यादव : 21वीं सदी में नहीं चल सकती 20वीं सदी की राजनीति

Yogendra Yadav‘प्रभात खबर’ के रंजन राजन ने राजनीतिक विश्‍लेषक व ‘आप’ नेता योगेंद्र यादव से लंबी बातचीत की|

रंजन – 2014 के जनादेश को आप कैसे देखते हैं? क्या इसे आप ‘मोदी लहर’ का परिणाम मानते हैं?

योगेन्द्र – ‘चुनावी लहर’ का मतलब है चुनाव क्षेत्रों और राज्यों की सीमाओं को लांघ कर देश के बड़े इलाके में एक जैसा रुझान दिखना. नतीजे में जब भी ऐसी स्थिति दिखे, तो उसे हम ‘चुनावी लहर’ का नाम दे सकते हैं. जैसे 1971 में हुआ, 1977 में हुआ, 1984 में हुआ. इस लिहाज से 2014 के जनादेश को ‘चुनावी लहर’ कहना बिल्कुल सही होगा. यह सही है कि इस लहर में नरेंद्र मोदी की भी भूमिका है, लेकिन इसे ‘मोदी लहर’ मान लेना या ‘मोदी लहर’ की संज्ञा देना, इस चुनावी लहर के चरित्र को समझने में चूक होगी|
दरअसल, 2014 की ‘चुनावी लहर’ के तीन प्रमुख कारक हैं. पहला, जो शायद सबसे बड़ा कारक था, यूपीए-2 के राज ने देश में एक तरह का नैतिक और राजनीतिक शून्य पैदा कर दिया था. इसलिए जनता के मन में असंतोष नहीं, बल्कि गुस्सा घर कर गया था. लोग कह रहे थे कि यूपीए को छोड़ कर जो मर्जी सत्ता में आ जाये. दूसरा, इस गुस्से में लोग एक पुख्ता और जाना-पहचाना विकल्प भी ढूंढ रहे थे. इस लिहाज से भारतीय जनता पार्टी एक जानी-पहचानी पार्टी थी, पायदार दिखाई दे रही थी और लोगों को भरोसा था कि यह पार्टी देशभर में जीत हासिल कर सकती है, 272 के आंकड़े को छू सकती है, केंद्र में सरकार बना सकती है|

नरेंद्र मोदी इस चुनावी लहर के तीसरे कारक थे. उनका योगदान यह था कि उन्हें देश में एक मजबूत नेता के रूप में पेश किया गया. ऐसे में मोदी की छवि ने चुनावी रुझान को एक लहर में तब्दील कर दिया. मोदी की छवि में लोगों को वह शून्य भरने की संभावना दिखाई देने लगी. मनमोहन सिंह के लचर एवं कमजोर व्यक्तित्व के सामने लोग अगर एक मजबूत एवं निर्णायक व्यक्तित्व देखना चाह रहे थे, तो नरेंद्र मोदी की छवि ने उस कमी को पूरा किया. मोदी की छवि में लोगों को भविष्य के लिए आशा दिखाई दी. जिन-जिन बातों को लेकर लोगों के मन में एक कसक थी, वह पूरी होती दिखायी दी. ऐसा अकसर होता है कि इस तरह की किसी छवि में जो कोई व्यक्ति जो कुछ भी ढूंढ़ना चाहता है, ढूंढ़ लेता है|

रंजन – नरेंद्र मोदी ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान जो वादे किये हैं, उसके आधार पर बहुत से लोगों को लग रहा है कि देश में ‘अच्छे दिन’ बस आने ही वाले हैं. आप कितने आशान्वित हैं?

योगेन्द्र – सपने देखना अच्छी बात है. जब कोई समूह या देश सपने देखता है, तो उससे उसका मनोबल बढ़ता है. उसकी ऊर्जा बढ़ती है. उसका मन बड़ा होता है. इसलिए अगर आज देश के एक बड़े वर्ग में आशा है, तो मैं न तो उस आशा से झगड़ना चाहूंगा और न ही उस आशा को पंचर करना चाहूंगा. अगर आज इस देश के लोगों को नरेंद्र मोदी में आस्था है, तो जनता में आस्था रखने के नाते मुङो उन लोगों का सम्मान करना सीखना चाहिए. हालांकि मुङो यह डर भी है कि लोगों की आशाएं कहीं खोखली न साबित हो. मुङो डर है कि कहीं नरेंद्र मोदी के कई दावे महज लफ्फाजी न साबित हों. हालांकि मैं चाहूंगा कि मैं इसमें गलत साबित होऊं|

मैं समझता हूं कि देश में अगर अच्छे दिन आ सकते हैं और हमारी पार्टी उसकी वाहक नहीं बनती है, तो इससे क्या फर्क पड़ता है. जो भी पार्टी वाहक बने, देश का भला हो यह बड़ी बात है|

रंजन – इस लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की अब तक की सबसे बड़ी एवं अप्रत्याशित पराजय के प्रमुख कारक क्या-क्या रहे?

योगेन्द्र – इस बार के जनादेश को सिर्फ कांग्रेस की हार कहना अपर्याप्त होगा. उसकी यह हार अप्रत्याशित और बहुत गहरी ही नहीं थी, बल्कि साथ-ही-साथ यह दीर्घ काल में कांग्रेस के पतन का संकेत देती है. यूपीए की सरकार को दो मौके मिले. चूकि उसकी पहली बार की जीत भी अप्रत्याशित थी, इसलिए उस सरकार के विरुद्ध असंतोष उभरते-उभरते भी समय लगा. चूंकि यूपीए-1 की जीत अप्रत्याशित थी, इसलिए उसका आशा-निराशा का चक्र सामान्य सरकार की तरह नहीं चला. उस सरकार से आशा बंधनी देर से शुरू हुई और यूपीए की पहली सरकार खत्म होने तक भी आशा का माहौल बना ही रहा. लेकिन यूपीए-2 की शुरुआत होते ही निराशा आरंभ हो गयी. यह निराशा भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के चलते चरम सीमा पर पहुंची और 2014 का चुनाव आते-आते नैराश्य में बदल गया|

जनता कांग्रेस से निराश ही नहीं थी, जनता को कांग्रेस से असंतोष ही नहीं था, बल्कि उसमें गुस्सा घर कर गया था. लोग किसी भी सूरत में कांग्रेस से छुटकारा पाना चाह रहे थे. सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह की ईमानदारी की चमक उतर चुकी थी. लोग इन्हें एक भ्रष्ट सरकार के मुखौटे के रूप में देखने लगे थे. राजनीतिक रूप से इस सरकार में किसी दिशा बोध का सर्वथा अभाव था. वह चाहे कश्मीर का मसला हो या तेलंगाना का, कांग्रेस सरकार एक के बाद एक आत्मघाती कदम उठाती चली गयी. सरकारी कामकाज के मामले में भी सबकुछ ठहर गया था. एक तरफ आम आदमी परेशान था, तो दूसरी तरफ उद्योगपति और पूंजीपति भी निराश हो गये थे. ऐसे में कांग्रेस की ऐतिहासिक हार अप्रत्याशित नहीं थी. लेकिन कांग्रेस का आंकड़ा 50 से भी नीचे गिर जायेगा, इसकी कल्पना मैंने भी नहीं की थी|

कांग्रेस की यह अभूतपूर्व हार एक सामान्य चुनावी हार नहीं है, कि पार्टी इससे पांच साल में उबर जायेगी. यह कांग्रेस के पतन का एक नया दौर हो सकता है. 1989-91 के दौरान कांग्रेस इस देश में राजनीति की धुरी की जगह कई राष्ट्रीय पार्टियों में से एक पार्टी बन गयी थी. उसके बाद से जिस-जिस राज्य में कांग्रेस एक बार बैठ गयी, वहां वापस खड़ी नहीं हो पायी. उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु इसके बड़े उदाहरण हैं. मुङो लगता है कि इस चुनाव के बाद देश की जो मध्य पट्टी है, कांग्रेस उसमें बहुत बड़े संकट में आ सकती है. गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और ओड़िशा में कांग्रेस बीते 15 साल से विपक्ष में रही है, लेकिन किसी भी तरह का विपक्ष देने में असमर्थ रही है. इस बार कांग्रेस का इस सारी पट्टी से सफाया होने के बाद संभव है कि कांग्रेस इस इलाके में बैठ जाये और फिर कभी उबर नहीं पाये. यही दिल्ली और हरियाणा में भी संभव है. राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस विपक्ष में तो है, लेकिन नरेंद्र मोदी के खिलाफ सड़क पर विपक्ष की भूमिका निभा पायेगी, इसमें मुङो संदेह है. और अगर ऐसा हुआ तो राष्ट्रीय स्तर पर भी कांग्रेस के अप्रासंगिक होने की संभावना पैदा हो गयी है|

रंजन – कुछ विश्लेषक कह रहे हैं कि ‘आप’ के चुनाव मैदान में उतरने से भाजपा विरोधी मतों का बिखराव बढ़ा, जिससे भाजपा को बहुमत पाने में सुविधा हुई. दूसरी ओर यह भी कहा जा रहा है कि आप ने कांग्रेस के मुसलिम वोट बैंक में सेंध लगायी, जिससे उसकी सबसे बड़ी हार हुई. आप इन विचारों को कैसे देखते हैं?

योगेन्द्र – यह बहुत ही सतही समझ है. कौन किसके वोट काट रहा है, यह समझने के लिए हमें यह नहीं पूछना चाहिए कि उस वोटर ने पिछले चुनावों में किसे वोट दिया था. हमें यह प्रश्न पूछना चाहिए कि वह वोटर अगर आम आदमी पार्टी मैदान में नहीं होती तो किसे वोट देता. यह कांग्रेस की खुशफहमी है कि जिन लोगों ने आम आदमी पार्टी को वोट दिया, वे ‘आप’ के नहीं रहने पर कांग्रेस को वोट देते. हकीकत यह है कि उनमें से काफी लोगों ने पिछली बार कांग्रेस को भले ही वोट दिया हो, लेकिन उनमें से एक बड़ा वर्ग इस बार के चुनाव में कोई विकल्प नहीं होने पर झक मार कर भाजपा को ही वोट देता. इसीलिए आम आदमी पार्टी से भाजपा जितनी बौखलायी हुई थी, उतनी तो कांग्रेस भी नहीं बौखलायी थी|

दिल्ली विधानसभा चुनाव पर गौर करें. अगर उसमें आम आदमी पार्टी चुनाव नहीं लड़ती, तो जाहिर है भाजपा को बहुत बड़ी सफलता मिलती. अब तो दिल्ली का राजनीतिक नक्शा पूरी तरह बदल गया है और कम-से-कम दिल्ली के बारे में तो हमें यही कहना चाहिए कि वहां कांग्रेस ही आम आदमी पार्टी के वोट काट रही है. अगर कांग्रेस ने एक-दो संसदीय क्षेत्रों में वोट न काटा होता, तो शायद लोकसभा चुनाव में भी दिल्ली में ‘आप’ को एक-दो सीटें मिल जाती. लेकिन राजनीति का गुणा-भाग केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता. मैं समझता हूं कि अगर आम आदमी पार्टी चुनाव में नहीं होती, तो देश के लिए, देश के भविष्य की दिशा ढूंढनेवाले काफी लोगों का मन नैराश्य में डूब जाता. नरेंद्र मोदी में देश का भविष्य न देखनेवाले लोगों को इस चुनाव में देश के भविष्य के लिहाज से कुछ नजर ही नहीं आता. आम आदमी पार्टी ने इस देश के आदर्शवादियों, और खास कर देश के युवाओं, के मन में देश के भविष्य के प्रति एक उम्मीद जगायी है. यह किसी भी चुनावी गणित से बड़ी बात है|

रंजन – इस बार के जनादेश में वामपंथी दलों की जमीन और खिसकी है. अब वाम दलों की राजनीति की दशा-दिशा और भविष्य की चुनौतियों को आप कैसे देखते हैं?

योगेन्द्र – पिछले दो-तीन दशकों से लेफ्ट की राजनीति धीरे-धीरे अप्रासंगिक होती जा रही है. लेफ्ट राष्ट्रीय ताकत की जगह पर एक क्षेत्रीय ताकत में तो पहले ही बदल चुका था, अब उन क्षेत्रों से भी धीरे-धीरे फेल होता जा रहा है. पश्चिम बंगाल में लेफ्ट खत्म भले ही न हो रहा हो, लेकिन ममता बनर्जी से हार के बाद पहले जैसा दबदबा कायम नहीं कर सकता. केरल में तो एलडीएफ एक वामपंथी शक्ति बचा ही नहीं. उधर, मानिक सरकार पुरानी राजनीतिक पूंजी और अपने व्यक्तिगत प्रताप से चुनाव जीत रहे हैं|

हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि जनाभिमुखी और गरीब व्यक्ति के सपनों की राजनीति की जगह नहीं बची है. मैं मानता हूं कि ऐसी राजनीति भारत के लोकतंत्र के केंद्र में है और रहेगी. लेकिन मैं मानता हूं कि लेफ्ट की ‘ऑर्थोडॉक्स राजनीति’ आज जन आकांक्षाओं का वाहक नहीं बन पा रही है. जनता की आकांक्षाओं को एक नयी राजनीति की तलाश है. पिछले दो-तीन दशकों के जनांदोलन इसी तलाश का परिणाम हैं. और मैं चाहता हूं कि आम आदमी पार्टी भी इसी तलाश का वाहक बने|

रंजन – आप विकल्प की बात करते हैं, तो आपकी आर्थिक नीतियां कांग्रेस और भाजपा से किस तरह अलग हैं? क्या इस चुनाव में वामपंथी दलों की ओर से खाली हुई राजनीतिक जमीन को भरने की दिशा में आपकी पार्टी बढ़ेगी?

योगेन्द्र – किसी भी नयी राजनीति की यह नियति होती है कि उसे शुरुआत में पुराने चश्मे से ही देखा जाता है. हमारे साथ भी यही हो रहा है. हम स्थापित राजनीतिक खांचों के बाहर अपनी राजनीति स्थापित कर रहे हैं, लेकिन हमारे हर कदम को अब भी उन्हीं पुराने राजनीतिक खांचों में फिट करने की कोशिश की जाती है. मैंने बार-बार कहा है कि हमारी राजनीति न तो लेफ्ट की है, न ही राइट की|

आर्थिक नीतियों को लेकर इस देश में जो जड़ता आयी है, आर्थिक नीतियों के बारे में सोच जिस तरह से दो खांचों में बंध गयी है, हम उससे बाहर निकलना चाहते हैं. इसका मतलब यह नहीं है कि हम सामाजिक न्याय या आर्थिक समता के विरुद्ध हैं. इस देश का संविधान समता, न्याय और बंधुत्व की बुनियाद पर ही खड़ा है. लेकिन हम अंतिम व्यक्ति की भलाई को किसी पुराने वैचारिक खांचे से बांध कर नहीं देखते. हमारा साध्य है अंतिम व्यक्ति के हाथ में संसाधन पहुंचना, लेकिन हमारे साधन और औजार किसी बने-बनाये मॉडल से नहीं आते. अंतिम इनसान की खुशहाली अगर सरकार के दखल देने से बेहतर होती है, तो हम दखल के पक्ष में हैं और अगर सरकार के हाथ खींचने से बेहतर होती है, तो हम हाथ खींचने के पक्ष में हैं|

कुछ सेक्टर हैं- जैसे शिक्षा और स्वास्थ्य-जहां हम सरकार की पहले से ज्यादा दखल चाहते हैं, लेकिन व्यापार और उद्योग में हम चाहेंगे कि सरकार कुछ न्यूनतम नियमन के अलावा बहुत ज्यादा दखलंदाजी न करे. यह बात चूंकि नयी है, इसलिए लोगों को अटपटी लगती है और वे कहते हैं कि हमारे विचार स्पष्ट नहीं हैं. लेफ्ट के साथी सोचते हैं कि हम अभी उनकी तरह हो नहीं पाये हैं. सच यह है कि हम उस तरह के वैचारिक ढांचे से बंधना ही नहीं चाहते. बीसवीं सदी की विचारधाराओं के गिरफ्त से मुक्त हुए बिना इक्कीसवीं सदी के विचारों को, इक्कीसवीं सदी की राजनीति को स्थापित नहीं किया जा सकता|

रंजन – इस जनादेश के बाद विरोध की राजनीति को आप गैर-कांग्रेसवाद से गैर-भाजपावाद में शिफ्ट होते देख रहे हैं? क्या विरोध की राजनीति को दिशा देने के लिए आम आदमी पार्टी अन्य दलों के बीच तालमेल का प्रयास करेगी, या चुनाव से पहले की एकला चलो की नीति पर ही चलती रहेगी?

योगेन्द्र – नरेंद्र मोदी की राजनीति के विरोध के दो अलग-अलग स्वरूप होंगे और इसकी दो अलग-अलग जमीन होगी. इसमें कोई शक नहीं है कि संसद के भीतर गैर-भाजपाई ताकतें किसी न किसी किस्म का गैर-भाजपावाद चलाने की कोशिश करेंगी. यह कोई नयी चीज नहीं है. पिछले तीस साल में कांग्रेस, वामपंथी दलों और कुछ अन्य संगठनों ने मिल कर इस तरह की कोशिशें कई बार की है|

लेकिन इसके अनुभव ने हमें सिखाया है कि भाजपा के विरोध के लिए मतलबी गंठजोड़ बनाने से कुछ हासिल नहीं होता, बल्कि इससे भाजपा और ज्यादा मजबूत होती है. इस प्रयोग ने यह भी सिखाया है कि भाजपा विरोध के नाम पर सेक्युलर खेमा बनाने की कोशिश भी एक ढकोसला बन कर रह जाती है. कांग्रेस, राजद, सपा सरीखे पार्टियों का सेक्युलरिज्म मुसलमानों को बंधक बनाये रखने का षड्यंत्र है. जनता इसे खारिज कर चुकी है. मुङो नहीं लगता कि इस तरह के किसी प्रयास से भाजपा का विकल्प बनाने में कोई मदद मिलेगी. संसद के भीतर एकाध बार कुछ छोटी सफलता मिल सकती है, लेकिन इससे भाजपा की राजनीति का मुकाबला करने की ऊर्जा खड़ी नहीं हो सकती|

आम आदमी पार्टी कांग्रेस विरोध या भाजपा विरोध के नाम पर अवसरवादी गंठबंधनों के खिलाफ रही है. हमारे लिए भाजपा विरोध का मतलब संसद में भाजपा के खिलाफ कभी-कभार बोल देना या उसके कुछ कानूनों का विरोध करना भर नहीं होगा. हमारे लिए भाजपा विरोध का मतलब होगा उस तरह की राजनीति का विरोध करना, जिसकी प्रतीक आज भाजपा है. हमारे लिए भाजपा के विरोध का मतलब होगा हर किस्म के भ्रष्टाचार का विरोध करना, हर किस्म की सांप्रदायिकता का विरोध करना, देश में लोकतंत्र के हनन का विरोध करना और एक नंगे किस्म के पूंजीवाद का विरोध करना. आज भाजपा इन खतरों का प्रतीक है, लेकिन सिर्फ भाजपा इस अपराध की दोषी नहीं है|

इसमें देश का पूरा सत्ता प्रतिष्ठान शामिल रहता है. इसलिए विपक्ष की राजनीति हमारे लिए ऐसी राजनीति नहीं हो सकती कि हम सिर्फ भाजपा के भ्रष्टाचार के बारे में बोलें, और कांग्रेस के भ्रष्टाचार पर चुप हो जायें. सिर्फ भाजपा की सांप्रदायिकता के बारे में बोलें और सपा या एमआइएम (मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन) की सांप्रदायिकता पर मौन साध लें. विपक्ष की राजनीति हमारे लिए केवल संसद तक सीमित नहीं रहेगी. मैं समझता हूं कि अगले पांच साल तक मोदीमय भाजपा के विरोध का असली मंच संसद नहीं होगा, बल्कि इस लड़ाई को सड़क और मैदान पर लड़ना होगा. मुङो नहीं लगता कि यह कांग्रेस के बस की बात है|

इसलिए आम आदमी पार्टी को यह बीड़ा उठाना पड़ेगा. संसद में भले ही हम एक छोटी विपक्षी पार्टी के रूप में गिने जायेंगे, लेकिन अगले पांच साल में आम आदमी पार्टी जमीन पर इस देश की प्रमुख विपक्षी ताकत के रूप में उभरेगी. जहां तक दूसरी पार्टियों के बीच तालमेल का सवाल है, मेरे अब तक के जवाब में ही इसका उत्तर अंतर्निहित है, यानी कि भाजपा विरोध के नाम पर भानुमति का कुनबा जोड़ने की राजनीति में हमारा विश्वास नहीं है|

रंजन – भाजपा के कुछ नेताओं ने कहा है कि इस वक्त भाजपा विरोध की बात करना 2014 के जनादेश का अपमान होगा?

योगेन्द्र – मैं समझता हूं कि लोकतंत्र में यह कहना ही लोकतंत्र का अपमान है, कि किसी भी दल का विरोध करना जनादेश का अपमान होगा. मैं समझता हूं कि अगर कोई पार्टी इतना बड़ा जनादेश लेकर सत्ता में पहुंची है, तो उसे स्वयं इस बात की चिंता होनी चाहिए कि उसके किसी गलत कदम का अच्छा विरोध हो पायेगा या नहीं. विपक्ष तो लोकतंत्र की आत्मा है. उससे डरना लोकतंत्र से डरना होगा|

रंजन – यह भी कहा जा रहा है कि इस बार के जनादेश में यूथ फैक्टर काफी अहम रहा है. देश के करोड़ों युवा मतदाताओं की आकांक्षाएं अलग तरह की हैं और उनमें बड़ी उम्मीद है नरेंद्र मोदी को लेकर, इसलिए उन्होंने जाति-धर्म से ऊपर उठ कर विकास के नाम पर, मोदी सरकार बनाने के लिए मतदान किया है. इस संबंध में आपकी क्या राय है?

योगेन्द्र – मैंने इस बार के चुनाव के आंकड़े ठीक से देखे नहीं हैं, क्योंकि मैं किसी भी सव्रेक्षण की टीम में शामिल नहीं था. इसलिए मैं प्रमाण के साथ तो नहीं कह पाऊंगा, लेकिन मुङो इस तरह के दावों में अतिशयोक्ति नजर आती है. इसमें कोई शक नहीं कि भारत में युवाओं और युवा मतदाताओं की संख्या ज्यादा है. और इसमें भी कोई शक नहीं कि बाकी मतदाता-समूहों की तुलना में युवाओं में भाजपा के लिए आकर्षण अपेक्षाकृत ज्यादा है, लेकिन इतना भर से युवा वोट या युवा शक्ति का भाजपामय हो जाना जैसे निष्कर्षो पर हम नहीं पहुंच सकते. हमें अभी देखना है कि युवाओं का यह रुझान झणिक है या दीर्घकालिक. इसके बाद ही किसी बड़े निष्कर्ष पर हम पहुंच सकते हैं|

रंजन – पहले माना जा रहा था कि उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में क्षेत्रीय पार्टियों का जाति आधारित मजबूत जनाधार है, लेकिन अब कहा जा रहा है कि खासकर हिंदी पट्टी में यूथ फैक्टर इतना कारगर रहा कि क्षेत्रीय दलों के किले ध्वस्त हो गये. इस चुनाव में क्षेत्रीय दलों का जनाधार क्यों खिसक गया और इसके बाद क्षेत्रीय दलों की राजनीति के समक्ष क्या प्रमुख चुनौतियां हैं?

योगेन्द्र – इस चुनावी लहर में भाजपा या भाजपा समर्थक दलों को छोड़ कर बाकी ज्यादातर दलों को भारी नुकसान हुआ है. खास कर उत्तर भारत के क्षेत्रीय दल इसी का शिकार हुए हैं. हालांकि यह बात दक्षिण और पूर्वी भारत के क्षेत्रीय दलों पर पूरी तरह लागू नहीं होती है. अन्ना द्रमुक, द्रमुक, वाइएसआर की पार्टी, तेलंगाना राष्ट्रीय समिति, बीजेडी और ममता बनर्जी की पार्टी को तो कोई नुकसान नहीं हुआ. अगर नुकसान हुआ तो मुख्यत: उत्तर प्रदेश, बिहार और हरियाणा के क्षेत्रीय दलों को. इसलिए यहां उत्तर प्रदेश और बिहार के क्षेत्रीय दलों की हार पर अलग से गौर करना बेहतर होगा|

मैं समझता हूं कि इन दोनों राज्यों में मंडलीकरण के बाद की जातीय राजनीति अपने एक चरम बिंदु पर पहुंच कर अप्रासंगिक होने लगी थी. जातिगत राजनीति की यही नियति है कि एक जाति आधारित वोट बैंक मजबूत होते-होते एक ऐसे बिंदु तक पहुंच जाती है, जहां राजनीतिक जड़ता आ जाती है और जहां लोगों को समझ आने लगता है कि इस जड़ता से बाहर निकलने की जरूरत है. खासकर उत्तर प्रदेश में लोगों ने पिछले दस-पंद्रह वर्षो में सभी मुमकिन राजनीतिक समीकरण इस्तेमाल कर लिये थे- अगड़ों का, पिछड़ों का, दलित, यादव, मुसलिम आदि सभी इस्तेमाल हो चुके थे. और यह यात्रा एक ठहराव के बिंदु पर पहुंच गयी थी|

इस बार भाजपा की बड़ी विजय उसके परंपरागत सामाजिक समीकरण की विजय नहीं है. वह सभी जाति-समुदायों के एक बड़े हिस्से को जोड़ कर बेहतर सरकार बनाने की राजनीति की विजय है. इस लिहाज से नरेंद्र मोदी की विजय में कहीं जातिवादी राजनीति से मुक्त होकर एक बेहतर सरकार और बेहतर राजकाज की इच्छा शामिल थी. मुङो नहीं लगता कि भाजपा या नरेंद्र मोदी वास्तव में इस इच्छा को पूरा कर पायेंगे, लेकिन इस इच्छा का होना दोनों राज्यों में, खास तौर पर उत्तर प्रदेश में एक सार्थक राजनीतिक संभावना की ओर इशारा कर रहा है|

रंजन – यदि जातीय राजनीति अप्रासंगिक हो जायेगी, तो कई क्षेत्रीय दलों का ‘वोट बैंक’ ही खत्म हो जायेगा. ऐसे में इस जनादेश के बाद क्षेत्रीय दलों को अपनी राजनीति को किस तरह से आगे बढ़ाना होगा?

योगेन्द्र – इस विषय में क्षेत्रीय और राष्ट्रीय, सभी सभी दलों को विचार करने की जरूरत है. खास कर उत्तर प्रदेश और बिहार की राजनीति एक खास दौर से गुजर चुकी है. सामाजिक न्याय के नारे के तहत हुई राजनीति के इस दौर में लोगों के जीवन के, रोजमर्रा के, मुद्दों में बेहतरी के सवाल गौण हो गये थे. मोदी की जीत इस ओर इशारा करती है कि इन सवालों को दबाया नहीं जा सकता. यानी क्षेत्रीय हों या राष्ट्रीय, सभी दलों को खुद को आम लोगों की जिंदगी में खुशहाली के सपने से जोड़ना होगा. मैं नहीं मानता कि नरेंद्र मोदी इस काम को पूरा कर पायेंगे. हालांकि वे इस सपने के वाहक बनते हुए दिखाई दे रहे हैं, इस बात से मैं इनकार नहीं कर सकता|

रंजन – क्षेत्रीय दलों की ओर से सामाजिक न्याय का नारा भी तो इसी तर्क के साथ दिया जाता है कि संसाधनों के बंटवारे में जो लोग अपना हिस्सा पाने से वंचित रह गये हैं, उन्हें उनका हक दिलायेंगे. तो इस जनादेश से क्षेत्रीय दलों को क्या सबक लेने की जरूरत है|

योगेन्द्र – सामाजिक न्याय की राजनीति ने इस प्रकार के नारे तो दिये, लेकिन व्यवहार में वह राजनीति केवल प्रतीकात्मक हिस्सेदारी की राजनीति बन गयी. इसमें चेहरों में तो हिस्सेदारी हुई, यानी कितने एमएलए किस समुदाय के बनेंगे, कितने मिनिस्टर किसके बनेंगे; लेकिन विकास के फल में हिस्सेदारी का माहौल नहीं बन पाया|

मैं समझता हूं कि बिहार में शुरू में यह सबक नीतीश कुमार सरकार ने सीखा, कि लोगों को सिर्फ सामाजिक न्याय का नारा नहीं चाहिए, उसे सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा, रोजगार आदि में हिस्सेदारी भी चाहिए, हालांकि बाद में वे भी इस पर पूरी तरह कायम नहीं रह पाये. मुङो लगता है कि इस बार के जनादेश से खास कर उत्तर प्रदेश में सपा एवं बसपा और बिहार में राजद को यह सबक सीखना होगा कि जब तक वे बिजली, पानी, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार के सवालों पर कुछ करेंगे नहीं, तब तक सिर्फ प्रतीकात्मक सामाजिक न्याय की बात करने से उनकी राजनीति बहुत दिन तक टिकनेवाली नहीं है|

रंजन – इस लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी का प्रदर्शन उम्मीद से काफी कम क्यों रहा?

योगेन्द्र – आम आदमी पार्टी के लिए यह जनादेश न तो निराशाजनक रहा है और न ही बहुत अप्रत्याशित. संभव है कि हमारे कुछ समर्थकों, शुभचिंतकों के मन में बड़ी उम्मीदें बंध गयी थीं. लेकिन दरअसल अपने पहले लोकसभा चुनाव में किसी पार्टी से इससे ज्यादा अपेक्षा करनी ही नहीं चाहिए. पिछले तीस-चालीस साल में केवल दो नयी राष्ट्रीय पार्टियां इस देश में स्थापित हुईं- भाजपा और बसपा. उन दोनों पार्टियों के पहले लोकसभा चुनाव पर आप गौर कीजिए. 1984 में भाजपा ने अपना पहला राष्ट्रीय चुनाव लड़ा था, उसे सिर्फ दो सीटें आयी थीं. लेकिन चूंकि उसमें एक पुरानी पार्टी का अंश शामिल था, इसलिए उसे सात फीसदी वोट हासिल हो गये थे. 1989 में बसपा ने पहली बार राष्ट्रीय चुनाव लड़ा, उसे दो सीटें आयीं और दो प्रतिशत वोट हासिल हुए. इस तरह पहले चुनाव के लिहाज से हमारा प्रदर्शन बुरा नहीं है|

हां, हमें दिल्ली में निराशा जरूर हुई. दिल्ली में हमारा वोट प्रतिशत भले ही बढ़ा हो, लेकिन हमें कोई सीट नहीं मिली और भाजपा का फासला हमसे बढ़ा. हमें वाराणसी में भी निराशा हुई. मैंने सोचा था कि दिल्ली के बाद हमें हरियाणा में एक नयी शुरुआत मिलेगी, लेकिन ऐसा नहीं हो सका. लेकिन इस चुनाव में आम आदमी पार्टी को जो हासिल हुआ है, वह कम नहीं है. चार सीटें अपने-आप में कम जरूर लगती हैं, लेकिन दिल्ली से बाहर एक नये राज्य-पंजाब-में हमें कामयाबी मिली है|

रंजन – इस चुनाव में ‘आप’ को उम्मीद से काफी कम सीटें मिलने पर कुछ विश्लेषक दो बड़े कारण गिना रहे हैं. पहला, दिल्ली में 49 दिनों में ही सरकार चलाने से इनकार कर देना और दूसरा, पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र का अभाव तथा ज्यादातर फैसले अरविंद केजरीवाल एवं मनीष सिसोदिया जैसे कुछेक नेताओं द्वारा मनमाने तरीके से लिया जाना. आप क्या कहेंगे?

योगेन्द्र – जहां तक दिल्ली सरकार के इस्तीफा देने का सवाल है, इसमें कोई शक नहीं कि इस्तीफा देने से दिल्ली में भी और दिल्ली के बाहर भी बड़े तबके को धक्का लगा. उन्हें लगा कि कोई सरकार, जो उनके लिए बहुत सारे काम कर सकती थी, अचानक चली गयी. और पूरे चुनाव में यह बात हमें हर जगह और बार-बार सुनने को मिली. हम पर भगोड़े का आरोप कहीं चिपक गया. हम तर्क देते रह गये, लेकिन जनता हमारी बात को नहीं मानी. राजनीति का काम है जनता से सबक लेना. और मैं समझता हूं कि यह एक सबक हमारे लिए है कि हमें दिल्ली सरकार को छोड़ने का फैसला भी हमें जनता के साथ किसी राय-मशविरे के बाद लेना चाहिए था, जैसा कि हमने सरकार बनाने के वक्त किया था. और अगर जनता कहती कि छोड़ना नहीं चाहिए, तो हमें जनता की बात माननी चाहिए थी. उसमें हमारी राजनीतिक समझ की एक चूक हुई, यह मानने में हमें कोई संकोच नहीं है|

रही बात पार्टी की आंतरिक निर्णय प्रक्रिया की, तो मैं समझता हूं कि आम आदमी पार्टी देश की अन्य पार्टियों की तुलना में ज्यादा लोकतांत्रिक है और पूरी तरह से लोकतांत्रिक बनना अपने आप में एक प्रक्रिया है, जिसमें तमाम उतार-चढ़ाव आते हैं. और मुङो यकीन है कि स्वराज के जिस विचार को लेकर यह पार्टी बनी है, उसे यह अपनी कार्यप्रणाली में भी समाहित कर पायेगी|

रंजन – इस जनादेश के बाद आपलोगों ने इस पर मंथन किया होगा. आम आदमी पार्टी ने इस जनादेश से क्या-क्या प्रमुख सबक लिये हैं और उनके आधार पर पार्टी आगे अपनी रणनीति में किस तरह की तब्दीली करने जा रही है?

योगेन्द्र – अभी हमारी बैठकों का सिलसिला पूरा नहीं हुआ है और हमारी राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक होनी अभी बाकी है. इसलिए मैं अपनी समझ के बारे में ज्यादा कह पाऊंगा, पार्टी की सामूहिक समझ के बारे में अभी ज्यादा नहीं कह पाऊंगा|

मुङो लगता है कि हमारे लिए बड़ा सबक यह है कि लोग हमारी ईमानदारी पर तो भरोसा करते हैं, लेकिन हमारी समझदारी के बारे में अभी आश्वस्त नहीं हैं. हमें लोगों के बीच यह साबित करना है कि हम सरकार बनाने और चलाने के बारे में गंभीर हैं. हममें सरकार चलाने की काबिलियत है और हम रोजमर्रा के मुद्दों को हल करने के लिए धैर्य के साथ काम कर सकते हैं|

दूसरा सबक यह है कि पोलिंग बूथ के स्तर पर संगठन बना कर पोलिंग बूथ मैनेजमेंट किये बिना बड़ी पार्टियों के मुकाबले में चुनाव लड़ना और जीतना संभव नहीं है|

तीसरा सबक कह लीजिये या चुनौती, बड़े मीडिया और बड़ी पूंजी का जो सम्मिलित हमला है, उसके सामने टिकना आसान काम नहीं है. इस बार के चुनाव में जिस तरह से इस देश का बड़ा पूंजीपति वर्ग और मीडिया का एक बड़ा हिस्सा नरेंद्र मोदी के प्रचार-प्रसार में लग गया, उसके सामने खड़ा होने की रणनीति अभी हमारे पास नहीं है. इसकी रणनीति हमें बनानी पड़ेगी|

इसका मतलब है कि आम आदमी के लिए आगे का रास्ता है संगठन का निर्माण करना. हमें नीचे से ऊपर तक, यानी पोलिंग बूथों से लेकर संसदीय क्षेत्रों तक, राज्यों से राष्ट्र स्तर तक अपना संगठन बनाना होगा और आनेवाले विधानसभा चुनावों के लिहाज से जनता को समझाना होगा कि हम गंभीर और सफल सरकार बनाने में सक्षम हैं. यह काम असंभव नहीं है, लेकिन इसके लिए बहुत धीरज की जरूरत है|

रंजन – एक जाने-माने राजनीतिक विश्लेषक से एक संसद सदस्य बनने की दिशा में आपके द्वारा उठाये गये कदम का एक उम्मीदवार के रूप में व्यक्तिगत अनुभव कैसा रहा और इससे आपको क्या-क्या नयी चीजें सीखने को मिलीं?

योगेन्द्र – मेरे लिए पूर्णकालिक राजनीति में आना उतना बड़ा बदलाव नहीं था, जितना बाहर से दिखाई दे रहा था. पिछले तीन दशकों से मैं देश के सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों से जुड़ा रहा हूं, देश भर की खाक छानता रहा हूं, तमाम जनांदोलनों का हमसफर रहा हूं. इसलिए मेरे लिए राजनीति में या जमीन पर काम करना उतनी नयी चीज नहीं थी. लेकिन फिर भी बदलाव तो था और बहुत बड़ा बदलाव था. खास तौर पर जमीन पर चुनाव लड़ना और जीतने के इरादे से चुनाव लड़ना एकदम नया अनुभव था. इसने मुङो बहुत कुछ सिखाया. पहला तो यह सीखा कि मैं राजनीति के बारे में कितना कम जानता हूं. दुनिया मुङो विशेषज्ञ होने का तगमा जरूर देती रही है, लेकिन सच बात यह है कि राजनीति का वह किताबी ज्ञान धरातल पर चुनाव लड़ने के वक्त बहुत काम नहीं आया|

दूसरा यह कि जिस इलाके को मैं अपनी मातृभूमि और कर्मभूमि मानता रहा हूं, उस इलाके को भी मैं कितना कम जानता हूं. मेरे लोकसभा क्षेत्र के कितने गांव, इलाके, क्षेत्र ऐसे थे, जिन्हें मैंने कभी देखा भी नहीं था, जिनके दुख-तकलीफ को मैं समझता भी नहीं था. इसलिए चुनाव में असफल होने पर पहला विचार मेरे मन में यही आया कि शायद अभी मैं इसके काबिल ही नहीं था. मुङो तो अभी अपने इलाके के बारे में बहुत कुछ जानना है, समझना है|

तीसरा, कुछ खट्टे-मीठे अनुभव भी हुए. कुछ इस किस्म के अनर्गल और व्यक्तिगत आरोप लगे, जो तीखे तो थे ही, बहुत छिछले भी थे और मेरी चमड़ी अभी इतनी मोटी नहीं है कि इन बातों का कोई असर नहीं पड़े. जाहिर है, दिल को चोट भी पहुंची और मैं अभी समझ नहीं पाया हूं कि उस किस्म की घटिया हरकतों से कैसे निपटा जाये, जिससे मानसिक द्वेष न हो|

लेकिन सबसे बड़ा अनुभव यह रहा कि आम लोगों का इतना प्यार मिला, जितना पहले न तो कभी मुङो मिला था और न ही जिसके मैं काबिल हूं. केवल अपने गांव के इर्द-गिर्द नहीं, केवल स्वजातीय लोगों में नहीं, बल्कि तमाम इलाकों में वोट मिला या न मिला हो, लेकिन मुङो लोगों का भरपूर स्नेह मिला. क्षेत्र के भीतर से और बाहर से इतने सारे कार्यकर्ताओं ने खुद आकर धन दिया, ऊर्जा दी और इस चुनाव अभियान को अपना अभियान बना दिया|

मार्च 31, 2014

“आप” डायरी (30 मार्च 2014) : तस्वीरें बोलती हैं

HighCourtDelhiमीडिया “आम आदमी पार्टी” को न दिखाने, या गलत तरीके से प्रस्तुत करने की योजना पर पूरी मेहनत कर रहा है| देश भर में बहुत सी जगह “आप” का असर बढ़ता जा रहा है पर अखबार, पत्रिकाओं और टीवी चैनलों में इससे उल्ट बातें पढ़ने और देखने को मिलती हैं| दिल्ली हाई कोर्ट ने “आप” की रिट पर फैसला देते हुए कांग्रेस और भाजपा को वेदांता और Dow Chemicals द्वारा दिए गये चंदे को अवैध माना है पर किसी भी टीवी चैनल ने इस खबर को तवज्जो देना जरूरी नहीं समझा पर यही “आप” के साथ होता तो जमीन आसमान एक कर देता मीडिया|

मीडिया बनाम अरविंद केजरीवाल| मीडिया के बहुत बड़े वर्ग ने अरविंद से अदावत पाल ली है| वे इसका बहाना भी खोज रहे थे क्योंकि अरविंद उनके कब्जे में नहीं हैं जैसे अन्य पार्टियों के नेता हैं| अरविंद मीडिया को भी सरेआम कोसते हैं| लगभग हरेक मीडिया हाउस अरविंद और “आप” से जुडी ख़बरों को इस तरह से तोड़ रहा है जिससे सतही तौर पर देखने वाले को वह “आप” के खिलाफ लगे और चुनावी माहौल में इससे ज्यादा समय होता नहीं आम दर्शक के पास| वह गहराई में नहीं जाता|

एक अन्य उदाहरण से समझा जा सकता है कि मीडिया कैसे “आप” के खिलाफ तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत कर रहा है|

“आज तक” ने खबर चलाई  कि संतोष कोली के परिवार ने अरविंद पर गंभीर आरोप लगाए हैं और संतोष की ह्त्या हुयी थी| अरविंद और “आप” तो कब से कह रहे हैं कि संतोष की ह्त्या हुयी थी| और आज तक वाले साफ़ इस बात को छिपा गये कि “आप” ने संतोष कोली के भाई को दिल्ली में विधायक बनवाया|

modifordमीडिया ने अरविंद द्वारा कथित रूप से मीडिया को जेल भेजने वाले वीडियो के बाद तो अरविंद को पूरी तरह निशाने पर ले लिया है जबकि अरविंद ने उसमें कहा था [“इसकी जांच करवाएंगे और मीडिया समेत सबको जेल भेजेंगे”] इसका सीधा सा अर्थ यही है कि जो भी दोषी होगा इस फिक्सिंग में (मीडिया कर्मी और अन्य लोग- मसलन कोर्पोरेट वाले जो पैसे देकर मीडिया को खरीद रहे हैं) उन्हें जेल भेजेंगे| मीडिया कोई १००% ईमानदार तो है नहीं कि सारे मीडिया को इस आरोप पर आग बबूला होकर भारत में बदलाव लाने योग्य एक “आशा” – “आप” पर आक्रमण करके देश के साथ नाइंसाफी करने लगे| ईमानदार मीडियाकर्मियों को सामने आना जरूरी है|

२०१४ के मार्च महीने में भारत में बहुत कुछ हो गया| भारत ने आपातकाल के बाद वाले चुनावों को छोड़ कर इतनी रूचि किसी और चुनाव में नहीं ली होगी| भारत बनने और बिगड़ने के कगार पर खड़ा है| अगर “आप” को सम्मानजनक समर्थन भारत देता है तो देश में राजनीति  को स्वच्छ बनाने का कार्य आरम्भ हो जाएगा और अगर “आप” को वाजिब समर्थन नहीं मिला तो यह कार्य मुल्तवी हो जाएगा और भ्रष्टाचार के कारण सड़ चुका तंत्र फिर से देश की तकदीर स खेलता रहेगा|

मीडिया के कांग्रेस+भाजपा के साथ हाथ मिलाकर “आप” के खिलाफ माहौल बनाने के खेल के बावजूद “आम आदमी पार्टी” ने कांग्रेस और भाजपा का जीना मुश्किल कर दिया है| “आप” का दबाव इन पर न होता तो ये न इतने परेशान होते “आप” को लेकर और न इस पर रोज नाजायज हमले करते| क्या इन्हे सपा-बसपा, जद (यू), ने. का, वाम दल आदि पर ऐसे तीखे आक्रमण करते देखा है? दस साल पहले भाजपा पूरी ताकत कांग्रेस और वाम दलों के खिलाफ लगाती थी और कांग्रेस इन् दोनों के खिलाफ, पर आज दोनों बड़ी पार्टियां अपनी अपनी पूरी ताकत “आप” के खिलाफ लगा रही है| राजनीति को पढ़ने -समझने वाले खुद ही देख सकते हैं देश किसकी ओर ज्यादा झुका हुआ है| और यही तकलीफ है कांग्रेस-भाजपा की कि “आप” के पास न धन है, न सत्ता का अनुभव फिर भी ये कैसे देश भर में भीड़ जुटा रहे हैं, लोग अपने पैसे खर्च करके इनकी रैलियों में भागे जा रहे हैं| नीचे दिए वीडियो में फरीदाबाद की रैली में उमड़े जनसमूह का नाद देखा जा सकता है|

भाजपा के लोग “आप” के लोगों पर हर जगह हमले कर रहे हैं, चाहे जगह मोहल्ला सभाएं हों या टीवी स्टूडियो| नीचे दिए वीडियो में भाजपा के उपाध्यक्ष और प्रवक्ता मुख्तार अब्बास नकवी को क्रोध में दिमागी संतुलन खोते हुए “आप” के प्रतिनिधि को टीवी चैनल पर एक बहस के दौरान गालियों से नवाजते हुए देखा जा सकता है|

नरेंद्र मोदी का तथ्यपरक ज्ञान उनके इतिहास ज्ञान जैसा ही है और उनके भाषणों में अस्सी प्रतिशत बातें झूठ की बुनियाद पर खड़ी होती हैं| मोदी और भाजपा ने “आप” की वेबसाईट पर जिस नक्शे की बात की किस उसमें कश्मीर भारत के नक़्शे के साथ नहीं दिखाया गया, वह असल में आम आदमी पार्टी (AAP) की आधिकारिक वेब साइट (AamAadmiParty.org) पर नहीं बल्कि AapTrends.com का डोनेशन मैप था (AAP-Donation-Map-Just-India)…इस नक्शे में दिखाया गया है कि AAP को भारत के किन हिस्सों से चंदा मिल रहा है…जिन हिस्सों से चंदा नहीं मिल रहा उसे काले रंग से दिखाया गया है…|ManishGoa

पर मोदी और भाजपा इतने उतावले थे कि यह भी पता नहीं लगवा पाए कि AapTrends.com आम आदमी पार्टी (AAP) की आधिकारिक वेब साइट नहीं है… आम आदमी पार्टी (AAP) की आधिकारिक वेब साइट है AamAadmiParty.org …

नरेन्द्र मोदी लोगों की भावनाओं को भड़काने के काम में लगे हुए हैं और झूठ बोलना तो उनका प्रिय शगल है| कई बार उनके भाषण में झूठ की भारी मात्रा देख विचार उठता है मन में कि भारत कैसे ऐसे झूठे नेता को कल्पना में भी प्रधानमंत्री पद के योग्य नेता माँ सकता है? भारतीय सेना और पूर्व सैनिकों को भड़काने के कुत्सित प्रयास में मशगूल मोदी बागपत जाकर फिर सुविधानुसार भूल गये कि भाजपाई प्रधानमंत्री अटल वाजपेयी ने परवेज मुशर्रफ, जिसने कारगिल रचा और जिस युद्ध में बहुत बड़ी संख्या में भारतीय सैनिक मारे गये, को विशेष मेहमान बनाकर भारत बुलाया था और जबर्दस्त खातिरदारी से नवाजा था| आज का भाषण फिर सिद्ध करता है कि झूठ इस आदमी की राग राग में खून बन कर दौड़ रहा है| देश का दुर्भाग्य होगा अगर ऐसा आदमी संसद में पहुँच गया, ऐसे नेता का प्रधानमंत्री बनना तो भारतकी साख एकदम ही गिरा देगा|

“आप” पर कांग्रेस,  भाजपा और मीडिया के हमले जारी हैं पर देश भर में जगह जगह उसे जनता हाथों हाथ ले रही है| और भीड़ केवल दिल्ली में ही “आप” के समर्थन में नहीं है बल्कि हर जगह उसे अच्छा समर्थन मिल रहा है| लुधियाना की सभा की झलक नीचे दिए चित्र से स्पष्ट है|

AAP Ludhiyana

अरविंद केजरीवाल ने तीस मार्च को चंडीगढ़ में रोड शो किया और जनसमूह के उत्साह की झलक चित्र से ही मिल जाती है|

Arvind@Chandigarhछात्तीसगढ़ के बस्तर में सबसे गरीब उम्मीदवार आदिवासी वर्ग की सोनी सोरी, जो पुलिस द्वारा उत्पीडन किये जाने के कारण देश भर में एक चर्चित नाम है,  एक जनसभा को संबोधित करते हुए

soni sori

MapBJP

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