Posts tagged ‘Lab’

मार्च 15, 2014

छिल रहे हैं मेरे सपनो के नर्म अहसास

मत कहो तुम कुछ mirrorwoman-001

सुन तो हम तब भी लेंगे

रोक लो खुद को चाहे

कितना ही,

आँखे बोल देंगी तुम्हारी

होंठ मेरे सब खुद-ब-खुद  सुन लेंगे

आओ लो संभालो अपनी अमानत

बहुत दिनों से तुम्हारे लिए इसे

खाद पानी दे के बड़ा किया है

अब इसका क़द मुझसे ऊंचा हो रहा है

तुम्ही हो जो रख सकती हो इसे अपने साए में

बहुत बेचैन रहता है तुम्हारी नर्म बाहों को

संभालो कि इस से छिल रहे हैं

मेरे अपने ही सपनो के नर्म अहसास…

तुम्हारे प्रति मेरे प्यार की साँसे

उखड़ जाएँ

उससे पहले आ जाओ…

Rajnish sign

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जनवरी 15, 2014

आखिरी ख्वाहिश तुम

आलम-ए-दिल पे कोई फर्क कहाँ?mirrorwoman-001

दूर हो तुम

चाहे बहुत करीब मेरे

पास बुला के भी मजबूर कहने से

कि

दिल में बसते हैं कितने अरमान मेरे…

कहना तो है बहुत कुछ…

मगर कहें कैसे?

लफ्ज़ आते आते लब तक

कही जम जाते हैं

उठते तो हैं तूफान कितने

दिल से,

बस उठते हैं और कहीं थम जाते हैं…

दिल का तो क्या?

चाहे बस कि हरदम

बस इक तुम्हारी ही याद में गुम हो…

बहुत क्या कहना?…

बहुत क्या सुनना?

बस फकत जान लो इतना के…

मेरी आखिरी ख्वाहिश तुम हो…

Rajnish sign

जनवरी 3, 2014

तुम आई थीं…इतना तो याद है मुझे

तुम आयीं थी पास मेरे…lovers-001
कल रात
याद  तुम्हे भी होगा इतना तो…
लब चूमे थे लबों से अपने
पलकों पे मोती बीने थे
पास खींच के गले लगाया
याद तुम्हे भी होगा…
इतना तो
आँखों के डोरों ने रंगत अपनी
लाल करी थी…
कुछ बात कही थी
दिल ने अपनी गति बढ़ाकर
हाथों को उकसाकर मेरे हाथ धरे थे
याद तुम्हे भी होगा…
इतना तो
तुमको याद तो होगा सब कुछ
लबों का मिलना…
साँसे बढ़ना
सीने का गिरना…
उठना
चुप रह कर के सब कुछ कहना
अपने मिलने की सीमा तक
रुकना, मिलना, चलना, बहना,
तुम को  क्या क्या और याद है?
मैं तो सब कुछ भूल गया था
तेरे आने से तेरे जाने तक
दिया बुझे से सहर हुए तक
रौशन मेरी रात रही बस
तिल तिल मेरा बदन जले तक
मुझको बस याद है इतना
मुझको तो बस याद है इतना…
तुम आई थीं!
Rajnish sign
नवम्बर 24, 2013

प्रथम प्रेम-मिलन

तब क्या होगाsilentlove-001

जब मुखातिब होंगे

हम तुम,

होंठो पे जमी बर्फ को

कैसे पार करेंगे लफ्ज़ तब?

बहुत समय से लफ्ज़ जमे हैं लब पे

तपते हुए लबों से अपने पिघला सको तो

पी सकोगे इन्हें

पर देह के कम्पन अनुनाद में

पुल टूट नहीं जायेंगे क्या?

थरथराते लब

क्या इतनी ही आसानी से

कह सकेंगे तब –

मुझे तुमसे प्यार है…

होगी दरकार आवाज़ की मौन को

या कि

मौन खुद ही आवाज़ बनेगा?

अगर सुनोगी मेरे सीने पे अपना सर  रखकर

तुम अपना नाम

मेरी आती जाती साँसों में

ये तो झंझावत में न

बदल जायेंगी क्या?

तुम्हारी मादक  देह गंध

रहने देगी ज़मीन पैरों तले क्या?

गिरने से कैसे बचाएंगी बाहें तुम्हारी?

क्या होगी उतनी ही तेज़ तुम्हारी सांसें भी?

उठाना गिरना वक्ष का कैसे सिमट पायेगा आँखों में?

हाथ में रखा हाथ कापेंगें नहीं क्या?

शिकायत

इनकार

इज़हार

मनुहार

रूठना

मनाना

लाज शर्म

मिलन विरह

पास दूर

सारे ये शब्द खो नहीं  जायेंगे क्या

आवेशित हृदयों के स्पंदन में?

प्रथम प्रेम मिलन में होगा क्या?

इसी सब में

घिरा बैठा रहता हूँ

दिन रात आजकल…

Rajnish sign

नवम्बर 23, 2013

हर आहट पे लगता है कि तुम हो

आ आ के देखनाmera saya-001

हर एक मिनट में

मालूम हो जबकि

नहीं आना है कोई ख़त

समझना

नामवर के आने की

हर आहट को

मेरी बेचैनी का कुछ तो

अंदाजा हो रहा होगा तुझ को भी…

तेरे सुर्ख लबों से टपके

प्यार में डूबे

गीले से कुछ लफ्ज़

समेट रखे हैं मैंने उन फूलों में

जो मैं दे नही पाया तुझे अब तक

आ आ के लौट जाता हूँ फिर

जानता हूँ कि नहीं आने वाला

कोई ख़त अभी…

कभी बता पाया तो ज़रूर कहूँगा

बताने से पहले लेकिन

मेरा खुद जानना भी तो ज़रूरी है

कभी दिखा पाया तो जरूर पेश आऊंगा

मगर पहले मैं ये भी तो जान पाऊं कि…

कौन है तू….

क्या है तू….

क्यूँ तू इतने गहरी है मुझमे

क्या मेरे दिल में है…

अभी तो मैं खुद के हवास

में ही नहीं हूँ…

क्या तुझको बताऊंगा?

हर बार

हर इलज़ाम लेने से

तू इनकार कर देती है|

(रजनीश)

नवम्बर 13, 2013

चांदनी शर्मा के ओट में छिप गई

moonlovers-001रोज यही एक सपना देखता हूँ मैं

जागी अधखुली आँखों से…

श्वेत  चाँदनी  में लिपटी तुम चल रही हो

साथ साथ मेरे…..

मैं थाम लेता हूँ हाथ तुम्हारा हौले से…

महसूस कर सकता हूँ तुम्हारी सिहरन को

सहलाता हूँ तुम्हारी उँगलियों को,

छूता हूँ  पोरों को…

दूर कहीं दूर…निर्जन में

बैठ जाते हैं हम तीनो…

तुम, मैं और तुम्हारे बदन से लिपटी चाँदनी…

बैठे रहते हैं चुपचाप पास-पास

एक दूसरे के सर से सर जोड़े

कभी चेहरा लिए हाथों में

एक दूसरे की आँखों में खोये

सुनते हैं साँसों की मौन भाषा को…

बस खोये से रहते हैं एक दूसरे में

मैं सहलाता रहता हूँ तुम्हारी अनावृत बाहें

और  महसूस करता रहता हूँ तुम में

उठते स्पंदन को

तुम कुछ और  सिमट आती हो नज़दीक मेरे

हमारे बीच की चाँदनी असहज होने लगती है

रहती है पर निशब्द…

कानों की लौ गर्म होने लगी है

किसी तीसरे से बेखबर हम बस एक दूजे में गुम…

साँसों की लय पे उठते गिरते सीने को आँखों में समेटते

एक दूसरे की नज़रों को नज़रों से चूमते

होंठ कांपते हैं मेरे

तुम्हारे भी…

थरथरा रहे हैं दोनों के बदन…

जैसे दे रहे हों  मौन आमंत्रण…

साँसे असंयमित होने लगती है…

और बहुत उष्ण भी

पिघलने लगती है चाँदनी हम दोनों के बीच की

दूर उतर कर खड़ी  हो जाती है तुम्हारे बदन से

रख देता हूँ कांपते होंठ तुम्हारे जलते होंठो पे

चाँदनी शर्मा के किसी ओट में छुप जाती है

तीन से दो होने के लिए

या फिर दो से एक होने के लिए…

रात की चादर के तले…

बस यही एक ख्वाब मैं हर वक़्त देखता रहता हूँ

जागी अधखुली आँखों से

(रजनीश)

नवम्बर 11, 2013

बाहों के घेरे में बचूँगा क्या?

रख दो अपने आरक्त लबों कोtitan-001

मेरे चिर प्यासे लबों पे

सुलगते जिस्म को पिघला दो

समेट के अपनी बाँहों में

बरस जाओ मेरे तन मन पे

जैसे

कोई आवारा बादल बरस जाता है

युगों से तपते सहरा पे

बदल दो इसे एक छोटे हरे टुकड़े में

न रहने दो खुद को ‘खुद’,

न मुझे ‘मैं’ रहने दो

शायद तुझ में मिल के

मुझे ‘मैं ‘ मिल जाऊं…

सोचता हूँ कि मैं रहूँगा क्या

जब तेरी बाहें मेरे गिर्द होंगीं…

(रजनीश)

मई 9, 2011

देखा है नहीं और खुदा कहते हो

मेरी आँखों को कुछ सूझता ही नहीं
या अब इस शहर में उजाला ही नहीं

आखरी सांस तक एक लापता सफर
जिंदगी तेरा ठिकाना मिलता ही नहीं

पहली साँस से पहली है ये अस्तित्व
लाख तलाशिये हल निकलता ही नहीं

उमँगों का लहू पिया जाता कब तक
इन लबों पर अब कोई दुआ ही नहीं

पाल बैठे आदत तब हमने ये जाना
शराब रोग भी है सिर्फ दवा ही नहीं

खुदा से हार कर आँखों देखे सच ने
उसको मान लिया जिसे देखा ही नहीं

आलम तेरी बात पर किसे हो यकीन
तेरे पास झूठ गढने की कला ही नहीं

(रफत आलम)

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