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मार्च 11, 2011

मंहगाई डायन …

ईंट महंगी पत्थर महंगे हुए
माटी सोना हुई घर महंगे हुए

माहौल लहुलुहान हमने देखा
पत्थर महंगे न सर महंगे हुए

ख़ुदकुशी तरसती देखी बेचारी
मौत सस्ती ज़हर महंगे हुए

गाँव सब के सब बिके हमारे
लोग कहते हैं शहर महंगे हुए

दूरी ज़रूर कम की साधनों ने
जाइए कहाँ सफर महंगे हुए

‘चीनी’ फरेब का बोलबाला है
दस्तकार सस्ते हुनर महंगे हुए

आलम जी हीरे ठोकरों में रहे
तुम हो क्या मगर महंगे हुए

(रफत आलम)

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दिसम्बर 27, 2010

प्याज रोटी का कफन ओढ़ाती मंहगाई

प्याज़ रोटी वाले सपनों के लिए
सौ का नोट बड़ी हकीकत है|

साठ की प्याज़ चालीस का आटा
शाम का चूल्हा जल जायेगा|

सौ का नोट बड़ा ख़वाब है
जिसकी ताबीर के लिए
दिनभर ढोना पड़ता है हाथरिक्शा
या जर्जर काया से दुगना कोई बोझ|

पांच सौ के नोट पर जल कर
रईसजादे की दस हज़ारी स्मैक डोज़
चंद कशों में धुआं हो जाती है
क्या गम?
बेईमान बाप के बैंक खाते में
लाख गुना काली रकम जमा है।

देश के गोश्त की औनी-पौनी कीमत वसूलकर
जयचंद ने जाम खनकाए हैं आज भी
आज भी हजारों जगह क़र्ज़ ने ज़हर खाया है
प्याज़ रोटी का कफ़न ओढ़े
कल के अखबार में महंगाई निकलेगी।

अबला के साथ सामूहिक बलात्कार की बात
चटखारे लेकर पढ़ने वाले
ज़मीरफरोश लोगों को
शर्म से गाड़ती- लहू रुलाती हकीकते
रोज़ की आम बात लगने लगी हैं।

(रफत आलम)

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