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अगस्त 19, 2011

भ्रष्टाचार और दोहरे चरित्र का द्वन्द

भ्रष्टाचार के विरुद्ध
बहती हुयी गंगा में
आज हर कोई
हाथ धोने के लिए तत्पर है
केवल यह दिखाने के लिए कि
वह कितना संजीदा है और
कितना बड़ा देशभक्त है
जो खुलकर भ्रष्टाचार के विरुद्ध
नारेबाजी, धरने, प्रदर्शन कर रहा है
हो सकता है कुछ लोग
इस उद्देश्य के प्रति
ईमानदार नियत और समर्पण रखते हों
और यह भी ठीक है कि
लोकतंत्र में जनहित के मुद्दों पर
लोग जागरूक हों
तभी तो लोकतंत्र बेहतरी की राह पर
आगे बढ़ सकता है
लेकिन यह भी तो
सबसे बड़ा सच है कि
भ्रष्टाचार यानि भ्रष्ट आचरण
जिसका सन्दर्भ यहां
गलत तरीको से
कमाए जाने वाले धन-दौलत से
लिया जा रहा है
वह बुरायी का एक पहलू है
जिसका मूल लालच है
और यदि बीमारी का इलाज
खोजना हो तो उसके मूल
यानि जड़ को पकड़ना जरूरी है
और अब प्रश्न यह कि
बुरायी क्या कभी खत्म हुयी है
या फिर बुरायी पर कभी
ऐसा अंकुश लगा है कि
उसका प्रभाव ही न हो
कभी नहीं
जब से मानवता का इतिहास
जाना जा सकता है
तबसे बुरायी और अच्छाई दोनों
इस तरह विद्यमान रही है
जैसे फूलों के साथ
कांटे भी विद्यमान रहतें हैं
इन्सान की प्रकृति में
तीन गुण-सत्व, रजस, और तमस रहतें हैं
जिनके अंशो के आधार पर ही
एक व्यक्ति में अच्छाई
दूसरे में बुरायी और
तीसरे में अच्छाई और बुरायी दोनों का मिश्रण
अधिक पाया जाता है
और इसके अनुसार ही उनका कार्य भी
इसलिए
भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ने के लिए
तत्पर हर व्यक्ति को
अपनी आत्मा के प्रति
होना होगा जवाबदेह
कि वह लालची कर्म प्रवृत नहीं
और यदि जवाब न दे सके तो
इस लड़ाई लड़ने से पहले
उसे करनी होगी
अपने कर्म की शुद्धता से
अन्तःकरण की शुद्धि
क्योंकि ज़ाहिर है कि
नकली मुखौटा जल्दी ही उतरकर
व्यक्ति का असली चेहरा
हो जाता है बेनकाब
और यह तय है कि
दोहरे चरित्र के द्वन्द से
लड़ रहा व्यक्ति
जब स्वयं से ही न जीत पाए तो
वह किसी भी क्रन्तिकारी युद्ध में
समर्पित और विजयी योद्धा कैसे हो सकता है !

(अश्विनी रमेश)

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