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अक्टूबर 25, 2010

लिखनी है एक गज़ल … (गज़ल – रफत आलम)

 

दिल का तकाज़ा था तेरे रेशमी बालों पर गज़ल लिखूँ
अहसास मेरा पुकार उठा फटे हालों पर गज़ल लिखूँ

मुखौटे नोच कर बेनकाब कर दूँ सफेदपोशों को आज
तन के उजले और मन के कालों पर गज़ल लिखूँ

जवाब जिनके मजनूं ओ फरहाद अपने साथ ले गये
जुनूं मिल जाये मुझे तो उन सवालों पर गज़ल लिखूँ

किसी की वफ़ा का भरम रखने के लिए चुप हूँ वरना
जी बहुत चाहता है दिल के छालों पर गज़ल लिखूँ

खिलते हुए फूलों की तारीफ तो कौन सी बड़ी बात है
मेरी खवाहिश है कभी मुरझाने वालों पर गज़ल लिखूँ

कमज़ोर की गिज़ा पर टूट पड़ते हैं खूनी पंजों वाले
छिन जाते हैं हाथों से उन निवालों पर गज़ल लिखूँ

कर्म और तकदीर की जंजीरों में उलझी हुई है ज़िदगी
कभी काट सकूं तो इन मकडजालों पर गज़ल लिखूँ.

किताबे जिंदगी के काले वर्क फड़फड़ने लगेआलम
दिल में ख्याल आया था अमालों पर गज़ल लिखूँ

(रफत आलम)

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