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अप्रैल 30, 2014

शहीद कैप्टन विक्रम बत्रा की माँ का पत्र नरेंद्र मोदी के नाम

CaptBatraMom69 वर्षीय कमल कांत बत्रा, हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर से लोकसभा का चुनाव “आम आदमी पार्टी” के टिकट पर लड़ रही हैं| श्रीमती बत्रा, ने पाकिस्तान द्वारा भारत पर जबरदस्ती थोपे गये कारगिल युद्ध में अपने 24 वर्षीय बेटे कैप्टन विक्रम बत्रा को खोया था| शहीद होने से पहले NDTV को दिए साक्षात्कार में विक्रम बत्रा द्वारा कहा गया जुमला ” ये दिल मांगे मोर” उस समय भारतीय सेना का उत्साह बढाने के लिए चलाये जा रहे कार्यक्रम का नारा बनकर बहुत प्रसिद्द हो गया था|

श्रीमती बत्रा ने भाजपा के पीएम उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के नाम खुला पत्र लिखा है|

प्रिय श्री मोदी जी,

आपने अपने चुनाव प्रचार में मेरे शेर बेटे का नाम और उसका नारा – ये दिल मांगे मोर, इस्तेमाल किया है| लोग मेरे बेटे को कारगिल का शेर शाह कहते हैं| जसी समय वह कारगिल युद्ध में शहीद हुआ तब उसकी आयु मात्र 24 साल की थी|

अब आप विक्रम का नाम और उसका नारा इस्तेमाल कर रहे हैं| मुझे आपसे पूछना है कि 1999 से अब तक 15 सालों में न तो आपने न ही भाजपा को न मेरे बेटे की याद आयी न उसके नारे की| अब चुनाव में आपको अचानक ही यह सब याद आ गया और चुनावी फायदे के लिए आपने एक वीर सैनिक की शहादत का सहारा लेना शुरू कर दिया|  यह भ्रष्ट राजनीति का नमूना है|

 

श्री मोदी जी, अगर आप सेना और उसके शहीदों का सम्मान करते हैं तो शहीदों के परिवार आपके लिए ईश्वर के समान होते| अगर मैं आपकी जगह होती तो शहीद के परिवार के नुमाइंदे के खिलाफ खड़े भाजपा उम्मीदवार को चुनाव मैदान से हटने के लिए कहती|

अगर आपके दिल में कैप्टन बत्रा के परिवार के लिए सम्मान है तो आपको याद रहता कि मैं विक्रम की माँ हूँ| मेरे बेटे की प्रशंसा करते हुए “ये दिल मांगे मोर” कहते हुए आपको स्मृति में रहता कि शहीद के परिवार को सम्मान देने के लिए क्या किया जा सकता है|

ऐसा क्यों है कि भाजपा ने कभी भी शहीदों के परिवारजनों को टिकट नहीं दिये?

मेरे लिए यह व्यक्तिगत लड़ाई नहीं है, यह किसी एक व्यक्ति के खिलाफ लड़ाई नहीं है| यह भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई है| लोगों को भष्टाचार से निजात चाहिए|

सारा भारत विक्रम बत्रा को जानता है|

कुछ गाँवों में आम आदमी पार्टी के स्वयसेवकों ने लगों से मेरे लिए कहा,” ये शहीद विक्रम बत्रा की माँ हैं”| इसमें क्या गलत है? विक्रम ने देश के लिए अपनी जान कुर्बान की| उसे गर्व होगा जानकार कि मैं भी उसकी भांति देश सेवा करने उतरी हूँ| क्या मेरे बेटे का नाम मुझसे अलग किया जा सकता है? मेरा नाम मेरे बेटे के साथ आएगा और मेरे बेटे का नाम मेरे साथ जुड़ा रहेगा| कोई इस सत्य को झुठला नहीं सकता|

इस लोकसभा के चुनाव प्रचार में आपका नाम हर जगह है|

आपको ज्ञात होना चाहिए कि केवल अरविंद केजरीवाल की पार्टी ने हमें इस तरह सम्मान देने के बारे में सोचा| उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मैं चुनाव लड़कर लोगों की सहायता करना चाहूंगी?

मैं केवल एक स्त्री ही नहीं बल्कि भारतीय नागरिक भी हूँ| मेरा अधिकार है राजनीति में प्रवेश करने का| हर भारतीय नागरिक का अधिकार है यह|

जब आम आदमी पार्टी ने मुझसे हिमाचल प्रदेश से चुनाव लड़ने का अग्राह किया मैं इंकार नहीं कर पाई| उनके आग्रह में सच्चाई की ताकत थी|

और दलों ने हमें बुरी तरह निराश किया है|

भवदीय,

कमल कांत बत्रा

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अप्रैल 28, 2014

“आम आदमी पार्टी” को कितनी सीटें? : शरद शर्मा (NDTV)

AKbanaras1कितनी सीटें आ रही हैं ‘आप’ की ?

कितनी सीटें आ रही हैं ‘आप’ की?
पिछले कुछ महीनों से लोग अक्सर मुझसे ये सवाल करते हैं और ये बहुत स्वाभाविक भी है क्योंकि मै आम आदमी पार्टी कवर करता हूँ इसलिये लोग जानना चाहते हैं कि मेरा क्या आंकलन है इस पार्टी को लेकर|

लेकिन बात इतनी सीधी नहीं होती लोग पहले मुझसे पूछते हैं और फिर बिन मांगे अपनी राय भी दे देते हैं…और राय ज़्यादातर ये होती है कि कुछ ना होना केज़रीवाल और उसकी पार्टी का, अब कहानी खत्म है|

मैं मन ही मन सोचता हूँ कि ये लोग पूछने आये थे,
बताने आये थे,
या फिर बहस करने आये थे?

असल में ये लोग केजरीवाल और आम आदमी पार्टी पर अपनी नाराज़गी ज़ाहिर करने आते हैं जिसके अलग अलग काऱण हैं

लेकिन ज़रा सा अपने दिमाग पर ज़ोर डालें तो आप देखेंगे कि आजकल शादी में जाओ तो राजनीति डिस्कस हो रही है, बस में, ट्रेन में, दफ्तर में, गली मोहल्ले में राजनीती पर ही चर्चा चल रही है|
क्या पहले ऐसा होता था?
क्या लोग राजनीती जैसे ऊबाऊ विषय पर अपने दिल की बात बोला करते थे?

एक दौर आया था जब न्यूज़ चैनल्स को देखनेवाले लोगों की संख्या घट रही थी और लोग न्यूज़ चैनल देखने की कोई ख़ास ज़हमत नहीं उठाते थे|
लेकिन आज से तीन साल पहले दिल्ली के जंतर मंतर से जो आंदोलन शुरू हुआ उसने आम लोगों को वापस राजनीती के बारे में बात करने के लिए विवश किया, आम लोग बहुत समय के बाद घर से बाहर निकलकर अपनी ही चुनी हुई सरकार के खिलाफ खुलकर नारे लगाते और टीवी पर बोलते दिखे|

और वहीँ से सरकार के खिलाफ माहौल बनना शुरू हुआ जो आज इस मोड़ पर आ गया है कि लोगों में इस बात पर शर्त लग रही है कि कांग्रेस की सीटों का आंकड़ा तीन डिजिट में जायेगा या दो में ही रह जाएगा|

वहीँ से लोगों में एक बार फिर न्यूज़ चैनल देखने वाले लोगों की तादाद बढ़ी
वहीँ से बहुत से न्यूज़ चैनल…. न्यूज़ और डिबेट दिखाने को मजबूर हो गए वरना याद कीजिये उससे पहले कुछ चैनल्स क्या दिखाया करते थे?
उसके बाद से आजतक चुनाव में पहले से ज़्यादा मतदान हो रहा है और पोलिंग के नए रिकॉर्ड बन रहे हैं|

हाँ ये जनलोकपाल का आंदोलन था जिसने समाज को कुछ नया सोचने और उम्मीद पालने का जज़्बा दिया|

अण्णा हज़ारे इस आंदोलन का चेहरा रहे, जबकि अरविन्द केजरीवाल, प्रशांत भूषण और किरण बेदी इस आंदोलन का दिमाग|
जो उम्मीद इस आंदोलन से आम जनता को बंधी वो समय के साथ टूटती दिखी
अपनी विचारधारा और काम करने के तरीके को लेकर इस आंदोलन के कर्ता धर्ताओं में मतभेद की खबरें आम थी|
और फिर एक दिन सामजिक आंदोलन पोलिटिकल पार्टी की तरफ बढ़ गया और नतीजा हुआ कि ये टीम दो हिस्सों में बंट गई पोलिटिकल और नॉन पोलिटिकल
और लगा कि सब खत्म क्योंकि जब साथ रहकर कुछ न कर पाये तो अलग होकर क्या करेंगे?

लेकिन धीरे धीरे एक उम्मीद फिर दिखाई दी, ये उम्मीद थी अण्णा के अर्जुन कहे जाने वाले अरविन्द केजरीवाल, जिन्होंने आम आदमी पार्टी बनायी और धीरे धीरे दिल्ली के अंदर आम आदमी के मुद्दे इस क़दर उठाये कि बहुत समय के बाद…कम से कम दिल्ली के आम आदमी को गरीब आदमी को किसी पार्टी से या यूँ कहें कि किसी नेता से कुछ उम्मीद हो गयी और इसी उम्मीद की वजह से आम आदमी पार्टी दिल्ली में 70 में से 28 सीटें जीत गयी, कांग्रेस ने बिन मांगे समर्थन दे दिया और देखते ही देखते अरविन्द केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री बन गए|

आम लोगों से बातचीत के आधार पर मैं कह सकता हूँ कि केजरीवाल के शासनकाल में भ्रष्टाचार कम हुआ, बिजली और पानी के दाम भी ज़रूर घटे थे|

लेकिन केजरीवाल के इस्तीफा देने से उन उम्मीदों को धक्का लगा जो लोगों को अपने इस नए नेता से थी , असल में जिसने वोट दिया था और जिसने वोट नहीं भी दिया था सब के सब महंगाई और भ्रष्टाचार से तंग तो थे ही…. इसलिए सब को केजरीवाल से उम्मीद थी …..ये नेता कुछ करके दिखायेगा!

दिल्ली और देश के जिस हिस्से में मैं गया वहां इस पार्टी या इस नेता के लिए बस एक ही नेगेटिव पॉइन्ट दिखता है, एक ही सवाल है कि सरकार क्यों छोड़ी? क्या लोकसभा चुनाव लड़ने का लालच आ गया था मन में ? या लग रहा था कि जैसे मुख्यमंत्री बन गया वैसे ही प्रधामंत्री बन जाऊँगा?

खैर केजरीवाल ने इसके जवाब अपने हिसाब से दिए भी लेकिन जनता कितना उसको कितना समझ पायी है या समझेगी इस पर साफतौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता क्योंकि कुछ लोग नाराज़गी के चलते कह रहे हैं ‘आप‘ की गलियों में ना रखेंगे कदम आज के बाद और एक तबका ऐसा भी है जो कहता कि दिल दुखा है लेकिन टूटा तो नहीं है उम्मीद का दामन छूटा तो नहीं है

वैसे केजरीवाल के काम करने का तरीका हमेशा चर्चा और विवाद में रहा हो लेकिन उनकी ईमानदार आदमी की छवि पर कोई डेंट नहीं है ये सब मानते हैं और उनकी ईमानदारी पर शक़ होता तो लोग उनके इस्तीफे पर कहते कि अच्छा हुआ राहत मिली एक खाऊ मुख्यमंत्री और उसकी सरकार से, जबकि लोग अभी कह रहे हैं कि सरकार नहीं छोड़नी चाहिए थी। मैं सोचता हूँ कि ईमानदारी तो ठीक है लेकिन उसका जनता क्या करेगी अगर आप उसको अच्छा शासन ना दिखा पाएं

खैर अब बात फिर वहीँ आती है कि आप की कितनी सीटें आ रही हैं? तो जवाब ये है कि इस पार्टी का वोटर साइलेंट रहता है इसलिए पार्टी का जनाधार पता लगाना या फिर आंकलन कर पाना बहुत कठिन है। दिल्ली चुनाव से पहले कौन कह रहा था कि केजरीवाल शीला को हराएंगे और वो भी एकतरफा? या केजरीवाल की पार्टी 28 सीटें जीतेगी और केजरीवाल मुख्यमंत्री बन जाएंगे?

और बात आजकल ये भी हो गयी है कि वोटर आसानी से बताता नहीं है की वो किसको वोट देगा या फिर दे चुका है ? क्योंकि वो अपने इलाके के किसी दूसरी पार्टी के नेता, विधायक, सांसद जो शायद उसका दोस्त, जानने वाला, पडोसी वगैरह भी हो सकता है लेकिन वोट उसको नहीं किसी दूसरी पार्टी को देना चाहता है ऐसे में आपको बताकर वो उसका बुरा नहीं बनना चाहता|

यही नहीं आजकल तो हालत ये हो गए हैं की दिल्ली में एक परिवार के सारे वोट एक पार्टी को चले जाएँ ये पक्का नहीं है…… मेरे एक पत्रकार मित्र जो बीजेपी कवर करते हैं उन्होंने दिल्ली में वोटिंग वाले दिन मुझसे पहले तो दिल्ली की स्थिति पर चर्चा करी और फिर बताया कि हालात जैसे दिख रहे थे वैसे असल हैं नहीं , मैंने पूछा क्या हुआ ….. बोले यार हद हो गयी …. मैं बीजेपी को वोट देकर आया हूँ लेकिन मेरे घर के 4 झाड़ू (आप) को चले गए|

मेरे लिए ये कोई अचम्भा नहीं था क्योंकि मैं दिल्ली विधानसभा चुनाव 2013 में देख चुका था कि जो परिवार सालों से बीजेपी को वोट दे रहे थे उसमे इस बार माँ बाप तो कमल का बटन दबाकर आये थे लेकिन बच्चे झाड़ू चलकर आये थे जिसकी वजह से बीजेपी के हाथ से उसके गढ़ शालीमार बाग़, रोहिणी जैसी सीटें निकल गयी थी

इसलिए कोई सीटों का आंकड़ा दिए बिना मैं मानता हूँ कि ये पार्टी 8 दिसंबर की तरह 16 मई को चौंका दे तो मुझे हैरत नहीं होगी .

Sharad Sharma, Journalist NDTV

अप्रैल 23, 2014

अरविंद केजरीवाल : हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण के शातिराना खेल का हिस्सा है मीडिया

Arvindbenaras15 अप्रैल को आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल बनारस पहुंचे भारत के चुनाव की सबसे बड़ी जंग में भाजपा के प्रधानमंत्री नरेंद मोदी को चुनौती देने के लिए| बनारस पहुँचते ही वे सड़क पर निकल पड़े और पहुँच गये एक ऐसे परिवार के घर जिनका एकमात्र कमाऊ सदस्य दुर्भाग्य से मेनहोल में घुसकर सीवर की सफाई करने के दौरान मृत्यु को प्राप्त हो गया था| शोकग्रस्त परिवार से मिलने के बाद उन्होंने एक संवाद कार्यक्रम में शिरकत की जहां लोगों ने उनसे विभिन्न तरह के सवाल पूछे| 

अगले दिन वे रोहिण्या, जो कि काशी देहात का क्षेत्र है, में पहुँच गये और गाँवों में रैलियां और सभाएं करते रहे और बीच में अपने रास्ते में अपने प्रशंसकों से रुक कर मिलते रहे| एजाज़ अशरफ कपारफोड़वा गाँव में अरविंद केजरीवाल के वाहन पर सवार हो गये और हर्सोस गाँव आने तक जहां एक और रैली थी, २०-२५ मिनट अरविंद केजरीवाल से सवाल पूछते रहे|

जब आप कुछ दिन पहले वाराणसी आए थे तो आप पर अंडे और स्याही फेंके गये थे| तब से आप पर कई बार हमले किये ज चुके हैं| आप पर इन हमलों का क्या असर पड़ा है? 

ये हमले वाराणसी में शुरू नहीं हुए|  कब शुरू हुए ये हमले? ये शुरू हुए जब मैंने मार्च की शुरुआत में गुजरात की यात्रा की| क्या यह केवल एक संयोग है या इससे अधिक कुछ है? मैं वास्तव में नहीं जानता| हम बहुत बड़े लोगों का विरोध कर रहे हैं और जाहिर सी बात है कि वे लोग चुप तो बैठेंगे नहीं| वे हम पर हमले करेंगे|

 इन हमलों ने व्यक्तिगत रूप से आप पर क्या प्रभाव डाले हैं|

ऐसे  हमलों से मुझे आश्चर्य नहीं हुआ था क्योंकि ये तो अपेक्षित थे| मुझे ऐसा भी लगता है कि चुनाव होने तक ये हमले हल्के रहेंगे क्योंकि उन्हें पता है कि मुझ पर घातक हमला करने से चुनाव में उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है|  पर चुनाव के बाद, मुझे लगता है वे मुझे छोड़ेंगे नहीं| वे लोग कुछ करेंगे| मोदी और अंबानी जैसे लोग … मुझे बताया गया है कि उधोगपतियों को धमकाया गया है, संपादकों को धमकाया गया है|  उन्हें कहा गया है कि मोदी सत्ता में आ रहे हैं और मोदी किसी को नहीं छोड़ते और वे बदला हमेशा लेते हैं| तो वे मुझसे भी बदला लेंगे…पर मैं तैयार हूँ किसी भी स्थिति का सामना करने के लिए|

आपका परिवार कैसे लेता है इन सब बातों को?

वे नर्वस हैं| मैं उन्हें शांत करने की कोशिश करता हूँ| मुझे लगता है उनके पास अब कोई विकल्प भी नहीं है (हँसते हुए)

आप मार्च में भी वाराणसी आए थे| तब और अब के बीच आपके चुनाव प्रचार ने किसी प्रगति की है?

यह केवल मेरा चुनाव प्रचार नहीं है| यह तो जनता का चुनाव प्रचार है| यदि यह मेरा चुनाव प्रचार होता तो अलग बात होती और मैं आपके सवाल का जवाब दे सकता था| सांसद बन्ना मेरा लक्ष्य नहीं  है| मेरा लक्ष्य लोगों को जागरूक बनाना है| उन्हें बदलाव के लिए तैयार करना है| यदि वे इस बार जाग जाते हैं अच्छा है अन्यथा अगले चुनाव में सही| मेरी लड़ाई जारी रहेगी|

“आप” के उम्मीदवार पर नालंदा, बिहार में भी  हमला किया गया था|  कुछ उम्मीदवारों ने अपना नामांकन वापिस ले लिया| क्या ये दूसरों द्वारा डाले दबाव के कारण है…? T

दबाव एक कारण हो सकता है| कुछ उम्मीदवारों ने नामांकन वापिस लिए हैं क्योंकि हमारी पार्टी के पास उन्हें देने के लिए पैसे नहीं थे और उनके पाने पास भी पैसे नहीं थे| तो उन्होंने अपने नाम वापिस ले लिए यह कह कर कि किसी और उम्मीदवार को टिकट दे दिया जाए|  उन्होंने चुनाव से भले ही नाम वापिस ले लिए हों पर वे पार्टी के साथ खड़े हैं| दबाव भी एक कारण हो सकता है पर मेरे पास इस बात का कोई सुबूत नहीं है| नालंदा से हमारे उम्मीदवार पर किया हमला बताता है कि आज की राजनीति कितने एअमान्वीय हो चुकी है|

AK banaras1आप वाराणसी में मुस्लिम समुदाय से भी मिले हैं| आपको कैसी प्रतिक्रया मिली उनसे? 

स्पष्टत: मुस्लिम मोदी को हराना चाहते हैं| लेकिन हम इसे दूसरी तरह से देख रहे हैं| यदि इस बार ऐसा संभव हो कि हिंदू और मुसलमान मिल कर वोट दें बिना किसे प्रकार के ध्रुवीकरण का शिकार हुए हुए… आपको पता ही है कि मोदी की राजनीति ध्रुवीकरण वाली राजनीति है| क्या हम सभी संप्रदायों और जातियों के लोगों को एक साथ ला सकते हैं चुनाव लड़ने के लिए?  मुख्य प्रश्न यह है हमारे सामने| और यही हमारा ध्येय भी है|

मूलत: हमारी जंग तो सच्चाई और ईमानदारी के लिए है| ये तो सार्वभौमिक मूल्य हैं चाहे हिंदुत्व के एबात करें या इस्लाम की, या सिख धर्म की बात करें या जैन धर्म की| ये मूल्य हरेक धर्म में उपस्थित हैं| हमारी लड़ाई समाज में प्रेम और इंसानियत को कायम रखने की है|  उनकी राजनीति नफ़रत भरी है जबकि हम प्रेममयी राजनीति करना चाहते हैं|  उनकी राजनीति भ्रष्टाचार की पोषक भी है जबकि हम ईमानदारी की स्थापना राजनीति में करना चाहते हैं| यह अनिवार्य हो गया है कि सभी लोग एक साथ आएं और इस लक्ष्यपूर्ति में सहयोग दें|  I

तो एक तरह से वाराणसी उस राजनीतिक बदलाव की राजधानी बन सकता है जो आप और आपकी पार्टी दोनों देखना चाहते हैं?

ईश्वर ने वाराणसी और अमेठी के लोगों के हाथ में देश की राजनीति बदलने की कुंजी दे दी है| यदि लोग बाहर निकलते हैं और मोदी को वाराणसी में और राहुल गांधी को अमेठी में हरा देते हैं तो भारत की राजनीति में भूचाल आ जायेगा| कांग्रेस और भाजपा दोनों खत्म हो जायंगे| एक साल बाद फिर से चुनाव होगा और आप देखेंगे कि नये किस्म के लोग राजनीति में शामिल होंगे|

मुख्तार अंसारी ने चुनाव से अपनी उम्मीदवारी वापिस ले ली है| लोग इस बात को कई तरीकों से देख रहे हैं| (2009 में, मुख़्तार अंसारी, एक कथित माफिया, बसपा के टिकट पर वाराणसी से लड़ा था और भाजपा के मुरली मनोहर जोशी से  करीब 17000 वोटों से हार गया था) )

मुख्तार अंसारी इस देश का एक नागरिक है और यह उसकी स्वतंत्रता है कि वह चुनाव लड़े या अपना नाम वापिस ले ले| यह उस पर निर्भर करता है| लेकिन हम उसके संपर्क में नहीं हैं|

क्या आपने एक बार भी वाराणसी से हार जाने के बारे में सोचा है? क्या आपको हार का भय नहीं है?

जीत हो या हार, मैं इन् बातों की चिंता नहीं करता|  जीत या हार कुछ भी मेरी नहीं होगी| यह लोगों की जीत या हार होगी| मेरा लक्ष्य लोगों को यह समझाना है| मेरे हाथ में सिर्फ कर्म करना है फल तो ईश्वर के हाथ में है|

क्या आपको लगता है कि मीडिया के साथ आपके संबंधों में सुधार आ रहा है?

निश्चित रूप से नहीं! यह फेज तो बहुत महत्वपूर्ण है उनके लिए|  बहुत बड़ी मात्रा में धन निवेश  किया गया है मीडिया में और मीडिया-मालिकों और संपादकों को धमकियां दी गई हैं| मैं कुछ ऐसे रिपोर्टर्स को जानता हूँ जिनके बीट को केवल इसलिए बदल दिया गया क्योंकि उन्होंने हमारे पक्ष में साधारण से ट्वीट कर दिए|

क्या “आप” ने Times Now का बहिष्कार किया हुआ है? “आप” के प्रतिनिधि उस चैनल पर दिखाई नहीं देते| 

 हाँ, हम लोग कुछ टीवी चैनल्स से दूरी बना कर चल रहे हैं| क्योंकि हमने देखा कि वे हमारे खिलाफ दुष्प्रचार कर रहे थे और गलत तरीकों से भाजपा को प्रचारित करने के लिए हमें निशाना बना रहे थे|  

तो हमने निर्णय लिया कि ऐसे चैनल्स के साथ बातचीत का कोई फायदा नहीं है| क्योंकि जो भी हम बोलेंगे वे लोग उसे तोडमरोड कर ही प्रस्तुत करेंगे|  तो हमने तय किया कि वे जो चाहें वो दिखाएँ हमारे बारे में अगर उनको अपनी ही मर्जी से ही तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करना है तो उनसे बात करके भी क्या लाभ होगा? हम लोग बहुत छोटे हैं वे बहुत बड़े हैं, बहुत शक्तिशाली हैं Times Now, India TV, India News, Dainik Jagran.

वाराणसी में आपका पहला पड़ाव एक दलित बस्ती में था और वहाँ का एक आदमी मेनहोल में सफाई करते हुए मारा गया था| पर टीवी आपकी काजी से मुलाकत को ही दिखाता रहा|

मीडिया पक्षपाती है| It यह भी हिंदू-मुस्लिम का ध्रुवीकरण काने वाले तंत्र का एक हिस्सा है| मीडिया स्वतंत्र नहीं है| सारे मीडिया के बारे में ऐसा नहीं कहूँगा| कुछ मीडिया अच्छा भी है| कुछ रिपोर्टर अच्छे हैं|  कुछ मीडिया के मालिक भ्रष्ट हो चुके हैं| पत्रकार मालिकों के दबाव के सम्मुख टिक नहीं पाते| उन्हें नौकरी की रक्षा करनी पड़ती है|

15 अप्रैल को वाराणसी के प्रभावशाली व्यापारियों के साथ आपकी भेंट हुयी| मैंने उनमें से कुछ के साथ बात की और मुझे लगा कि उनमें से बड़ी उम्र के लोग “आप” से भयभीत थे| 

वे “आप” से क्यों भयभीत हैं? भेंट में उन्होंने हमारी अर्थनीति के सन्दर्भ में कुछ शंकाएं व्यक्त कीं| मैंने उनके सभी शंकाओं का निवारण किया और मुझे लगा जी वे लोग बेहद प्रसन्न थे| |मैंने सुबूतों  के साथ उनसे स्पष्ट कहा और मैंने उन्हें अपने पुराने भाषण दिखाए कि मैं कोई अभी कहानियां नहीं बना रहा उनके सामने, बल्कि हमारी अर्थनीति में एक निरंतरता बनी रही है| उन्होंने इस बात को सराहा| मैंने उनसे कहा कि सबसे बड़ा सुबूत तों आँखों देखे अपने अनुभव का है|  मैंने उन्हें बताया कि दिल्ली में  49 दिनों की सरकार के दौरान मैंने दिल्ली के व्यापारियों और उधोगपतियों के साथ भेंट की और हमने कानूनों को आसान बनाने की चेष्टा की| वैट को आसान बनाया| हमने उधोगपतियों के लिए कुछ सार्थक करने की कोशिश की|   मैंने उन्हें बताया कि वे मेरे कहे पर न जाकर मेरे कहे की खुद ही जांच कर लें|  मुझे तों कहीं से नहीं लगा कि वे हमसे भयभीत थे|

(कार रुकती है, लोगों का झुण्ड उनसे बाहर निकलने के लिए अनुरोध करता है| लोग उन्हें माला पहनाते हैं और उनके समर्थन में नारे लगाते हैं| थोड़ी देर में वे वाहन में वापिस आ जाते हैं| मैं पूछता हूँ- कितना थकान भरा है यह सब संभालना?)

चुनाव प्रचार बेहद थकान वाला काम है| आपको पता है उनमें से एक ने मुझसे कहा कि एक आदमी के दो जगहों से चुनाव लड़ने पर प्रतिबन्ध लगना चाहिए| उसने कहा कि उसे भी दो क्षेत्रों से वोट देने की सुविधा मिलनी चाहिए क्योंकि नेता तों दो जगह से चुनाव लड़ लेते हैं|   गाँव वालों के पास बहुत विचार हैं|

मुझे यह भी बताया गया कि व्यापारियों के समूह में युवावर्ग “आप” के प्रति ज्यादा उत्सुक और खुला हुआ था|

हाँ मुझे भी ऐसा महसूस हुआ|लेकिन वास्तव में किसी व्यापारी को “आप” से डरने की जरुरत नहीं  है|

आपको भारत  की संसदीय प्रतिनिधि  प्रणाली में क्या कमियां लगती हैं?

हमारे लोकतंत्र में कुछ समस्याएं हैं| जैसे लोकसभा सीट के क्षेत्र बहुत बड़े बड़े हैं और एक प्रतिनिधि लगभग 20-25 लाख लोगों का अप्रतिनिधित्व करता है| बड़े लोकसभा क्षेत्रों को बांटने की जरुरत है|  और सांसद और विधायकों के पास वास्तव में कोई शक्ति नही हैं जबकि लोगों की उनसे अपेक्षायें बहुत होती हैं|  शक्तियां ब्यूरोक्रेट्स को दी गई हैं जो कि जनता के प्रति जिम्मेदार नहीं हैं| उन्हें मुख्या धारा में लाये जाने की जरुरत है| (गवर्नेंस तंत्र विकसित करने की जरुरत है)

आपकी पंजाब यात्रा कैसी थी?

बहुत अच्छी, देवीय, बहुत ही अच्छी| मुझे इतने बढ़िया रेस्पोंस की अपेक्षा नहीं थी| मैंने इससे पहले इतनी बड़ी संख्या में लोगों को सड़कों पर आते हुए नहीं देखा|  हमें पंजाब में अच्छा प्रदर्शन करना चाहिए|

AK nominationतो लोकसभा चुनाव में कितनी सीटें “आप” को मिल जायेंगीं?

(हँसते हुए) आपको सच बताऊँ तो मुझे इन सब बातों की चिंता नहीं है, कभी नहीं रही| मेरा मानना रहा है कि – कर्म करते रहो ईश्वर अपने आप फल देगा|

“आप” की क्या भूमिका संसद में रहेगी?

(हँसते हुए) अगर हमें बहुमत मिलता है तो हम सरकार चलायेंगे…

अरे बहुमत नहीं…

अन्यथा विपक्ष में बैठेंगे|

किसी के साथ गठबंधन नहीं?

नहीं!

वाराणसी में 12 मई को चुनाव के बाद आपकी क्या योजना है?

मैं जयपुर जाउंगा विपस्सना करने| मतगणना वाले दिन भी मैं ध्यान में रहूंगा| मैं वहाँ  20 मई तक रहूंगा|

अगर “आप” चौंकाने वाले परिणाम लेकर आती है और आपकी जरुरत हो सरकार बनाने की प्रक्रिया में?

और लोग निर्णय लेंगें| पार्टी सिर्फ अरविंद केजरीवाल तों है नहीं|

क्या आप हरियाणा और बिहार में विधानसभा चुनाव लड़ेंगे?

हम लोग लोकसभा चुनाव के नाद तैयारी शुरू कर देंगे|

आपको फंड कहाँ से मिलेगा?

जनता  के पास से फंड आएगा| यह उनका चुनाव है| 

By Ajaz Ashraf
मूल साक्षात्कार अंग्रेजी में – Arvind Kejriwal interview

अप्रैल 6, 2014

क्या कोई नरेंद्र मोदी को रोक सकता है?

modiप्रसिद्द पत्रिका The Economist ने 5 अप्रैल 2014 को एक लेख प्रकाशित किया है, जिसमें नरेंद्र मोदी के भारत के प्रधानमंत्री बनने के मसले पर विचार प्रस्तुत किये गये हैं| मूल लेख Can anyone stop Narendra Modi? अंग्रेजी में है|

यहाँ प्रस्तुत है श्री मनोज खरे द्वारा किया गया लेख का हिंदी अनुवाद –

[सम्भव है वे भारत के अगले प्रधानमंत्री बन जाएं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं होगा कि वे इसके योग्य हैं।]

कौन भारत में होने वाले आम चुनावों के संभावित परिणामों के बारे में नहीं सोच रहा है? सात अप्रैल से शुरू होने वाले चुनाव में मुंबई के करोड़पतियों के साथ-साथ अशिक्षित ग्रामीणों और झोपड़पट्टियों में रहने वाले गरीब-वंचित लोगों को भी अपनी सरकार चुनने का बराबर का हक होगा। नौ चरणों में पांच सप्ताह से ज्यादा चलने वाले मतदान में लगभग 81.5 करोड़ नागरिक अपने मत का प्रयोग करेंगे जो कि इतिहास में एक सबसे बड़ा सामूहिक लोकतांत्रिक कार्य होगा। लेकिन कौन भारत के राजनीतिज्ञों के दुर्बल, गैरजवाबदेह और अनैतिक चरित्र की निंदा नहीं करता? समस्याओं से आकंठ डूबा देश कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व में बनी गठबंधन सरकार के अधीन दस वर्षों के दौरान मझदार में पहुंच गया है, जिसका कोई खेवनहार नहीं है। वृद्धि-दर घटकर लगभग आधी- 5 प्रतिशत के आस-पास रह गई है, जो कि प्रति वर्ष नौकरी करने के लिए बाजार में उतरने वाले करोड़ों युवा भारतीयों को रोजगार देने की दृष्टि से बहुत कम है। सुधार अधूरे रह गए हैं, सड़कें और बिजली उपलब्ध नहीं है। बच्चों की पढ़ाई- लिखाई नहीं हो पाती है। जबकि विडंबना यह है कि नेताओं और अफसरों द्वारा ली जाने वाली रिश्वत का आंकड़ा कांग्रेस के शासन-काल में चार से बारह बिलियन डॉलर के बीच पहुंच गया है।

भारतीय लोगों की नजर में राजनीति का मतलब है- भ्रष्टाचार। इसलिए कोई आश्चर्य नहीं है कि भारतीय जनता पार्टी के नरेंद्र मोदी को भारत का अगला प्रधानमंत्री बनने के लिए जबर्दस्त समर्थन मिल रहा है। लेकिन वे अपने कांग्रेस पार्टी के प्रतिद्वंद्वी नेता राहुल गांधी से ज्यादा अलग नहीं हैं। भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के प्रपौत्र राहुल गांधी इस तरह पदग्रहण करने को तैयार बैठे हैं, मानो यह उनका दैवी अधिकार हो। जबकि मोदी पहले चाय बेचने वाले थे जो कि महज अपनी योग्यता के बलबूते ऊपर तक पहुंचे हैं। लगता है मिस्टर गांधी अपने ही मानस को नहीं समझते। यहां तक कि वे नहीं जानते कि उन्हें सत्ता चाहिए या नहीं। गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में मोदी का कामकाज दर्शाता है कि उन्होंने आर्थिक विकास किया है और वे विकास को धरातल पर उतार सकते हैं। राहुल गांधी के गठबंधन पर भ्रष्टाचार की कालिख पुती हुई है। जबकि तुलनात्मक रूप से मोदी साफ-सुथरे हैं।

इस तरह प्रशंसा के लिए काफी कुछ है। फिर भी यह पत्रिका नरेंद्र मोदी को भारत के सर्वोच्च पद के लिए अपना समर्थन नहीं दे सकती।

मोदी की दुर्भावना
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कारण शुरू होता है गुजरात में 2002 में मुसलमानों के विरूद्ध हिंदुओं के उन्मादी दंगों से, जिनमें कम से कम एक हजार लोग मौत के घाट उतार दिए गए थे। अमदाबाद और आसपास के कस्बों-गांवों में चला हत्याओं और बलात्कार का दौर, एक ट्रेन में सवार 59 हिंदू तीर्थयात्रियों की मुसलमानों द्वारा की गई हत्या का बदला था। नरेंद्र मोदी ने 1990 में अयोध्या स्थित पवित्र-स्थल पर एक यात्रा का आयोजन करने में सहायता की थी, जिसके परिणामस्वरूप दो वर्ष बाद हिंदू-मुसलमान झड़पों में 2000 लोगों को जान गवांनी पड़ी थी। वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक आजीवन सदस्य हैं जो कि एक हिंदू राष्ट्रवादी समूह है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लक्ष्य के प्रति समर्पित होने के कारण ही उन्होंने जीवन भर के लिए ब्रह्मचर्य अपनाया और अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत में मुसलमानों के खिलाफ हिंदुओं को भड़काने वाले शर्मनाक भाषण दिए। 2002 में नरेंद्र मोदी मुख्यमंत्री थे और उन पर जनसंहार होने देने या समर्थन करने तक के आरोप लगे।

मोदी के बचावकर्त्ता और उनके अनेक समर्थक, खासकर वे जो कारोबारी अभिजात्य वर्ग के हैं, दो बातें कहते हैं। पहली, बार-बार की गई जांच-पड़तालों में जिसमें प्रशंसनीय स्वतंत्र सुप्रीम कोर्ट द्वारा कराई गई जांच भी शामिल है, ऐसा कुछ भी नहीं मिला जिसके आधार पर नरेंद्र मोदी पर कोई आरोप लगाया जा सके। और दूसरी बात वे कहते हैं कि नरेंद्र मोदी ने अब खुद में बदलाव लाया है। उन्होंने निवेश आकर्षित करने और हिंदू-मुसलमानों को समान रूप से फायदा पहुंचाने के उद्देश्य से कारोबार को बढ़ावा देने के लिए अथक कार्य किया है। वे कहते हैं कि एक सुसंचालित अर्थव्यवस्था में देश भर के गरीब मुसलमानों को मिलने वाले भारी लाभ के बारे में सोचिए।

दोनों आधार पर यह अत्यंत उदार नजरिया है। दंगों के बारे में बैठायी गई जांच निष्कर्षहीन रहने का एक कारण यह है कि ज्यादातर सबूत या तो नष्ट हो गए थे या जानबूझ कर नष्ट कर दिए गए थे। और अगर 2002 में तथ्य अस्पष्ट और धुंधले थे तो नरेंद्र मोदी के विचार भी अब भी वैसे ही हैं। जो कुछ हुआ उसका स्पष्टीकरण देते हुए माफी मांग कर वे नरसंहार को अपने से पीछे छोड़ सकते थे। पर उन्हें दंगों और नरसंहार के बारे में पूछे गए सवालों का जवाब देना भी गवारा नहीं है। पिछले वर्ष दी गई एक दुर्लभ टिप्पणी में उन्होंने कहा था कि उन्हें मुसलमानों की पीड़ा पर उसी तरह का दुःख है, जैसा दुःख चलती कार के नीचे किसी कुत्ते के पिल्ले के आ जाने से होता है। शोर-शराबा मचने पर उन्होंने कहा कि उनका तात्पर्य सिर्फ इतना था कि हिंदू सभी प्राणियों का ध्यान रखते हैं। मुसलमानों और उग्र हिंदुओं ने इससे अलग-अलग संदेश ग्रहण किए। अन्य भाजपा नेताओं से अलग, नरेंद्र मोदी ने मुसलिम ढंग की टोपी पहनने से मना कर दिया और 2013 में उत्तर प्रदेश में हुए दंगो की निंदा नहीं की, जिसके ज्यादातर पीड़ित मुसलमान थे।

दो में कम बुरा
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डॉग-व्हिसिल पॉलिटिक्स” हर देश में निंदनीय है, जिसमें ऐसी द्विअर्थी भाषा का प्रयोग होता है, जिसका आम जनता के लिए एक मतलब होता है तो किसी अन्य उप-समूह के लिए दूसरा। लेकिन भारत में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच हिंसा उभरती रही है। विभाजन के वक्त, जब ब्रिटिश भारत विभक्त हुआ था तब लगभग 1.2 करोड़ लोग विस्थापित हुए थे और सैकड़ों मारे गए थे। 2002 के बाद में सांप्रदायिक हिंसा काफी कम हो चुकी है। लेकिन अभी भी सैकड़ों घटनाएं होती रहती हैं और प्रतिवर्ष दर्जनों जानें जाती हैं। कभी-कभी, जैसा कि उत्तर प्रदेश में हाल में हुआ, हिंसा खतरनाक स्तर पर होती है। चिंगारी बाहर से भी भड़क सकती है। मुंबई में 2008 में भारत आतंकवादियों के भयानक हमले का शिकार बना जो कि परमाणु-अस्त्रों से लैस पड़ोसी देश पाकिस्तान से आए थे। पाकिस्तान भारत के लिए हमेशा चिंता का कारण रहा है।

मुसलमानों के भय को समाप्त करने से इंकार करके मोदी उस भय को खुराक देते हैं। मुसलिम-विरोधी मतों को मजबूती से थाम कर वे इस भय को खाद-पानी देते हैं। भारत विभिन्न तरह के धार्मिक आस्थाओं, धर्मावलंबियों और विद्रोही लोगों का आनंदमय, लेकिन कोलाहलपूर्ण देश है। इनमें स्तंभकार दिवंगत खुशवंत सिंह जैसे श्रेष्ठ लोग भी हैं जो सांप्रदायिक घृणा से होने वाली क्षति के बारे में जानते हैं और उससे दुःखी रहते हैं।

नरेंद्र मोदी दिल्ली में अच्छी शुरुआत कर सकते हैं। लेकिन देर-सबेर उन्हें सांप्रदायिक खून-खराबे या पाकिस्तान के साथ संकट की स्थिति से दो-चार होना पड़ेगा। और कोई नहीं जानता, कम से कम वे आधुनिक लोग जो आज मोदी की प्रशंसा कर रहे हैं, कि मोदी क्या करेंगे या मुसलमानों की मोदी जैसे विभाजनकारी व्यक्ति के प्रति कैसी प्रतिक्रिया होगी। अगर नरेंद्र मोदी हिंसा में अपनी भूमिका स्पष्ट करते और सच्चा पश्चाताप जाहिर करते तो हम उनका समर्थन करते। लेकिन उन्होंने ऐसा कभी नहीं किया। उचित नहीं होगा कि उन जैसा शख्स जो लोगों को बांटता आया है, विस्फोट के मुहाने पर बैठे भारत जैसे देश का प्रधानमंत्री बने। राहुल गांधी के नेतृत्व में कोई कांग्रेस सरकार बने इसके आसार हमें आशाजनक नहीं लगते। लेकिन हमें फिर भी कम गड़बड़ी वाले विकल्प के रूप में भारतीय जनमानस को इसकी अनुशंसा करना चाहेंगे।

अगर कांग्रेस जीतती है, जिसकी संभावना न के बराबर है, तो उसे अपने आप को फिर से नया करना पड़ेगा और देश का सुधार करना होगा। राहुल गांधी को चाहिए कि वे राजनीति से पीछे हट कर आधुनिकतावादियों को आगे लाएं और अपनी आत्मविश्वासहीनता को एक गुण के रूप में स्थापित करें। ऐसे लोग वहां बहुत हैं और आधुनिकता ही वह चीज है, जिसे भारतीय मतदाता ज्यादा से ज्यादा चाहते हैं। अगर भाजपा की जीत होती है, जिस की संभावना ज्यादा है, तो उसके गठबंधन सहयोगियों को मोदी को छोड़ किसी अन्य नेता को प्रधानमंत्री बनाने पर जोर देना चाहिए।

फिर भी वे नरेंद्र मोदी को ही चुनें तो? हम उनके भले की कामना करेंगे और हमें खुशी होगी अगर वे भारत को आधुनिक, ईमानदार और सम्यक सुशासन प्रदान कर हमें गलत साबित कर देंगे।

लेकिन अभी तो नरेंद्र मोदी को उनके रिकार्ड के आधार पर ही जांचा जा सकता है, जो अब भी सांप्रदायिक घृणा से जुड़ा हुआ है। वहाँ कुछ भी आधुनिक, ईमानदार और सम्यक नहीं है। भारत को इससे बेहतर नेतृत्व मिलना चाहिए।

साभार – मनोज खरे

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