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सितम्बर 8, 2015

सब कुछ कह लेने के बाद… (सर्वेश्वरदयाल सक्सेना)

सब कुछ कह लेने के बाद
कुछ ऐसा है जो रह जाता है,
तुम उसको मत वाणी देना।

वह छाया है मेरे पावन विश्वासों की,
वह पूँजी है मेरे गूँगे अभ्यासों की,
वह सारी रचना का क्रम है,
वह जीवन का संचित श्रम है,
बस उतना ही मैं हूँ,
बस उतना ही मेरा आश्रय है,
तुम उसको मत वाणी देना।

वह पीड़ा है जो हमको, तुमको, सबको अपनाती है,
सच्चाई है-अनजानों का भी हाथ पकड़ चलना सिखलाती है,
वह यति है-हर गति को नया जन्म देती है,
आस्था है-रेती में भी नौका खेती है,
वह टूटे मन का सामर्थ्य है,
वह भटकी आत्मा का अर्थ है,
तुम उसको मत वाणी देना।

वह मुझसे या मेरे युग से भी ऊपर है,
वह भावी मानव की थाती है, भू पर है,
बर्बरता में भी देवत्व की कड़ी है वह,
इसीलिए ध्वंस और नाश से बड़ी है वह,

अन्तराल है वह-नया सूर्य उगा लेती है,
नये लोक, नयी सृष्टि, नये स्वप्न देती है,
वह मेरी कृति है
पर मैं उसकी अनुकृति हूँ,
तुम उसको मत वाणी देना।

(सर्वेश्वरदयाल सक्सेना)

फ़रवरी 11, 2013

उससे अधिक कुंआरे हो तुम

जितनी बाल्मिकी की कविता

जितनी उद्गम पर हो सरिता

जितनी किरन चांदनी

उससे अधिक कुंआरे हो तुम |

जितनी पावन यहाँ प्रकृति है

जितनी सुन्दर धवल कृति है

जितनी घड़ी सावनी कोई

उससे अधिक कुंआरे हो तुम |

जितनी सिहरन सीधी सीधी

जितनी मनहर कोई वादी

जितनी मधुर रागिनी कोई

उससे अधिक कुंआरे हो तुम |

जितनी क्षमाशील है धरती

जितनी शमा हवा से डरती

जितनी नरम रोशनी कोई

उससे अधिक कुंआरे हो तुम |

{कृष्ण बिहारी}

जून 30, 2011

पिता की चाह

मेरे बेटे,
किलकारियाँ मारता हुआ तुम्हारा बचपन
जवान हो
मुस्कुराए
हर नज़र तुम्हारी तरफ हसरत से उठे
बढ़ के आये,
और कहे –
तुम हो
जग के रचियता
की अद्वितीय कृति।

तुम्हे देखकर
तुम्हारे कंधे छूकर
मैं कहूँ –
शाबास… बेटे… शाबास।

तुम मेरी आँखों में देखो
और कहो –
मैं आपका बेटा हूँ,
अपने आपको उठाऊँगा मैं
बहुत ऊँचे, बहुत ऊँचे
अपने कर्म से
सच्चे धर्म से
मेरे प्रकाश में
आपके आशीर्वचन हैं।

तुम ऐसा कहोगे न!
मुझे कितनी खुशी होगी!

{कृष्ण बिहारी}

मई 27, 2010

कौन तो लिखता है, कौन तो रचता है

प्रतीत तो ऐसा ही होता है
कि यह लिखा मेरे द्वारा ही जा रहा है
पर क्या लिखने वाला वास्तव में “मैं” ही हूँ ?
मेरे देखे मेरे समझे तो,
कभी एक तीन से तेरह साल का बाल मन,
कभी चौदह से उन्नीस साल का किशोर मन,
कभी बीस से पचास साल का युवा मन,
कभी पचास से साठ साल का प्रौढ़ मन,
और कभी साठ से सौ साल का वृद्ध मन
यह सब लिखता है।
क्या यह वही “मैं” हूँ जो कि “मैं” वास्तव में हूँ?

आयु की बात को छोड़ भी दें तो
क्या यह जो मन जिसके द्वारा सब कुछ लिखा जा रहा है,
वह स्त्री है या पुरुष?
या कि वह निरपेक्ष है
इन दोनों ही जैविक अंतरों से,
इन दोनों ही भावों से,
या कि वह ऊपर उठ चुका है ऐसे किसी भी अंतर से?

यदि सब कुछ “मैं” के द्वारा ही लिखा जाता है
तो क्यों श्रद्धा भाव उमड़ता है प्रकृति के प्रति,
इस पूरी सृष्टि के प्रति
तब तब
जब जब कुछ भी बहुत अच्छा लिखा जा सकना संभव हो जाता है
और ऐसा लगता है कि मेरा तो
सारा अस्तित्व ही एक खोखली बासुंरी समान हो गया है
जिसमें कोई और ही फूँक भर कर
सुरीली तान छेड़ रहा है।

यदि सब “मैं” का भाव ही रचता है तो क्यों
एक अदभुत कृति की रचना के समय
शिल्प और शिल्पकार के बीच स्थित
द्वैत खो जाता है
और रह जाता है केवल
“एक” का भाव।
इस अद्वैत के भाव को या तो “मैं” कह लो या
“वह” कह लो
पर इस “मैं” में “वह” भी है
बल्कि “वह” ही महत्वपूर्ण है
और उस “वह” में “मैं” का भी समावेश है

पर एक बात विनीत भाव से सामने आती है
यह “मैं” वही नहीं है
जो कि यह बताता चलता है
कि अरे सब तुमने ही तो किया है।

बहुत कुछ ऐसा रचा जाता है
जो जन्म तो लेता है
पर उसे जन्माया नहीं जाता
उसे जन्माया नहीं जा सकता
वह तो बस ऐसे ही उतरता है
मानस की शुद्धतम अवस्था में
जैसे कि बाकी सब रचनायें उतर रही हैं
प्रकृति में
प्रकृति के द्वारा ही
यहाँ वहाँ
जल में, थल में, नभ में,
धूप में छाया में।

…[राकेश]

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