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मई 17, 2016

प्रकृति एवं जैव-विविधता – महात्मा गाँधी

Gandhiहम प्रकृति के खिलाफ हिंसा रोकने के लिए पारिस्थितिकी आंदोलन (इकॉलोजी मूवमेंट) तब तक नहीं चला सकते जब तक कि अहिंसा के नियम मानव सभ्यता के केन्द्र बिन्दु नहीं बन जाते|

इंसान के पास जीवन को रचने की शक्ति नहीं है और इसीलिये उसके पास जीवन को नष्ट करने का अधिकार भी नहीं है|

किसी भी समाज को इस कसौटी पर जांचा जा सकता है कि उसका जानवरों के प्रति व्यवहार कैसा है?

यह कहना एक अहंकारजनित अवधारणा है कि मानव के पास बाकी जीव जंतुओं का स्वामितव है और वह उनका भगवान है| इसके उलट, प्रकृति दवारा मानव जीवन को दिए गये वरदानों के कारण, मानव को एक ट्रस्टी के रूप में जीव-जंतुओं की देखभाल की जिम्मेदारी उठानी चाहिए|

वन्य जीवन जंगलों में कम होता जा रहा है लेकिन शहरों में यह बढ़ता ही जाता है|

जीवन में हम अपने आसपास जितनी भी विविधता देखते हैं प्रकृति ने एक मूल एकता के सूत्र से हम सबको आपस में जोड़ रखा है|

मुझे प्रकृति के सिवा कहीं और से प्रेरणा लेने की आवश्यकता नहीं होती| प्रकृति ने कभी मुझे निराश नहीं किया| प्रकृति के रहस्य नित नये रूप में सामने आते हैं,  और वह मुझे हमेशा ही आश्चर्यचकित करती है| प्रकृति ही है जिसने मुझे आनंद की पराकाष्टा का अनुभव अकसर ही कराया है|

 

 

अगस्त 26, 2015

स्वेच्छा-मृत्यु का अधिकार हो, आत्महत्या का नहीं, : ओशो

oshoमेरा एक और सुझाव है:

स्वेच्छा-मरण, युथनेसिया

जिस प्रकार हम जन्म को नियंत्रित कर रहे हैं संतति निरोध के द्वारा, मैं तुम्हें एक और शब्द देता हूं: मृत्यु-निरोध, डेथ-कंट्रोल। लेकिन कोई भी देश मृत्यु निरोध के लिए तैयार नहीं है। एक विशिष्ट उम्र के बाद जब कोई व्यक्ति अपना जीवन भरपूर जी चुका हो, उसकी कोई जिम्मेवारी न हो और अब वह मरना चाहता हो…एक तरह से वह अपने आप पर एक बोझ ही है, फिर भी उसे मजबूरन जीना पड़ता है क्योंकि कानून आत्महत्या के खिलाफ है।

मेरा सुझाव है, यदि तुम मरने की औसतन आयु सत्तर या अस्सी या नब्बे साल मानते हो तो आदमी को चिकित्सा समिति से यह पूछने की स्वतंत्रता होनी चाहिए: “मुझे अपने शरीर से मुक्त होना है।” यदि वह और जीना नहीं चाहता क्योंकि उसने काफी जी लिया है, तो ऐसा करने का उसे पूरा हक है। जो भी करना था वह सब उसने कर लिया। और अब उसे कैंसर या टी.बी. से नहीं मरना है, उसे बस विश्रामपूर्ण ढंग से मरना है।

प्रत्येक अस्पताल में एक विशेष स्थान हो, उसका खास कर्मचारी वर्ग हो, जहां लोग आ सकते है और तनाव-रहित होकर, सुंदरता से, बिना किसी रोग के, चिकित्सा व्यवसाय के सहारे मृत्यु में लीन हो सकते हैं।

यदि चिकित्सा समिति सोचती है कि वह व्यक्ति कीमती है या वह अत्यंत महत्वपूर्ण है, तब फिर उससे और कुछ समय तक जीने का अनुरोध किया जा सकता है। केवल थोड़े से लोगों से ही यहां कुछ देर अधिक रहने की प्रार्थना की जा सकती है क्योंकि उनसे मानवता को इतनी मदद मिल सकती है, अन्य लोगों की इतनी सहायता हो सकती है। लेकिन वे लोग भी यदि जीने से इनकार कर दें तो वह उनका जन्मसिद्ध अधिकार है। तुम उनसे पूछ सकते हो, प्रार्थना कर सकते हो। और यदि वे स्वीकार करते हैं तो ठीक है,लेकिन अगर वे कहें, “नहीं, अब हमें और नहीं जीना है”, तो निश्चित ही उन्हें मरने का पूरा अधिकार है।

किसी बच्चे की जान बचाना समझ में आता है, लेकिन तुम वृद्ध लोगों को क्यों बचा रहे हो जो जी चुके हैं, काफी जी चुके हैं, दुख भोगा, सुख भोगा, सब तरह के अच्छे-बुरे काम किए? अब समय आ गया है-उनको जाने दो।

लेकिन डाक्टर उन्हें नहीं जाने देते क्योंकि वह अवैध है।

उनका आक्सीजन और अन्य जीवनदायी उपकरण वे लोग निकाल नहीं सकते। इसलिए तुम मरणासन्न या अधमरे लोगों की जान बचाए चले जाते हो।

कोई पोप आदेश जारी नहीं करता कि इन लोगों को शरीर से मुक्त होने की अनुमति दी जाए। और उनके शरीरों में बचा ही क्या है? किसी के पैर कटे हैं, किसी के हाथ कटे हैं, किसी का हृदय काम नहीं कर रहा है इसलिए उसकी जगह बैटरी काम कर रही है, किसी के गुरदे काम नहीं कर रहे हैं इसलिए उनके लिए यंत्र लगे हैं। लेकिन इन लोगों का मकसद क्या है? अगर तुम उन्हें इस ढंग से बनाए रखोगे तो भी वे क्या करने वाले हैं?

हां, ज्यादा से ज्यादा वे कुछ लोगों को काम दिलाते हैं, बस। लेकिन वे कौन सा रचनात्मक जीवन जीने वाले हैं? और उनके साथ जो किया जा रहा है उससे उन्हें क्या सुख मिलने वाला है? उन्हें निरंतर इंजेक्शन दिए जा रहे हैं। उन्हें नींद नहीं आती इसलिए नींद की गोलियां दी जा रही हैं। वे जाग नहीं सकते इसलिए उनके खून में एक्टिवेटर (उत्तेजक)दिए जा रहे हैं ताकि वे जाग जाएं। लेकिन किसलिए? उस पाखंडी शपथ के लिए? पाखंडी भाड़ में जाएं। उसे कुछ खयाल नहीं था कि उसकी शपथ क्या गजब ढाने वाली है।

दवाइयों की बजाय, उस मरते हुए आदमी को ध्यान सिखाने के लिए ध्यानी चाहिए क्योंकि अब दवा की नहीं, ध्यान की जरूरत है-कैसे शिथिल हो जाए और शरीर से विदा हो जाए।

प्रत्येक अस्पताल में ध्यानी होने चाहिए, वे अत्यंत आवश्यक हैं-उतने ही जितने कि डाक्टर।

अब तक ध्यानियों की जरूरत नहीं थी क्योंकि एक ही काम था: जान बचाना। अब काम दोहरा हो गया है: लोगों की मरने में सहायता करना। हर विश्वविद्यालय में एक विभाग हो जहां ध्यान सिखाया जाए ताकि लोग स्वयं तैयार हों। जब मरने का समय आ जाए तो वे पूरी तरह से तैयार हो जाएं-आनंद से, उत्सव मनाते हुए।

लेकिन आत्महत्या अपराध है। इसे आत्महत्या समझा जाएगा और लोग कहेंगे कि मैं सबको गैर-कानूनी बातें सिखा रहा हूं।

मेरी उत्सुकता है सत्य में, कानून में नहीं।

सत्य यह है कि तुमने प्रकृति को, जीवन को असंतुलित किया है। उसका संतुलन उसे वापस लौटा दो।

मेरा सुझाव है, एक आंदोलन शुरू किया जाए ताकि जब लोग काफी जी चुके हैं और वे अपने शरीर से मुक्त होना चाहते हैं तो अस्पतालों में सुविधापूर्ण, सुखद मृत्यु का प्रबंध हो सके। यह बिलकुल स्वस्थ दृष्टिकोण है कि हर अस्पताल में एक विशेष कक्ष होना चाहिए जहां सब सुविधाएं हों ताकि मृत्यु एक सुखद, आनंदपूर्ण अनुभव बन जाए।

[ओशो]

अगस्त 3, 2015

फेसबुक से बाहर वास्तविक जीवन में फेसबुकीय सिद्धांतों का नतीजा

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जुलाई 27, 2010

जीवन

जीवन क्या है?

आशा या निराशा?
सफलता या विफलता?
प्रेम या नफरत?
अहिंसा या हिंसा?
आस्था या अनास्था?
ज्ञान या अज्ञान?


क्या जीवन एक नाटक का नाम है
जिसमें की हम सभी को
पात्र दिये गये हैं निभाने को?

क्या जीवन उस अंक का नाम है
जो शुरु होता है
एक शिशु के जन्म के साथ
और जो खत्म मान लिया जाता है
एक शब्द “मौत” के अस्तित्व मे आ जाने के बाद?

क्या जीवन पद्य है?
या कि यह गद्य है?

क्या यह अमीरी के साथ ही फलता फूलता है
या यह गरीबी के साथ भी पनप जाता है?

क्या जीवन पाँच सितारा होटलों में बसता है?
या यह करवटें बदलता है फुटपाथ पर भी?

लाखों लोग भूखे पेट सोने को विवश होते हैं
कीड़ों की तरह घिसट घिसट समय काटते हैं
और बिना किसी पहचान को पाये हुये विदा हो जाते हैं।

क्या ये जीवन है?

जीवन कहाँ है?


क्या यह बह रहा है पवित्र गंगा की लहरों के साथ
या यह अठखेलियाँ कर रहा है
विशाल समुद्र के ज्वार भाटे के साथ?
जो कि हर तरह की गंदगी को अपने में समो लेता है?

फूलों, पत्तों और घास पर पड़ी
ओस की बूँदें भी तो अहसास करा जाती हैं
जीवन के अस्तित्व का।

आखिरकार क्या है जीवन?

एक निबंध परिभाषित कर सकता है जीवन को?
या कि यह ढ़ेर सारे विकल्पों वाला प्रश्न है?
जहाँ पर कि अंतिम विकल्प
“ऊपर दिये गये सारे विकल्प ठीक हैं”
ठीक उत्तर के कुछ करीब जा पहुँचता है।

जो भी धरा पर
सम्पन्न होता है
ज्ञात – अज्ञात
देखा – अनदेखा
सुना – अनसुना
समझा – अनसमझा
सब कुछ जीवन का एक अंशमात्र है।

जीवन का अंश
एक को ज्ञात हो या बहुतों को या सबको
पर पूरी तरह से तो जीवन अज्ञात ही रहता है।

जीवन बहुत विशाल है
मनुष्य की समझ के हिसाब से।

हम जी सकते हैं
जीवन को महसूस कर सकते हैं
परंतु इसे समझ नहीं सकते पूर्णतया

जीवन सबसे बड़ा रहस्य है धरती पर।

…[राकेश]

पुनश्च : वोट देने का अधिकार पाने के पूर्व के जीवन के किसी मोड़ पर की हरकत अपने मूल रुप में।

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