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दिसम्बर 13, 2013

सफाई बाबा…

safai baba 2-001चौंकना स्वाभाविक बात है जब सुबह उठकर हमेशा गंदी रहने वाली सड़क साफ़ दिखाई दे| ऐसा नहीं कि पहले बहुत साफ़ सुथरे रहते थे भारत के शहर और गाँव-कस्बों के गली-कूचे और मोहल्ले, पर पौलीथीन बैग्स के आगमन के बाद और लगभग हर सामान छोटे छोटे प्लास्टिक पाउच में मिलना आरम्भ होने के बाद तो हिन्दुस्तान की हर जगह की हर सड़क सिर्फ कूड़े से लबलबाती नज़र आती है|

ऊपर से भारतीयों का कुत्ते पालने का शौक| रहने को फ़्लैट भी मुश्किल से मयस्सर हो पा रहे हैं पर बंगलों में रहने वाले अंग्रेजों के शौक हम भारतीयों ने पोषित कर लिए हैं| और फिर दिक्कत क्या है – कुत्तों से गंदा करवाने के लिए सड़कें तो हैं ही| कुत्ते को सड़क पर लेकर निकल आइये और इधर उधर देख जब कोई न देख रहा हो तब कुत्ते को कहीं हल्का होने दीजिए| पुरुष तो पहले ही कहीं भी हल्के होने के लिए खड़े हो ही जाते हैं, उनके लिए ( और शायद सरकारों के लिए भी, जो इस ओर ध्यान नहीं देती और जन-सुविधाएँ नहीं बनवातीं) तो पूरा देश शायद मूत्रालय ही है|

कुत्तों के लिक्विड यूरिया के वेस्ट ट्रीटमेंट का जिम्मा सड़क पर खड़े वाहनों का होता है और कुत्तों के सौलिड वेस्ट मैनेजमेंट का भार सड़क, सड़क किनारे की कच्ची-पक्की जमीन (फुटपाथ) और नीचे देख न चल पाने वाले लोगों के जूतों और चप्पलों पर रहता है|

भांति भांति के कूड़े घरों से निकल सड़कों की शोभा बढाते रहते हैं| किसी राज्य में किसी की सरकार हो, नगर निगम किसी दल का हो या निर्दलियों से भरा हो, सफाई अब इनके कर्तव्यों से बाहर की वस्तु है| इनके पुनीत कर्तव्य क्या हैं इसे उनके मतदाता भी नहीं जानते जो इन्हें चुनते हैं| ऐसे ऐसे लोग भी मिल जायेंगे जिनकी सात पुश्तों में किसी ने कभी झाडू को हाथ नहीं लगाया पर उनके निठल्ले रिश्तेदारों के नाम सफाई कर्मचारियों को निर्धारित वेतन हर माह आ जाता है| सफाई तो किन्ही और लोगों का काम है|

नवम्बर के अंत और दिसम्बर के शुरू में ठण्ड न इतनी अधिक होती है कि रात या सुबह घर में अंदर ही दुबक कर बैठे रहें और न ही इतनी कम होती है कि सड़क पर ही चहलकदमी करते रहें|

हर आदमी की अपनी सनक होती है और उसका दिमाग किसी किसी मामले में औरों से ज्यादा चलता है| एक सुबह ऐसा पाया कि घर के सामने वाली सड़क अपेक्षाकृत साफ़ लग रही है तो हल्का आश्चर्य हुआ| कालोनी वाले तो चौकीदार तक के लिए चन्दा देने को तैयार नहीं सफाई कर्मचारी रखने के लिए कौन जेब ढीली करेगा?

जब अगली सुबह पहले से भी ज्यादा साफ़ सड़क नज़र आयी तो आश्चर्य की मात्रा भी बढ़ गई|

अडोस पड़ोस में एक दो से पूछा तो उन्होएँ साफ़ सड़क देख संतोष जाहिर किया और मामले में रूचि न ली| एक सज्जन ने सोचा और विचार प्रकट किया कि हो सकता है हर व्यक्ति ने अपने घर के बाहर सफाई की हो या करवाई हो| उनसे पूछा कि क्या उन्होंने ऐसा किया अपने घर के सामने तो उन्हें अपने सिद्धांत की सच्चाई पर सौ प्रतिशत संदेह हो आया| वे भी जानते थे कि इस कालोनी के लोग वे हस्ती हैं जो  मौक़ा मिले तो एक हफ्ते में ग्रीस का गाजीपुर डेरी बना डालें|

लगातार तीन सुबह जगह जगह कूड़े से सजी गली अगर साफ़ दिखाई दे तो आँखों से जिसे सही दिखता हो और दिमाग की खिड़की जिसकी खुली हो उसे तो बात की गंभीरता दिखाई देगी ही|

इन सफाई हादसों की चौथी रात, कोई पौने बारह बजे का समय होगा, कम्प्यूटर पर पढते पढते और काम करते करते आँखें भी थक गई थीं और हाथ की मासपेशियाँ भी एक खुली अंगड़ाई का खिंचाव मांगती थीं| हर ओर लगभग सन्नाटा सा पसरा था|

उठकर पानी पीया और मध्यम  आवाज में एफ.एम रेडियो चालू किया तो प्रस्तोता अपनी लगातार बकबक से कूड़ा बिखेर रहा था पर अच्छी बात यही कि ऐसे कूड़े में फेंक देने के हकदार कार्यक्रम में भी बीच बीच में अच्छे गीत  सुनने को मिल जाते हैं|

प्रस्तोता की तथ्यहीन बकवास बंद हुयी तो गीत शुरू हुआ…  श्री 420 फिल्म का शैलेन्द्र लिखित, मुकेश द्वारा गाया  गीत शुरू हुआ|…

मेरा जूता है जापानी ये पतलून इंग्लिस्तानी

सर पे लाल टोपी फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी

….

गीत के सौंदर्य में मन खोया ही था कि इसकी एक पंक्ति  ‘निकल पड़े हैं खुली सड़क पे अपना सीना ताने’ सुनकर दिमाग की चेतना के दरवाजे खुलो गये और सड़क की सफाई की बात याद आ गयी|

इच्छा हुयी कि जाकर सड़क को देखा जाए| कमरे से बाहर निकल पाया कि अच्छा अन्धेरा था| मेन गेट खोल कर सड़क पर पहुंचना हुआ तो  देखा कि घर के सामने ही नहीं अगल बगल तीन चार स्ट्रीट बल्ब नहीं जल रहे थे| गली के इस छोर से उस छोर तक कोई हलचल न दिखाई दी| मेन गेट बंद करके गली के घर के पास वाले मुहाने तक पहुँच अगली गली के सामने बने छोटे से पार्क तक जाने की इच्छा हुयी| पार्क भी सुनसान पड़ा प्रतीत होता था| पार्क न बहुत बड़ा था और न ही छोटा| चारों कोनों में एक एक स्ट्रीट लाईट जाली हुयी थी जो पार्क में थोड़ा थोडा प्रकाश बिखेर रही थीं| पार्क में बनी एक बैंच पर बैठना हुआ तो उसकी ठंडक ने सूचित किया कि मौसम में ठण्ड बढ़ती ही जायेगी दिन प्रति दिन|

बैठे बैठे आँखें बंद हो गयीं| कुछ समय बाद एकदम से चेतना लौटी तो ऐसा प्रतीत हुआ मानो कुछ ही पलों के लिए सही पर एक गहन निद्रा छा गई थी मन-मस्तिष्क पर| आँखें खोलीं तो पार्क के सामने वाले हिस्से पर पैदल चलने के लिए बने पक्के रास्ते पर एक साया हिलता डुलता दिखाई दिया| पहले तो वहीं बैठे बैठे देखने, जानने और पहचानने की कोशिश की कि इस वक्त कौन हो सकता है पार्क में| दूरी और सर्द रात के अँधेरे के कारण कुछ साफ़ साफ़ दिखाई नहीं दिया तो उत्सुकतावश उस ओर बढ़ चला|

साये से थोड़ा दूरी तक पहुँच रुक कर उसे देखा तो पाया कि वह झाडू से रास्ते को बुहार रहा था और रास्ते में पड़े कूड़े को उठा एक थैले में डाल  रहा था| इस ओर उसकी पीठ थी सो उसका चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था पर उसके शरीर से ऐसा अनुमान लगाना मुश्किल न था कि साया किसी बुजुर्ग का था|

और पास पहुंचना हुआ तो आहट पाकर साया पलटा| वे वाकई एक बुजुर्गवार थे जो श्वेत वस्त्र धारण किये हुए पार्क की सफाई कर रहे थे| उनका चेहरा शान्ति के नूर से कांतिमान था|

अपने आप ही मुँह से निकला,”बाबा!… इतनी रात को आप यहाँ सफाई कर रहे हैं?”

बुजुर्ग ने मुस्कराकर देखा और काम में मशगूल रहे|

क्या आपने ही इस कालोनी की सड़कें पिछले दिनों साफ़ की थीं?

हाँ, बेटा!

आप अगर बुरां न माने, तो क्या आपसे पूछ सकता हूँ कि आप क्यों इस सफाई के काम में लगे हुए हैं और वह भी रात को?

वे रुक गये, और अपनी गहरी आँखों से देखते रहे| शायद उन्हें उत्सुकता सच्ची लगी हो, वे बोले आओ बेंच पर बैठते हैं|

बेंच पर बैठ कर वे बोले,”सीधे मुद्दे की बात करें तो इर्द-गिर्द सफाई हो तो अच्छा लगता है कि नहीं”|

जी, बिलकुल मन प्रसन्न हो जाता है सफाई देख कर और अगर सुबह सबह सफाई ही रहे आँखों के सामने तो दिन भर एक खुशनुमा एहसास छाया रहता है मन पर|

सफाई तो हरेक आदमी ओ अच्छी लगती होगी पर क्या कारण है कि हमारा देश एक कूड़ेदान में परिवर्तित होता जा रहा है|

जी, आपने सही कहा| चारों तरफ गन्दगी का ही साम्राज्य ही दिखाई देता है| शायद हम लोग खुद सफाई रखते नहीं है और इस काम के लिए जिम्मेदार विभागों के पास या तो कर्मचारी नहीं है, या अगर वे हैं तो वे काम करना नहीं चाहते या विभागों के पास पैसा नहीं है| या शायद नये दौर के कूड़े से निबटने के लिए हमारे पास न तो तकनीकी योग्यता है न ही दूरदृष्टि| अतः हमने अपने को कूड़े के साथ रहने के लिए अभिशप्त मान लिया है| घर के बाहर नालियां अत जाती हैं, बड़े नाले सडांध मारते रहते हैं,  पर हम घर बैठे सिर्फ इस बारे में नाक मुँह सिकोड़ कर शिकायत करते रहते हैं| करते कुछ नहीं| फिर एक बात और भी है कि हरेक आदमी के पास वक्त की कमी है और लगभग हरेक व्यक्ति सोचता है कि वही क्यों गंदगी में हाथ डाले|

मेरे अंदर शायद इस समस्या को लेकर बहुत कुछ दबा हुआ था इसलिए बुजुर्ग के पूछने पर वह लावे की तरह बह निकला|

अच्छा बेटा, एक बात बताओ| क्या किसी को अपने आप को साफ़ करना गंदा लगता है?

नहीं, हर आदमी अपने शरीर को स्वच्छ रखना चाहता है और इस ओर प्रयास करता ही है|

माता-पिता को क्या गंदा लगता है अपने बच्चे को साफ़ करना? या दूसरे शब्दों में कहें तो क्या गंदा हुआ बच्चा क्या माता-पिता को खराब लगता है? क्या उन्हें अच्छा महसूस नहीं होता अपने बच्चे को साफ़ करके? क्या माता-पिता का वात्सल्य भाव महत्वपूर्ण नहीं होता|

जी हाँ, आपने एकदम सही कहा|

बस बेटा, एक तो मुझे ऐसा लगा कि हमारा देश बेहद गंदा होता जा रहा है और इस काम की शुरुआत लोगों को खुद ही करनी पड़ेगी| मैं किससे कहता, किसे साथ लेता, मैंने अपने आप जो मुझसे हो सकता था उसे करने निकल पड़ा| दूसरे अब इस काम को करते करते मुझे इतना अरसा हो गया है कि मेरे अंदर ऐसी भावनाएं जन्म ले चुकी हैं जहां मुझे ऐसा ही लगता है कि मैं अपने बच्चों को ही साफ़ कर रहा हूँ| मेरे अंदर वात्सल्य भाव घर कर चुका है| मैं दिन-रात कभी भी समय पाकर किसी न किसी जगह सफाई में लग जाता हूँ| अब यही मेरे बचे जीवन का लक्ष्य है|

पर आप अकेले क्या क्या कर सकते हैं?

जितना कर सकता हूँ उतना तो करूँगा ही मरते दम तक| फिर मुझे लगता है कि जैसे गंदगी में रहने की आदत हो गयी है ऐसे ही जहां भी मैं कुछ दिन सफाई करता हूँ वहाँ रहने वाले लोगों को सफाई में रहने की आदत हो जायेगी और शायद किसी के अंदर सफाई करने की ज्योति जाग्रत हो जाए| शायद इस जगह तुम ही इस विरासत को आगे ले जाओ|

वे चुप हो गये|

मेरे मन ने प्रण किया कि उनका सफाई का यह अभियान अब रुकना नहीं चाहिए| क्या समिति बनाकर पूरी कालोनी की सफाई का जिम्मा लिया जाए?

वहीं खड़े खड़े प्रण ये भी किये कि जल,थल और वायु तीनों में से किसी को भी अपनी ओर से गंदा और दूषित नहीं करूँगा और ‘सफाई बाबा’ के इस मिशन को और आगे बढाने और ज्यादा लोगों में फैलाने का कार्य करूँगा|

मुझे मौन विचारों में मग्न देख, वे बोले|

अच्छा बेटा अब मैं अपना काम खत्म कर लूँ| उम्र हो चली है, बाद में कल को जीने के लिए ऊर्जा पाने के लिए आराम भी करना है|

वे उठे और सफाई के काम में लग गये|

समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूँ? क्या उनका हाथ बटाऊँ? पर सब कुछ इतना अप्रत्याशित ढंग से घटित हुआ था कि किंकर्तव्यविमूढ़ ही खड़ा रहा|

कुछ पल बाद होश आया तो देखा वे पार्क से जा चुके थे|

घर आकर सो गया|

सुबह सोकर उठा तो लगा कि रात शायद कोई सपना देखा था| भागकर पार्क गया तो पार्क का फुटपाथ वाकई साफ़-सुथरा था|

महसूस हुआ सपना तो नहीं था|

रात को फिर से पार्क, और आसपास की सड़कों पर उन्हें खोजा पर वे दिखाई नहीं दिए| अगली रात फिर से जाकर देखा पर उनसे मुलाक़ात न हो पायी|

शायद किसी और जगह अलख जगा रहे होंगे| मेरी तरह उन्हें कई और लोग मिलते रहे होंगे और मिलते रहेंगे और वे सबको अपने इरादों से स्वच्छ करते ही रहेंगे|

…[राकेश]

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