Posts tagged ‘Likhawat’

नवम्बर 6, 2013

अब क्यों आओगी तुम?

कुछ थोड़ी सी चीज़ें तुम्हारी

मेरे पास रह गयीं थी

चार पांच तस्वीरें

एक नीली वाली,

एक लाल-काली वाली

एक वो भी जो मुझे बहुत पसंद रही है

वापिस भेज रहा हूँ

विभिन्न भावों वाली

छवियाँ तुम्हारी

जो अलग-अलग जगह

मैंने उतारी थीं

उंन दिनों

जब आँख में तुम छायी रहती थीं|

दिल में तो तुम अब भी अंकित रह जाओगी|

कुछ ख़त भी थे

पीले पड गये थे

इस अरसे में

और उनकी लिखावट से

सब कुछ जा चुका था

हर्फों के माने भी तो वही नहीं रहे

जो तुमने लिखे थे

यहीं बहा दिया उनको|

अब तो जब अदावत का भी ताल्लुक नहीं

तुम्हारी चीजें तुमको वापस कर दूँ

यही अच्छा है

थोडा कुछ और भी है

पर उतारूंगा तो दीवारें नंगी हो जाएँगी

दिल भी सूना हो जाएगा

आना

और अगर चाहो तो वापस ले लेना

लेकिन अब क्यूँ आओगी तुम?

तुम आओगी क्या?

(रजनीश)

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मार्च 29, 2013

नामपट्टी…

एक नामपट्टी के बारे में सोच रहा

कि कैसी हो,

फिर घर के बारे में सोचूंगा

कि कैसा हो,

फिर उनके बारे में

जो रह चुके रहे जा चुके घरों में |

अंत में

किसी नए कोण से

सोचना शुरू करूंगा

कि कैसी हो

मेरे घर की नयी नामपट्टी|

सफ़ेद संगमरमर पर काले अक्षर

धीरे-धीरे सफ़ेद हो जाते,

काले पर सफ़ेद लिखावट

धीरे धीरे काली…

(संगमरमर मुझे मकबरों की याद दिलाते)

लकड़ी की तख्ती साल भर भी नहीं चलती,

तांबा

पीतल

लोहा

देखते देखते बदरंग और भद्दे हो जाते|

कैसी मुश्किल है

कि एक साधारण-से नाम को

दुनिया की कोई धातु

पूरी तरह धारण नहीं कर पा रही,

जब कि वह जो

ऐसी न जाने कितनी

दुनियाओं को धारण किये हैं

केवल एक नाम है|

(कुंवर नारायण)

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