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नवम्बर 15, 2013

आओ शोलों की तरह जलें…

रातें काली ही होतीं मेरी nightfire-001

अगर

तेरे बदन की लौ उन्हें रौशन न करती…

हर रात तू जलती है साथ मेरे शमा की मानिंद

और सुलगता हूँ मैं  परवाने की तरह

ये रोज का धीमे-धीमे,

अधूरा अधूरा सा जलना

धुआँना गीली- सीली लकड़ी सा

हर रात,

पिछली गर्म रात को उतारना खूँटी से

और ओढ़ लेना कुछ देर भर को

छोड़ देता है कितने अरमानो को धुंआ धुंआ

कब तक यूँ भड़कने से रोकोगी बोलो…

आओ एक रात इन बेचैन दो जिस्मो को

लिपट जाने दो एक दूसरे से ऐसे

कि खूब शोलों की तरह जलें रात भर

सुबह होने न दें फिर…

आओ न एक बार…

(रजनीश)

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