Posts tagged ‘Lover’

नवम्बर 11, 2013

यूँ ही हँसती रहो मुँह छिपाकर

dewflowerतुमने कभी देखा

ओस की बूंद को फूल पे?

एक छोटी सी बूँद …

बहुत नाज़ुक लेकिन कितनी जीवंत!

सारे रंग अपने में समेटे,

फूल के आगोश में लिपटी

‘बूँद’

रात भर सपना देखती है…

सुबह का,

सुबह के ताजगी भरे उजाले में

अपने प्रेमी फूल को देखने का…

उसे सहलाने का

बहुत क्षणिक  होता है ये मिलन

रात के लम्बे इंतज़ार के सामने

पर कितना सघन!

दो पल का स्पर्श…

पोर पोर सहलाना

फूल को दे जाता है

सबब

पूरे दिन महकने का…

खिले रहने का…

मुस्कराने का

और खुशिया बिखेरने का

गुदगुदाती है

उसे बूँद की याद दिन भर

और उसी के सहारे

सह लेता है फूल

दिन भर की तपन

मुस्कुराते…

manisha-001खिलखिलाते…

महकते…

महकाते…

मैं भी मुस्कुराता हूँ …

बेवज़ह भी…

कभी जब याद आता है

तुम्हारा मुंह छुपा के मुस्कुराना…

मेरे दिन रात

महक उठते हैं…

काश

तुझ फूल को हँसने

खिलने और महकने के लिए

मैं ही ओस की बूँद रूपी

बहाना बन जाऊं…

(रजनीश)

नवम्बर 10, 2013

प्रिय, अब तुम जाओ

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अब तुम जाओ|

बोलना तुम्हे होता नहीं है

क्या वास्तव में

मुझसे साझा करने को तुम्हारे पास कुछ नहीं होता?

मुझे तो तुम्हारे झगड़ने से

भी कोई परेशानी नहीं

पर तुम गूंगी गुडिया

के अपने अवतारी रूप से बाहर आकर

हमारी मुलाकातों को

सजीव और दो पक्षीय तो बनाओ

अभी तो होता यह है

कि मैं ही रेडियो की तरह

बोलता हूँ

हर पहल मुझे ही करनी होती है

इससे भी कोई शिकवा नहीं

अगर खामोशी तुम्हारा आनंद हो

पर खलता है

जब तुम अपने अंदर शिकायत

भरे रखते हो

पर उसे भी मुझसे न कह कर

उनकी संख्या

और तींव्रता बढाए चले जाते हो|

अरे, कभी-कभी मुझे

ऐसा लगता है कि तुमसे अच्छी तो तुम्हारी याद है

जो जब मैं चाहूँ

मेरे पास आ बैठती है

और मेरी हर बात में

पूरी गर्मजोशी से मेरा साथ देती है|

तुम्हे पता है तुम्हारे आने से पहले

मैं तुम्हारी याद के साथ ही बैठा था,

कितने रचनात्मक क्षण थे वे!

तुम्हारी याद के सामने, उसके साथ

मैंने दो पंक्तियाँ भी रचीं

तुम सुनोगे?

” मैंने जब झुक कर कहा,

बस शुक्रिया!

जिंदगी पशीमां हो गई|”

अब तुम जाओ!

तुम्हारे जाने के बाद

मैं तुम्हारी याद के साथ

कुछ पल ऐसे तो बिता लूंगा

जहां मुझे लगेगा

तुम पूरी की पूरी

बिना किसी लागलपेट के

मेरे साथ हो|

Yugalsign1

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