Posts tagged ‘Mahila’

मार्च 9, 2013

अद्भुत औरत

Maya Angelou की प्रसिद्द कविता Phenomenal Woman का हिन्दी अनुवाद

औरतें उत्सुक रहती हैं  

जानने को कि कहाँ छिपे हैं

मेरे चुम्बकीय व्यक्तित्व के रहस्य?

 

खूबसूरती की उनकी परिभाषा की समझ से

मैं किसी भी हिसाब से खूबसूरत नहीं हूँ

न ही मैं फैशन माडल्स जैसे आकार प्रकार वाली हूँ

लेकिन जब में उन्हें अपनी गोपनीयता बताना शुरू करती हूँ

तो वे सोचती हैं

मैं झूठ बोल रही हूँ |

 

मैं कहती हूँ

रहस्य मेरी बाहों के घेरे में है

मेरे नितंबों के फैलाव में है

लंबे-लंबे डग भरती मेरी चाल में है

मेरे होठों के घुमावों और कटावों में है|

  

मैं एक औरत हूँ

असाधारण रूप से

अद्भुत औरत

हाँ वह हूँ मैं |

 

मैं प्रवेश करती हूँ किसी कक्ष में

जैसी मैं हूँ

अपने सारे वजूद को साथ लिए

और पुरुष,

वे सब खड़े हो जाते हैं

या अपने घुटनों के बल बैठ जाते हैं

वे मेरे इर्द गिर्द

ऐसे एकत्रित हो जाते हैं

जैसे छत्ते के करीब मधुमक्खियाँ

मैं कहती हूँ

रहस्य छिपा है

मेरी आँखों में बसी आग में

मेरे दांतों की चमक में

मेरी कमर की लचक में

मेरे पैरों के जोश में|

 

मैं एक औरत हूँ

असाधारण रूप से

अद्भुत औरत

हाँ वह हूँ मैं |

 

पुरुष खुद अचरज करते हैं

कि वे क्या देखते हैं मुझमे

वे कोशिश तो बहुत करते हैं

पर कभी छू नहीं पाते

मेरे अंदुरनी रहस्य को

जब मैं उन्हें दिखाने की कोशिश करती हूँ

वे कहते हैं –

वे देख नहीं पा रहे अभी भी|

मैं कहती हूँ,

रहस्य तो छिपा है

मेरी रीढ़ की चाप में

मेरी मुस्कान के सूरज में

मेरे वक्षों के उठान में

मेरे मनोहरी सलीके में|

 

मैं एक औरत हूँ

असाधारण रूप से

अद्भुत औरत

हाँ वह हूँ मैं |

 

अब तुम्हे समझ में आ गया होगा

क्यों मेरा सिर झुका हुआ नहीं रहता है

मैं शोर नहीं मचाती,

कूद-फांद नहीं मचाती

अपने को जाहिर करने के लिए

मुझे प्रयास नहीं करने पड़ते

पर जब तुम मुझे देखो

पास से जाते हुए

तुम्हारे अंदर मुझे लेकर गर्व का भाव जगना चाहिए|

 

मैं कहती हूँ,

मेरे चुम्बक का रहस्य  

छिपा है –

मेरे जूते की हील की खट-खट में

मेरे बालों की घुंघराली लटों में

मेरे हाथों की हथेलियों में

मेरी देखरेख की जरुरत में,

‘क्योंकि’ मैं एक औरत हूँ

असाधारण रूप से

अद्भुत औरत,

हाँ वह हूँ मैं |

[Maya Angelou]

जुलाई 18, 2011

दहशत

आजकल मै डरा हुआ हूँ
यह एक रचनाकार का डर है
शब्द ही नहीं मिलते मुझे कि
लिखूँ
विज्ञापन में नंगी देह दिखाती युवती की
विशेषतायें क्या हैं।
उसकी वाइटल स्टेटिस्टिक्स मुझे किस तरह
लुभाती है
कि मैं दो बच्चों का बाप,
और बच्चे भी बड़े हो गये हैं
किस तरह महसूसता हूँ ऐसे पलों को।

सुगंधित साबुन से नहाती युवती की
महकती देह
सुडौल गोल और चिकनी जाँघों को
सहलाना चाहता हूँ,
स्क्रीन पर ही सही
तो क्या यह पाप है?

मुझे औरत की छातियाँ और गोलाइयाँ
खींचती हैं अपनी ओर
उनके आधे-अधनंगे ब्लॉउजों में
जहाँतक झाँक सकता हूँ
डाल देता हूँ आँखें
दिखते सौन्दर्य को न देखना
उसका अपमान है।

सौन्दर्य भी तो वस्तु नहीं
आँखों में होता है
न देखूँ तो
आँखों का होना बेकार है।

मगर पूछना चाहता हूँ कि
इन ब्लॉउजों की डिजाइन
किसने की है?
जिसने की है
उसका मकसद क्या है?
और पहनने वालियाँ क्या
पाना चाहती हैं?

एक कॉम्प्लीमेंट कि
यू आर ब्यूटीफुल…
लुकिंग गॉर्जियस…
स्टनिंग…?
यकीन मानिये
बहुत सी महिलायें
इन्ही आधे-अधूरे वाक्यों से
हो जाती हैं
लहालोट।

फिर जो कुछ होता है
उसी को लिखना चाहता हूँ मैं
मगर मुझे शब्द नहीं मिलते है
क्योंकि,
बाद की स्थितियों को
गंदगी उपजाने वाला यह लिथड़ा समाज
अश्लील कहता है।

घुटनों को मोड़कर
एड़ियों पर नितम्बों को टिकाए
बैठी जवान औरतों को
घूरने वाले
लपलपाती जीभ निकाले मर्दों को
जब देखता हूँ,
उन्ही में से मैं भी हूँ,
तो डर जाता हूँ
कि
एक दिन जब सारी गोलाइयाँ
लटककर झूल जायेंगी
हड्डियों से प्यार करता माँस
चिचुककर लटक जायेगा
तब वह कितनी खूबसूरत लगेगी
तब कितना खूबसूरत दिखूँगा मैं?

यह एक ऐसी दहशत है
जो जवान और सुंदर दिखती औरत को
मेरी नज़रों में एक पल में
अचानक बियावान और बदसूरत
बना देती है।

औरत, समाज और अपने बारे में
जो मैं कहना चाहता हूँ
लिखना चाहता हूँ
उसके लिये जितने शब्दों का प्रयोग करुँगा
वे सभी शब्द आज की भाषा में
असंसदीय हैं।

मैं डरा हुआ हूँ
शब्दों के प्रयोग से
कि कहीं माफी न माँगनी पड़े
आवारा ताकतों से
मैं गालियाँ देना चाहता हूँ सबको
मगर मुझे शब्द नहीं मिलते।

{कृष्ण बिहारी}

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