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मई 8, 2013

मौत की दौड़

मौत ने एक दौड़ आयोजित की हुयी है

और हम सब अभिशप्त हैं उसमें हिस्सा लेने के लिए,

जीवन में भले ही कुछ भी निश्चित न हो

पर अनिश्चितता तो मौत की तरफ दोस्ती का हाथ भी नहीं बढ़ा सकती|

चाहे तो हम दौड़ लें, दौड़ते रहें

या आराम से बैठ जाएँ, लेट जाएँ, सो जाएँ

कितनी भी, किसी भी तरह की उठा-पठक कर लें

कैसी भी साजिश रच लें,

कैसे भी इंतजाम क्यों न कर लें

पर किसी भी हालत में,

हरेक अवस्था में,

जिंदगी के भागते, लडखडाते और सुस्ताते क़दमों को रोकने

 मौत, सधी चालें ले सामने आ ही खड़ी होगी-

ये देगी  शह और

वो  होगी मात!

…[राकेश]

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अप्रैल 12, 2013

दिल का हाल सुनाओ तो सही

सूरज डूबेगा तो रात भी हो जायेगी ,

बाजी लगेगी तो मात भी हो जायेगी ,

धीरज खाना महज भूल है बड़ी

प्यार होगा तो मुलाक़ात भी हो जायेगी|

मुझे ज़िंदगी का फटा कफ़न सी लेने दो,

न बहलाओ उन्ही की आस पे जी लेने दो,

पीऊँगा न कल एक भी घूँट तुम्हारी ही कसम,

मगर आज तो जी भर के पी लेने दो|

आकर पास ज़रा, आँख मिलाओ तो सही,

दिल की बात को ओठों पे लाओं तो सही,

मालूम नहीं है पर मेरे दिल का हाल,

न हो, अपने दिल का हाल सुनाओ तो सही|

– ‘जगत्प्रसाद ‘सारस्वत

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