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फ़रवरी 10, 2017

शून्य और अशून्य … कुँवर नारायण

संबंध में शून्यता को प्रेम भर देता है, संसार से कर्म संबंध जोड़ देता है, अथाह अकेलेपन में आस्था ईश्वर रूपी बंधन से जोड़कर भराव कर देती है पर आतंरिक शून्यता का क्या किया जाए? वह तो रहती ही है, पर उसका भी एक परम उपयोग है जो कुँवर नारायण अपनी इस छोटी लेकिन अनूठी कविता में सुझाते हैं|

एक शून्य है

मेरे और तुम्हारे बीच

जो प्रेम से भर जाता है|

एक शून्य है

मेरे और संसार के बीच

जो कर्म से भर जाता है|

एक शून्य है

मेरे और अज्ञात के बीच

जो ईश्वर से भर जाता है|

 

एक शून्य है

मेरे ह्रदय के बीच

जो मुझे मुझ तक पहुँचाता है|

(कुँवर नारायण)

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मार्च 29, 2013

नामपट्टी…

एक नामपट्टी के बारे में सोच रहा

कि कैसी हो,

फिर घर के बारे में सोचूंगा

कि कैसा हो,

फिर उनके बारे में

जो रह चुके रहे जा चुके घरों में |

अंत में

किसी नए कोण से

सोचना शुरू करूंगा

कि कैसी हो

मेरे घर की नयी नामपट्टी|

सफ़ेद संगमरमर पर काले अक्षर

धीरे-धीरे सफ़ेद हो जाते,

काले पर सफ़ेद लिखावट

धीरे धीरे काली…

(संगमरमर मुझे मकबरों की याद दिलाते)

लकड़ी की तख्ती साल भर भी नहीं चलती,

तांबा

पीतल

लोहा

देखते देखते बदरंग और भद्दे हो जाते|

कैसी मुश्किल है

कि एक साधारण-से नाम को

दुनिया की कोई धातु

पूरी तरह धारण नहीं कर पा रही,

जब कि वह जो

ऐसी न जाने कितनी

दुनियाओं को धारण किये हैं

केवल एक नाम है|

(कुंवर नारायण)

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