Posts tagged ‘Madhur’

फ़रवरी 11, 2013

उससे अधिक कुंआरे हो तुम

जितनी बाल्मिकी की कविता

जितनी उद्गम पर हो सरिता

जितनी किरन चांदनी

उससे अधिक कुंआरे हो तुम |

जितनी पावन यहाँ प्रकृति है

जितनी सुन्दर धवल कृति है

जितनी घड़ी सावनी कोई

उससे अधिक कुंआरे हो तुम |

जितनी सिहरन सीधी सीधी

जितनी मनहर कोई वादी

जितनी मधुर रागिनी कोई

उससे अधिक कुंआरे हो तुम |

जितनी क्षमाशील है धरती

जितनी शमा हवा से डरती

जितनी नरम रोशनी कोई

उससे अधिक कुंआरे हो तुम |

{कृष्ण बिहारी}

फ़रवरी 14, 2012

प्रीत

प्रीत जन्म है प्रीत मरण है प्रीत धरा है  प्रीत गगन है

प्रीत छाँव है प्रीत तपन है प्रीत मधुर वह आलिंगन है

जिसको सबने किया नमन है!

प्रीत मधुरिमा प्रीत अरुणिमा प्रीत अमावस प्रीत पूर्णिमा

प्रीत ह्रदय में सूर्य-चन्द्र सी उदय – अस्त में यही लालिमा

प्रीत-रीत से अलग खड़ी- सी हर इक मन की ही दुल्हन है!

प्रीत रुदन है प्रीत गीत है प्रीत हार है प्रीत जीत है

कहीं मुखर है कहीं मौन है प्राणों का आधार प्रीत है

देह और मन के जुड़ने से बनी धरा पर यह वंदन है!

जड़-चेतन में यही चेतना प्रीत खुशी है प्रीत वंदना

प्रीत आदि है प्रीत अंत है कहीं ऊपरी कहीं साधना

सघन वृक्ष की तरह जगत में आवारों का प्रीत भवन है!

प्रीत गंध है प्रीत डगर है प्रीत गाँव है प्रीत नगर है

यह गोरी है यह चूनर है कहीं सिंधु है कहीं लहर है

प्रीत कहीं पर धुल हो गयी कहीं माथे पर यह चंदन है!

कालिदास में यह शकुंतला मीरा में यह कहीं किशन है

ताजमहल की यही नायिका शाहजहां का एक सपन है

माने कोई बात अगर तो प्रीत ह्रदय का ही दरपन है!

प्रीत कहीं सरनाम हुयी है प्रीत कहीं बदनाम हुयी है

प्रीत कहीं गुमनाम हुयी है प्रीत कहीं नीलाम हुयी है

लेकिन इसके बावजूद भी प्रीत जगत का अंतर्मन है!

जाने कितनी भरी पोथियाँ बात प्रीत की करते-करते

जाने कितने युग बीते हैं बात प्रीत की करते-करते

मेरे तो मौलिक चिंतन में सरल-कठिन-सा यह दर्शन है!

प्रीत राधिका प्रीत भवानी घनानन्द की आम- कहानी

प्रीत शूल है प्रीत सुमन है प्रीत चैन है प्रीत चुभन है

प्रीत तपस्या प्रीत यातना यह जीवन की सरस साधना

पिघल गए पाषण जिसे सुन आहत मन का वह क्रंदन है!

{कृष्ण बिहारी}

जुलाई 31, 2011

अंत का प्रारंभ (रघुवीर सहाय)

सुप्रसिद्ध कवि स्व. रघुवीर सहाय ने मनुष्य के जीवन की गति और दिशा और जीवन-दर्शन और जीवन के प्रति समझ में आने वाले उतार-चढ़ाव पर बहुत ही अच्छी कविता लिखी थी।

मधुर यौवन का मधुर अभिशाप मुझको मिल चुका था
फूल मुरझाया छिपा कांटा निकलकर चुभ चुका था
पुण्य की पहचान लेने, तोड़ बंधन वासना के
जब तुम्हारी शरण आ, सार्थक हुआ था जन्म मेरा
क्या समझकर कौन जाने, किया तुमने त्याग मेरा
अधम कहकर क्यों दिया इतना निठुर उपलंभ यह
अंत का प्रारंभ है यह!

जगत मुझको समझ बैठा था अडिग धर्मात्मा क्यों,
पाप यदि मैंने किये थे तो न मुझको ज्ञान था क्यों
आज चिंता ने प्रकृति के मुक्त्त पंखों को पकड़कर
नीड़ में मेरी उमंगों के किया अपना बसेरा
हो गया गृहहीन सहज प्रफुल्ल यौवन प्राण मेरा
खो गया वह हास्य अब अवशेष केवल दंभ है यह
अंत का प्रारंभ है यह!

है बरसता अनवरत बाहर विदूषित व्यंग्य जग का
और भीतर से उपेक्षा का तुम्हारा भाव झलका
अनगिनत हैं आपदायें कहाँ जाऊँ मैं अकेला
इस विमल मन को लिये जीवन हुआ है भार मेरा
बुझ गये सब दीप गृह के, काल रात्रि गहन बनी है
दीख पड़ता मृत्यु का केवल प्रकाश स्तंभ है यह
अंत का प्रारंभ है यह!

(रघुवीर सहाय)

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