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मई 27, 2010

मन के भय

समय कभी ऐसे भी रंग दिखाता है
कि खुशियों से भरे क्षण भी
पूरा सुकून नहीं ला पाते|


मन अन्दर ही अन्दर चौंकता रहता है,
एक भय सा बैठ जाता है मन में
ऐसा लगने लगता है
जाने कब ठंडी बयार के झौंके बहने बंद हो जायेंगे
और निराशाएं, कुंठाएं हमेशा की
सिर उठा सामने खड़ी हो जायेंगी।

ऐसा क्यों होता है?
इसका पता तो चल नहीं पाता।

शायद साहस खोजना होता है गहरे में
अंदर कहीं अपने ही वजूद में
ताकि
कठिन वक्त के दौर में
व्यक्ति सीधा खड़ा हो सके पैरों पर,
दौड़ न भी पाए तो
कम से कम
धीरे धीरे चल तो सके।

…[राकेश]

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