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जुलाई 25, 2017

पथ-हीन

कौन-सा पथ है?

मार्ग में आकुल – अधीरातुर बटोही यों पुकारा :

कौन-सा पथ है?

‘महाजन जिस ओर जाएँ’- शास्त्र हुंकारा

‘अंतरात्मा ले चले जिस ओर ‘ – बोला न्याय पण्डित

‘साथ आओ सर्व-साधारण जनों के’ – क्रान्ति वाणी|

पर महाजन-मार्ग-गम्नोचित न संबल है, न रथ है,

अंतरात्मा अनिश्चय – संशय-ग्रसित,

क्रान्ति-गति-अनुसरण-योग्य है न पद-सामर्थ्य|

कौन-सा पथ है?

मार्ग में आकुल-अधीरातुर बटोही यों पुकारा :

कौन सा पथ है?

 

(भारतभूषण अग्रवाल)

जनवरी 5, 2014

अरविन्द केजरीवाल : पुराना सड़ा तंत्र सलीब लिए खड़ा है तुम्हारे लिए

सैयादे बागबां के तेवर बता रहे हैंarvind-001

ये लोग फस्लेगुल के कपड़े उतार लेंगे|

तुम सरीखे नई बात बोलने और करने वालों पर भी उपरोक्त शेर मौजूं बैठता है|

ये घाघ बहेलिये, खेले खाए चिडीमार तुम्हे आजाद पंछी की तरह कैसे उड़ने दे सकते हैं? ये तुम्हे कहीं न कहीं कैसे भी पकड़ने और अपने हाथों सजा देने का प्रयास करते रहेंगे|

गलती तुम्हारी है तुम क्यों शिकारियों और सोते हुए शिकारों के मध्य लालटेन लेकर खड़े हो गये और हुंकार भरने लगे कि शिकारों को जगाऊँगा… शिकारियों को भगाऊँगा|

अब भुगतो!

आराम से जनतंत्र में लूट का मजा ले रहे बलियों,  महाबलियों और बाहुबलियों को ललकारोगे तो क्या वे चुप बैठे रहेंगे? नहीं वे अपने सामर्थ्य भर आक्रमण तुम पर करेंगे| और ये बात तो तय है ही कि टुच्चई पर ऐसी ताकतों का जन्मसिद्ध अधिकार होता है बल्कि टुच्चापन ऐसे ही लोगों के कारण धरा पर जीवित है|

एक तो बहुत बड़ी गलती तुमने दिल्ली विधानसभा चुनावों के दौरान कर दी जब तुमने जाति,सम्प्रदाय और क्षेत्रवाद की गंदगी से लबलबाती राजनीति में मुस्लिम बहुल इलाकों में हिंदू प्रत्याशी चुनाव में उतार दिए, एक क्षेत्र के बहुमत से घिरे इलाकों में दूसरे क्षेत्र के प्रत्याशी खड़े कर दिए और उनमें से बहुत से जीत भी गये और जो हारे भी वे भी अधिक से अधिक दो हजार मतों से हारे| इन् तत्वों वाली ध्रुवीकरण से बजबजाती राजनीति करके जनतंत्र पर कब्जा करे बैठे लोगों की नींद उड़ाने का गुनाह तुमने किया ही अब सजा भुगतो|

अभी तुम देखते जाओ अभी तो ट्रेलर भी पूरा नहीं हुआ है| पूरी फिल्म तो शुरू होनी बाकी है|

तुम पर हर ओर से आक्रमण किया जाएगा| तुम्हे हर संभव तरीके से बदनाम किया जाएगा|

शपथ लेते समय तुमने ऊनी स्वेटर और मफलर क्यों पहना था जबकि आम आदमी को ऊनी कपड़े मयस्सर नहीं होते|

तुम फलां फलां रंग के कपड़े क्यों पहनते हो?

तुम ऐसा क्यों खाते हो वैसा क्यों गाते हो| गाना न आने के बावजूद तुमने हिम्मत कैसे की कवि प्रदीप के लिखे गीत को हजारों लोगों की भीड़ के सामने की| तुम अभी तक अपने माता-पिता, पत्नी और बच्चों के साथ ४ कमरों के फ़्लैट में रहते रहे हो तो तुम्हारी हिम्मत कैसे हुयी आई.ऐ.एस अधिकारियों को मिलने वाले ५ कमरों के फ़्लैट में रहने जाने की मंजूरी देने की? इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि तुम्हारा सचिव वहीं किसी ऐसे ही मकान में रहता होगा|

सुनो, तुम्हे तो ट्री-हॉउस में रहना चाहिए था जहां आराम से गुलेल या हाथों से ये शिकारी लोग पत्थर मारते रहते|

कैसी कैसी गलतियां तुम करते हो? तुमसे बौखलाए ये लोग तुम पर आक्रमण करेंगे ही| इंडिया शाइनिंग जैसे मनलुभावन नारों के बावजूद पिछले दस सालों से विपक्ष में बैठी भाजपा को पूरा यकीन था कि इस बार नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बनेंगे और भाजपा को पूर्ण बहुमत अपने बल पर मिल जाएगा और तुमने बीच में घुसकर संदेह उत्पन्न कर दिया और उनके हवाई मिशन, जिसे प्रोपेगंडा के बल पर वे विस्तार देते जा रहे थे, की हवा निकलने लगी| तुम्हारी वजह से भाजपा ४ सीट पीछे रह गयी दिल्ली में बहुमत से और पन्द्रह साल से विपक्षी बने रहने की अपनी नियति को इस बार भी न बदल पाई| उसे तो तुम पर आक्रमण करने ही हैं|

जनता का एक बहुत बड़ा तबका निराशावादिता नामक बीमारी से इस कदर ग्रस्त हो चुका है कि उसे अपने से अच्छा कोई भी आदमी अच्छा ही नहीं लगता| निराशा ने इन लोगों को परपीड़ा में आनंद लेने वाला बना दिया है| ऐसे लोगों की भीड़ कभी नहीं चाहेगी कि भारत के हालात सुधरें और लोगों का जीवन स्तर सुधरे, देश में चारों ओर ईमानदारी का वास हो क्योंकि अगर सब कुछ अच्छा होने लगा तो वे निंदा किसकी करेंगे और अपने जीवन में कठिनाइयों से उत्पन्न पीड़ा का आनंद कैसे उठाएंगे? वे तो बस इन्तजार कर रहे हैं कि तुम थको, हारो, और तुम पर कालिख पोत दी जाए जिससे घायल होकर जब तुम धरती पर पड़े हो तो वे दूर से तुम पर पत्थर, गालियाँ, और व्यर्थ चीजें फेंककर अपने मनपसंद संवाद बोल सकें और तुम पर लानत भेज सकें और कह सकें – धिक्कार है तुम पर, बहुत महारथी बनने चले थे अब देखो क्या हाल हो गया है तुम्हारा|

तुम्हे हारा देख कर ये सेडिस्ट आनंद में ठहाका लगा कर हंस सकेंगे और अगले ही दिन से देश, व्यक्ति निंदा के अपने मनपसंद दैनिक कार्य में लग जायेंगे और राग अलापने लगेंगे – इस देश का कुछ नहीं हो सकता यह तो ऐसे ही चलेगा, यहाँ कभी कुछ नहीं सुधर सकता, यहाँ तो भ्रष्टाचार और गरीबी हमेशा रही है और रहेगी|

ऐसी ऐसी संस्थाएं और उनके सदस्य तुम पर आक्रमण करेंगे और तुम्हे हारा देख खुश होंगे जो अपने को औरों से ज्यादा बड़ा देशभक्त घोषित करते नहीं अघाते| उनके लिए देशभक्ति के काम वही हैं जो वे करते हैं| जो वे सोच सकते हैं बस वही देश के लिए श्रेयस्कर है| उनके अलावा बाकी सब लोग देशद्रोही हैं|

उनके लिए तुम भी देशद्रोहियों की जमात में ही आते हो|

ये सब प्रत्यक्ष रूप से दिखने वाले और भूमिगत रूप से ही भारत पर नियंत्रण करने वाले लोग तुम्हे हारा हुआ देखना चाहते हैं|

ये तुम्हे सूली चढ़ा कर ही शान्ति पाएंगे|

इनके आक्रमण रोज तीव्र से तीव्रतर होते जायेंगे|

पर एक बात समझ लो, देश भर में जनता का एक तबका ऐसा भी है जिसे तुम पर पूरा विश्वास है| वे चाहते हैं तुम जीतो और इस देश में सुधार लाने के लिए निमित्त बनो| वे अपने सामर्थ्य भर तुम्हारे और तुम्हारे प्रयासों के साथ हैं| वे प्रयास रत हैं क्रान्ति के इस बीज को सम्पूर्ण देश में व्यापक स्तर पर फैलाने के लिए|

कभी इस क्रान्ति की सफलता पर संदेह मत करना| तुम फ़िक्र मत करना योद्धा…

हर वक्त है इम्तहां का

ये दस्तूर है जहां का

जुलाई 26, 2011

प्यार की बात

मत करो मुझसे इस समय
प्यार की बात,
बहुत मजबूरियाँ हैं,
पिता नहीं हैं
माँ बूढ़ी है
सबसे छोटी बहन फलाँगते हुये
चढ़ गयी है सीढ़ियाँ उम्र की
और छोटा भाई
डिग्रियों का बोझ लादे
बेकार है।

करनी है बहन की शादी
लगाना है भाई को
रास्ते पर
देखना है घर-परिवार,
ऐसे में
क्या करुँ मैं तुमसे
प्यार की बात
ज़िंदगी में बहुत कुछ है
प्यार से ऊपर,
जिन्हे जिम्मेदारियाँ कहते हैं!

मैं भी चाहता हूँ
कुंतला,
येलोकेशी,
जिसके अंग सुते हुये हों साँचें में
एक गौरांगी प्रिया
जो लम्बी हो,
स्लिम हो
गहरी नाभी और सपाट पेट वाली हो
जिसकी कमर मेरी बाहोँ के घेरे में आने से शरमाए
जो मुझे चाहे मेरी तरह।
हर भारतीय नौजवान की तरह
मुझे भी लुभाती है हर यौवना।

मगर यह संभव नहीं है
हकीकतें ज़िंदगी से बड़ी हैं।
देश में
जिस वक्त्त हर मोर्चे पर
हो रहा हो अनवरत भ्रष्टाचार
और जहाँ घर में
बैठी हो जवान बहन
भाई बेकार
वहाँ मैं कर सकता हूँ
केवल
क्रांति
पर नहीं कर सकता प्यार
फिलहाल इस समय एक युवती से।

{कृष्ण बिहारी}

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