Posts tagged ‘Mahtma Gandhi’

मई 16, 2016

स्वच्छता … ( महात्मा गांधी )

gandhi2“स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन/दिमाग का वास हो सकता है”|

कोई भी ऐसा व्यक्ति जो लापरवाही से इधर उधर थूक कर, कूड़ा करकट फेंककर या अन्य तरीकों से जमीन को गंदा करता है, वह इंसान और प्रकृति के विरुद्ध पाप करता है| दुर्भाग्य से हम सामाजिक रूप से राष्ट्रीय स्तर पर स्वच्छता की महत्ता को नहीं समझते|

हम अपने कुओं, पोखरों और नदियों की शुद्धता का बिल्कुल भी सम्मान नहीं करते और उनके किनारे ही गंदे नहीं करते वरन अपने शरीर की गंदगी से इन प्राकृतिक वरदानों के जल को भी गंदा करते हैं| भारतीयों की इस बेहद शर्मनाक कमी से ही हमारे गाँवों में असम्मानजनक स्थितियां बनी रहती हैं और इसी कारण पवित्र नदियों के पवित्र किनारे गंदे दिखाई देते हैं और इस कारण उत्पन्न अस्वच्छता से विभिन्न बीमारियाँ भारतीयों को अपना शिकार बनाए रखती है|

“देश के अपने भ्रमण के दौरान मुझे सबसे ज्यादा तकलीफ गंदगी को देखकर हुई…इस संबंध में अपने आप से समझौता करना मेरी मजबूरी है।’

‘इस तरह की संकट की स्थिति में तो यात्री परिवहन को बंद कर देना चाहिए लेकिन जिस तरह की गंदगी और स्थिति रेल के तृतीय श्रेणी के डिब्बों में है उसे जारी नहीं रहने दिया जा सकता क्योंकि वह हमारे स्वास्थ्य और नैतिकता को प्रभावित करती है। निश्चित तौर पर तीसरी श्रेणी के यात्री को जीवन की बुनियादी जरूरतें हासिल करने का अधिकार तो है ही। तीसरे दर्जे के यात्री की उपेक्षा कर हम लाखों लोगों को व्यवस्था, स्वच्छता, शालीन जीवन की शिक्षा देने, सादगी और स्वच्छता की आदतें विकसित करने का बेहतरीन मौका गवां रहे हैं।’

‘मैं पवित्र तीर्थ स्थान डाकोर गया था। वहां की पवित्रता की कोई सीमा नहीं है। मैं स्वयं को वैष्णव भक्त मानता हूं, इसलिए मैं डाकोर जी की स्थिति की विशेष रूप से आलोचना कर सकता हूं। उस स्थान पर गंदगी की ऐसी स्थिति है कि स्वच्छ वातावरण में रहने वाला कोई व्यक्ति वहां 24 घंटे तक भी नहीं ठहर सकता। तीर्थ यात्रियों ने वहां के टैंकरों और गलियों को प्रदूषित कर दिया है।’

‘हमें पश्चिम में नगरपालिकाओं द्वारा की जाने वाली सफाई व्यवस्था से सीख लेनी चाहिए…पश्चिमी देशों ने कोरपोरेट स्वच्छता और सफाई विज्ञान किस तरह विकसित किया है उससे हमें काफी कुछ सीखना चाहिए… पीने के पानी के स्रोतों की उपेक्षा जैसे अपराध को रोकना होगा…’

‘लोक सेवक संघ के कार्यकर्ता को गांव की स्वच्छता और सफाई के बारे में जागरूक करना चाहिए और गांव में फैलने वाली बिमारियों को रोकने के लिए सभी जरूरी कदम उठाने चाहिए’

Ganga‘वह (कांग्रेसी कार्यकर्ता) गांव के धर्मगुरु या नेता के रूप में लोगों के सामने न आएं बल्कि अपने हाथ में झाड़ू लेकर आएं। गंदगी, गरीबी निठल्लापन जैसी बुराइयों का सामना करना होगा और उससे झाड़ू कुनैन की गोली और अरंडी के तेल साथ लड़ना होगा…’

‘गांव में रहने वाले प्रत्येक बच्चे, पुरुष या स्त्री की प्राथमिक शिक्षा के लिए, घर-घर में चरखा पहुंचाने के लिए, संगठित रूप से सफाई और स्वच्छता के लिए पंचायत जिम्मेदार होनी चाहिए”

‘बच्चों के लिए स्वच्छता और सफाई के नियमों के ज्ञान के साथ ही उनका पालन करना भी प्रशिक्षण का एक अभिन्न हिस्सा होना चाहिए,… ”

 

 

 

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मार्च 6, 2016

विद्यार्थी और राजनीति : भगत सिंह

bhagat2इस बात का बड़ा भारी शोर सुना जा रहा है कि पढ़ने वाले नौजवान(विद्यार्थी) राजनीतिक या पोलिटिकल कामों में हिस्सा न लें। पंजाब सरकार की राय बिल्कुल ही न्यारी है। विद्यार्थी से कालेज में दाखिल होने से पहले इस आशय की शर्त पर हस्ताक्षर करवाये जाते हैं कि वे पोलिटिकल कामों में हिस्सा नहीं लेंगे। आगे हमारा दुर्भाग्य कि लोगों की ओर से चुना हुआ मनोहर, जो अब शिक्षा-मन्त्री है, स्कूलों-कालेजों के नाम एक सर्कुलर या परिपत्र भेजता है कि कोई पढ़ने या पढ़ानेवाला पालिटिक्स में हिस्सा न ले। कुछ दिन हुए जब लाहौर में स्टूडेंट्स यूनियन या विद्यार्थी सभा की ओर से विद्यार्थी-सप्ताह मनाया जा रहा था। वहाँ भी सर अब्दुल कादर और प्रोफसर ईश्वरचन्द्र नन्दा ने इस बात पर जोर दिया कि विद्यार्थियों को पोलटिक्स में हिस्सा नहीं लेना चाहिए।

पंजाब को राजनीतिक जीवन में सबसे पिछड़ा हुआ(Politically backward) कहा जाता है। इसका क्या कारण है?क्या पंजाब ने बलिदान कम किये हैं? क्या पंजाब ने मुसीबतें कम झेली है? फिर क्या कारण है कि हम इस मैदान में सबसे पीछे है?इसका कारण स्पष्ट है कि हमारे शिक्षा विभाग के अधिकारी लोग बिल्कुल ही बुद्धू हैं। आज पंजाब कौंसिल की कार्रवाई पढ़कर इस बात का अच्छी तरह पता चलता है कि इसका कारण यह है कि हमारी शिक्षा निकम्मी होती है और फिजूल होती है, और विद्यार्थी-युवा-जगत अपने देश की बातों में कोई हिस्सा नहीं लेता। उन्हें इस सम्बन्ध में कोई भी ज्ञान नहीं होता। जब वे पढ़कर निकलते है तब उनमें से कुछ ही आगे पढ़ते हैं, लेकिन वे ऐसी कच्ची-कच्ची बातें करते हैं कि सुनकर स्वयं ही अफसोस कर बैठ जाने के सिवाय कोई चारा नहीं होता। जिन नौजवानों को कल देश की बागडोर हाथ में लेनी है, उन्हें आज अक्ल के अन्धे बनाने की कोशिश की जा रही है। इससे जो परिणाम निकलेगा वह हमें खुद ही समझ लेना चाहिए। यह हम मानते हैं कि विद्यार्थियों का मुख्य काम पढ़ाई करना है, उन्हें अपना पूरा ध्यान उस ओर लगा देना चाहिए लेकिन क्या देश की परिस्थितियों का ज्ञान और उनके सुधार सोचने की योग्यता पैदा करना उस शिक्षा में शामिल नहीं?यदि नहीं तो हम उस शिक्षा को भी निकम्मी समझते हैं, जो सिर्फ क्लर्की करने के लिए ही हासिल की जाये। ऐसी शिक्षा की जरूरत ही क्या है? कुछ ज्यादा चालाक आदमी यह कहते हैं- “काका तुम पोलिटिक्स के अनुसार पढ़ो और सोचो जरूर, लेकिन कोई व्यावहारिक हिस्सा न लो। तुम अधिक योग्य होकर देश के लिए फायदेमन्द साबित होगे।”

बात बड़ी सुन्दर लगती है, लेकिन हम इसे भी रद्द करते हैं,क्योंकि यह भी सिर्फ ऊपरी बात है। इस बात से यह स्पष्ट हो जाता है कि एक दिन विद्यार्थी एक पुस्तक ‘’‘Appeal to the young, ‘Prince Kropotkin’ (‘नौजवानों के नाम अपील’, प्रिंस क्रोपोटकिन) पढ़ रहा था। एक प्रोफेसर साहब कहने लगे, यह कौन-सी पुस्तक है? और यह तो किसी बंगाली का नाम जान पड़ता है! लड़का बोल पड़ा- प्रिंस क्रोपोटकिन का नाम बड़ा प्रसिद्ध है। वे अर्थशास्त्र के विद्वान थे। इस नाम से परिचित होना प्रत्येक प्रोफेसर के लिए बड़ा जरूरी था। प्रोफेसर की ‘योग्यता’ पर लड़का हँस भी पड़ा। और उसने फिर कहा- ये रूसी सज्जन थे। बस! ‘रूसी!’ कहर टूट पड़ा! प्रोफेसर ने कहा कि “तुम बोल्शेविक हो, क्योंकि तुम पोलिटिकल पुस्तकें पढ़ते हो।”

देखिए आप प्रोफेसर की योग्यता! अब उन बेचारे विद्यार्थियों को उनसे क्या सीखना है? ऐसी स्थिति में वे नौजवान क्या सीख सकते है?

दूसरी बात यह है कि व्यावहारिक राजनीति क्या होती है? महात्मा गाँधी, जवाहरलाल नेहरू और सुभाषचन्द्र बोस का स्वागत करना और भाषण सुनना तो हुई व्यावहारिक राजनीति, पर कमीशन या वाइसराय का स्वागत करना क्या हुआ? क्या वो पलिटिक्स का दूसरा पहलू नहीं? सरकारों और देशों के प्रबन्ध से सम्बन्धित कोई भी बात पोलिटिक्स के मैदान में ही गिनी जायेगी,तो फिर यह भी पोलिटिक्स हुई कि नहीं? कहा जायेगा कि इससे सरकार खुश होती है और दूसरी से नाराज? फिर सवाल तो सरकार की खुशी या नाराजगी का हुआ। क्या विद्यार्थियों को जन्मते ही खुशामद का पाठ पढ़ाया जाना चाहिए? हम तो समझते हैं कि जब तक हिन्दुस्तान में विदेशी डाकू शासन कर रहे हैं तब तक वफादारी करनेवाले वफादार नहीं, बल्कि गद्दार हैं, इन्सान नहीं, पशु हैं, पेट के गुलाम हैं। तो हम किस तरह कहें कि विद्यार्थी वफादारी का पाठ पढ़ें।

सभी मानते हैं कि हिन्दुस्तान को इस समय ऐसे देश-सेवकों की जरूरत हैं, जो तन-मन-धन देश पर अर्पित कर दें और पागलों की तरह सारी उम्र देश की आजादी के लिए न्योछावर कर दें। लेकिन क्या बुड्ढों में ऐसे आदमी मिल सकेंगे? क्या परिवार और दुनियादारी के झंझटों में फँसे सयाने लोगों में से ऐसे लोग निकल सकेंगे? यह तो वही नौजवान निकल सकते हैं जो किन्हीं जंजालों में न फँसे हों और जंजालों में पड़ने से पहले विद्यार्थी या नौजवान तभी सोच सकते हैं यदि उन्होंने कुछ व्यावहारिक ज्ञान भी हासिल किया हो। सिर्फ गणित और ज्योग्राफी का ही परीक्षा के पर्चों के लिए घोंटा न लगाया हो।

क्या इंग्लैण्ड के सभी विद्यार्थियों का कालेज छोड़कर जर्मनी के खिलाफ लड़ने के लिए निकल पड़ना पोलिटिक्स नहीं थी? तब हमारे उपदेशक कहाँ थे जो उनसे कहते- जाओ, जाकर शिक्षा हासिल करो। आज नेशनल कालेज, अहमदाबाद के जो लड़के सत्याग्रह के बारदोली वालों की सहायता कर रहे हैं, क्या वे ऐसे ही मूर्ख रह जायेंगे? देखते हैं उनकी तुलना में पंजाब का विश्वविद्यालय कितने योग्य आदमी पैदा करता है? सभी देशों को आजाद करवाने वाले वहाँ के विद्यार्थी और नौजवान ही हुआ करते हैं। क्या हिन्दुस्तान के नौजवान अलग-अलग रहकर अपना और अपने देश का अस्तित्व बचा पायेंगे? नवजवानों 1919 में विद्यार्थियों पर किये गए अत्याचार भूल नहीं सकते। वे यह भी समझते हैं कि उन्हें क्रान्ति की जरूरत है। वे पढ़ें। जरूर पढ़े! साथ ही पालिटिक्स का भी ज्ञान हासिल करें और जब जरूरत हो तो मैदान में कूद पड़ें और अपने जीवन को इसी काम में लगा दें। अपने प्राणों को इसी में उत्सर्ग कर दें। वरना बचने का कोई उपाय नजर नहीं आता।

[भगत सिंह]

किरती, 1928

नवम्बर 24, 2014

महात्मा गांधी और वसुधैव कुटुम्बकम : इटेलियन स्टाइल

धार्मिक प्रतीकों से अलग हटें तो पूरी दुनिया में जिस भारतीय का नाम सबसे ज्यादा जाना जाता है और जिस एक भारतीय को पूरी दुनिया सम्मान देती है, और अपनी नै पीढ़ी को जिसके बारे मने लगातार जाग्रत बनाए रखती है उस शख्सियत का नाम गांधी है|

इस दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य को, कि भारत में ऐसे वर्ग भी हैं जो गांधी से घृणा तक करते रहे हैं,  नजरअंदाज करें तो हर उस भारतीय के लिए जिसे गांधी में थोड़ी सी भी दिलचस्पी है, इटेलियन विज्ञापन एक सुखद एहसास लेकर आता है|

अक्टूबर 2, 2010

गाँधी : क्या खूब कारीगरी है महात्मा

ओ रे महात्मा !
एक सदी बीत गयी तुझे गाली खाते खाते
कितने सारे लोग
गाली देते हैं तुझे
जब वे बहस करते हैं
अपने कमरों में
पान की दुकानों पर
गलियों में कूचों में
होटलों में
विश्वविधालयों में
यहाँ वहाँ
इधर उधर
इस जगह उस जगह
हर जगह तुझे
गालियों से विभूषित किया जाता है।

अपनी कमजोरियों को नज़रअंदाज़ करते हुये
तेरे आलोचक कोसते हैं तुझे –
अरे बूढ़े!
तू ही तो था
जिसके कारण
भारत का बँटवारा हुआ
हम फसल काट रहे हैं
उन समस्यायों की
जिनके बीज तूने बोये थे।

लोगों को विश्वास नहीं है
अपनी साधारण समझ पर ही
परन्तु वे चुनौती देते हैं
तेरी सामाजिक और राजनीतिक समझ को
वे कहते हैं –
तू था ही ऐसा लुजं-पुंज आदमी
तभी तो झट से असहयोग आंदोलन वापिस ले लिया
अरे बाइस पुलिसिये ही तो जलाये थे
भीड़ ने,
अंग्रेजों ने क्या कम
जुल्म ढ़ाये थे
आम जनता पर?
पर नहीं तुझे भारत के लोगों के
दुख दर्द से क्या मतलब था,
तुझे तो अहिंसा के वायरस ने
बीमार किया हुआ था।

लोग कुछ नहीं करते दूसरों के लिये
पर वे तुझ पर आरोप लगाते हैं –
तू पूरी ज़िंदगी
सिर्फ और सिर्फ अपने लिये जिया
तू जिया बड़ा नाम कमाने के लिये।

लोग जो बारह से पचास तक
की आयु वाली किसी भी नारी का
अपनी वासना भरी दृष्टि से
चीर-हरण करने में हर समय
व्यस्त रहते हैं
वे ही तेरे ब्रहमचर्य के
प्रयोगों का
मज़ाक उड़ाते हैं
वे खिल्ली उड़ाते हैं तेरी-
क्यों तुझे बुढ़ापे में
कम उम्र की युवतियों के
कँधों का सहारा लेने की
आदत लगी?

हिन्दू चिल्लाते हैं –
तेरे ही कारण ये मुसलमान
इतना इतराते रहे हैं
मुसलमान जो
मोहम्मद गोरी, महमूद गजनवी, खिलजी
तैमूर, बाबर, औरंगज़ेब जैसे
दुर्दांत और क्रूर आक्रमणकारियों के
वंशज हैं
उन्हे तूने हिन्दुओं के
बराबर का मान लिया!
तू भूल गया
कैसे सदियों से हिन्दुओं को
सताया गया है
उनके सब घृणित कामों को
भूल कर तूने उन्हे
प्रेम दिया
ऐसी आततायी कौम के लोगों के
हितों के लिये
तूने आमरण अनशन किये!
जिन मुसलमानों ने भारत की
पीठ में छुरा घोंप दिया
और पाकिस्तान बना दिया
उन्ही के लिये
पचपन करोड़ की राशी देने के लिये
तू फिर से
खाना-पीना छोड़कर
खटिया पर लेट गया
धिक्कार है
तुझ पर ओ बूढ़े,
कितने घृणित कार्य थे तेरे
कितनी घटिया सोच थी तेरी
तू अवश्य ही नर्क में गया होगा
तू हड्डियों का ढ़ाँचा मात्र था
एक कमजोर आदमी
तभी तू अहिंसा के झूठे
परदे के पीछे छिपा रहा उम्र भर
गोडसे ने कितना अच्छा काम किया
तुझे मार कर
अन्यथा तू तो आजादी के बाद
देश का बेड़ा ही गर्क कर देता।
उसने एक पवित्र काम किया!

बहुत सारे हिन्दू हल्ला मचाते हैं –

नीची जातियों के जो लोग ऊँची जातियों के लोगों की
सेवा करने के लिये जन्म लेते हैं
उन्हे तूने हरिजन -ईश्वर की संतान कह दिया!
अब मज़ा देख
वही लोग अब तूझे
कोसते हैं शैतान कहकर
तू ऐसे ही व्यवहार के काबिल था।

मुसलमान भी तुझे नफरत
भरी दृष्टि से ही देखते हैं
छाती ठोककर
वे तुझे कोसते हैं और दावे करते हैं-
तू हिन्दु जन्मा था
और तूने केवल हिन्दुओं के ही हितों
का ख्याल किया उम्र भर
और तूने मुसलमानों के लिये कुछ नहीं किया।

लोग कुछ भी नहीं पढ़ते तेरे बारे में
वे इतिहास, राजनीति, मानव विज्ञान, समाज विज्ञान
कुछ भी नहीं समझते
पर वे क्षण भर भी नहीं लगाते
तेरे द्वारा किये गये कामों को नकारने में।

वे कोसते हैं
तुझे और तेरे अहिंसा के सिद्धांतों को-
अंग्रेजों ने
भारत और भारतीयों का
जमकर शोषण किया
तब भी तूने जोर दिया कि
उनके साथ अच्छा सलूक किया जाये
कितनी तुच्छ मानसिकता थी तेरी

…………….

पर बापू
एक मजे की बात यह है कि
यह सब कहते हुये
लोगों की
जुबान लड़खड़ाती है
नफरत की ज्वाला में
जलते हुये
वे कह तो जाते हैं
पर खुद उन्हे भी पता होता है कि
वे सफेद झूठ बोल रहे हैं

और सबसे बड़े आनंद की बात तो यह है
महात्मा कि
पिछले साठ सालों में
हर दल की विचारधारा और राजनीति ने
भरकस कोशिश की है कि
जनमानस तुझे भूल जाये
तेरा अस्तित्व हर राजनीतिज्ञ को
कालिख से पुता हुआ जो दिखाने लगता है
नेताओं ने भरपूर प्रयास किये हैं तुझे
अंधेरे बंद कमरों में कैद रखने के
पर पता नहीं कैसे
तुम किसी न किसी कोने से
फिर उजाला फैलाते
सामने आ ही जाते हो।

ये तुम्हारी जादूगरी है
बड़े कमाल की!

बापू, उनके जीवन और उनकी विचारधारा में रुचि रखने वाले लोग बापू को समर्पित एक वेबसाइट देख सकते हैं

…[राकेश]

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