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मार्च 13, 2011

लौट कर न आने वाले…

खुशबु किसी की आई  थी तारों के पार से
चांदनी लिपट के रोई बहुत मौसम-ए-बहार से

नज़दीक ज्यादा है वो महलों की मीनार से
आसमान पसीजता नहीं गरीब की पुकार से

उसका मामला तो है सितारों के भी पार से
दीवाना लिपट के हंस रहा है सूली-ओ-दार से

क्या सोच कर दीवाने ने किया गरेबाँ चाक
लहू के कतरे टपक रहे हैं दामन के तार से

वफ़ा करने का खूब इनाम दिया चमन को
सौगात में चंद खार मिले जाती हुई बहार से

तेरे साथ माटी मिला आया था दिल को मैं
जिंदगी फिर नहीं लौटी मौत की रहगुज़ार से

तने से लिपटी लता को हसरत से देखने वाले
लम्हा कोई लौटा क्या वक्त के खूनी गार से

पाक रिश्ते रूह के जिस्मों की भूख खा गयी
लोग खरीद लाये आलम प्यार भी बाज़ार से

(रफत आलम)

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