Posts tagged ‘Lahoo’

मार्च 4, 2014

तुझसे मुलाक़ात के बाद…

रात, कल रात बहुत तपी…silentlove-001

तुझसे उस मुलाक़ात के बाद!

भीतर मेरी  साँसों से निकल कर कहीं…

तेरी सदा आती  रही

दिल के नज़दीक कहीं…

तेरे सीने की नर्म छुअन गुदगुदाती रही

इक लहर सी उठती रही पाँव से सर तलक जैसे

मेरे सीने से होकर तेरी हर सांस जाती रही

जाने क्या जादू है तेरी आवाज़ में

जो न कैसा मेरे बदन में तूफ़ान उठा देती है…

बेचैन कर देता है…

मेरे बिस्तर कि सलवटें कह देंगी

कि रात भर मुझे किस की  याद आती रही

हर बूँद लहू में घुल कर

किस तरह तू मुझे सहलाती रही

Rajnish sign

अक्टूबर 1, 2011

अपनी आग में जलते घर

लुटेरों के कमांडर इन चीफ हैं सरकार
पब्लिक प्रोपर्टी के बड़े थीफ हैं सरकार
ये सब पीठ पीछे का गुबार है मालिक
मुहँ आगे आप सबसे शरीफ़ हैं सरकार
………….

तीर सीने के निकाल कर रखना
अमानतों को संभाल कर रखना
वक्त आने पर करना है हिसाब
ज़ख्म दिल में पाल कर रखना
* * *

फेंकने वाले हाथ खुद अपने थे करते भी क्या
कभी सर का लहू देखा कभी पत्थर को देखा
माँ का दूध जब खट्टे रिश्तों में शामिल हुआ
अपनी आग में हमने जलते हुए घर को देखा
* * *

भूल गए हैं हवाओं का एहसान, देख रहे हैं
खुद को मान बैठे हैं आसमान, देख रहे हैं
गुब्बारे कल फुस्स होने हैं फिर कौन देखेगा
अभी तो सब लोग उनकी उड़ान देख रहे हैं
* * *

कहता है खरा सौदा है आओ मुस्कानें बाँटें
रोतों की बस्ती के लिए आराम मांग रहा है
आया कहाँ से है दीवाना कोई पूछो तो सही
आँसू के बदले खुशी का इनाम मांग रहा है

(रफत आलम)

अगस्त 20, 2011

जिहादी हूँ, दहशतगर्दी नहीं इंसानियत मेरा इस्लाम है

अजीब हैं दर्द का रिश्ता जो टूट कर भी नहीं टूटता कभी
ज़ख्म को सूखे बरस बीते फिर भी दिल को आराम नहीं

हम भी जिहादी हैं मगर इंसानियत की राह पर चलते हैं
ये जो तेरा इस्लाम है दहशतगर्द वो अपना इस्लाम नहीं

सच दिखाने की सजा किरच किरच पायी है दर्पणों ने
पत्थरों की इस बस्ती में शीशा दिल लोगों का काम नहीं

अपना ही लहू पीने वालों को क्या गरज मयखानो से
हमारी प्यास अलग है साकी जिसका मकसद जाम नहीं

ख़्वाबों में जीने की सजा नींद खोकर पाई है, क्या बताएं
जागती आँखें पूछती हैं पगले क्यों तुझको आराम नहीं

इस मयकदे में अपनी प्यास का मुदावा खुद करना होगा
यहाँ साकी को क्या परवाह किसे है किसको जाम नहीं

हराम खाने से बेहतर है पेट पर पत्थर बांधे गुज़र जाना
तलब वो ही है सच्ची जो हाथ फैलाने को बदनाम नहीं

आप बादलों के सायों से चाहे बहल लो वरना ऐ आलम
जिंदगी के रास्ते में कोई मंजिल नहीं कोई मुकाम नहीं

दहशतगर् – आतंकवादी, मुदावा – इलाज

(रफत आलम)

%d bloggers like this: