Posts tagged ‘Laila-Majnu’

सितम्बर 13, 2011

ज़हर भी है मुस्कान में

 

काबे में मिले ना हमको सनमखानों
कुछ होश वाले जो मिले मयखानों में

मेरे जुनूं को तलाश जिस होश की है
फरजानों में पाया न मिला दीवानों में

अक्ल के फ़रमान सहन होते किससे
शुक्रिया तेरा जो रखा हमें दीवानों में

हुस्न, इश्क, यारी, ईमान, अकीदे खुदा
क्या नहीं बिकता है आज दुकानों में

मौत को भी जाने ठौर मिले न मिले
जिंदगी तो कटी किराए के मकानों में

कसले दौर में सांस लेने की है सज़ा
कांटे उग आये लोगों  की ज़बानों में

कभी खापों के रुलाते फैसले भी देख
लैला मजनू तो पढ़े तूने दास्तानों में

नर्म मैदान ने गंदा कर के खा लिया
नदी पाक थी जब तक बही चट्टानों में

हँसी की महफ़िल में ज़रा होश आलम
ज़हर का भी पुट होता है मुस्कानों में

(रफत आलम)

फरजानों – बुद्धिमानों , फ़रमान – आदेश

मई 10, 2011

नीम की छांव

लोग जिसका नाम बेच रहे हैं खुली दुकानों में
कहते हैं उसका घर है दूर कहीं आसमानों में

मुझे कब से है तलाश कहीं उसका पता मिले
मंदिर की झाँकी में के मस्जिद की अजानों में

हकीकत की सख्त ज़मीन पर सब बिखर गए
हवा-महलों से निकला करते थे सपने उड़ानों में

कंक्रीट के दडबों से तंग आओ तो कभी लौटना
नीम की छांव आज भी है गावं के मकानों में

गौर से देखो तो सभी के चेहरे खून से रंगे हैं
इतिहास ने लिखे हैं जितने भी नाम महानों में

किसने कहा पत्थर के सीने में दिल नहीं होता
चोट खा के दरारें पड जाती हैं सख्त चट्टानों में

हर कहीं देख लो मासूम इश्क का वही अंजाम
यार खोये हो कहाँ लैला मजनूँ की दास्तानों में

गया वक्त रोता फिर रहा है सन्नाटों के साथ
वहाँ भी सकून नहीं है जाके देख लो वीरानों में

शर्मदार की मौत को चुल्लू भर पानी है काफी
छली गयी उमंगें ही डूबी आलम शराबखानों में

(रफत आलम)

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