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सितम्बर 4, 2016

किताब का चर्चा … (रमेश गोस्वामी)

मेरी किताब का चरचा
कहीं कहीं पे हुआ
जहाँ उम्मीद थी मुझ को
वहीं वहीं पे हुआ
मेरी उडान भी मंसूब
ना थी चाँद तारों से
तभी तो एहतिराम
सोच की जमी पे हुआ

ना था अलफाज मे
तारीफ का उलझा हुआ चेहरा
मेरे सुखन का अक्स
डूबती नमी पे हुआ
अगर पलट दिया पन्ना
किन्हीं हाथों ने बिन बाँचे
मुझे तो रंज उस पे
तैरती कमी पे हुआ

उदास शाम थी
और जिक्र था उदासी का
मसि का रंग उजागर
मेरी जबीं पे हुआ
मेरी किताब के किरदार
सब मेरे गम हैं
उन से मिलना हुआ जब भी
किसी गमी पे हुआ
(रमेश गोस्वामी)

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नवम्बर 11, 2013

कहाँ हैं इस किताब के खरीदार

किताबों से भरी दुकान थी –books-001

मेरी जेब खाली थीं

खाली जेब की उपयोगिता पढ़ी थी

कुछ किताबों में ही!

किताबें कई थीं –

सुन्दर, अच्छी, गंदी, फूहड़…

उस गंदे से आदमी ने खरीदी

एक गंदी सी किताब|

युवती ने पर्स खोलकर

 सुंदर किताबों के मूल्य चुकाए|

गंदे बहुत से,

किताबें भी …

उनके पास नोट थे,

कागज़ के मैले-कुचले, मुड़े-तुड़े

पर दुकानदार को तो नोट से मतलब था

ग्राहक को चित्रों से|

दूकान के बाहर मैंने चर्चा की “देश” की|

अच्छी किताब है, अच्छी किताब है, पर ‘मोटी’ है –

लोगों ने ‘हाँ’ भी की थी,

सब सहमत थे मुझसे –

फिर सब अपनी अपनी पसंद की किताबों

की तरफ बढ़ गये

कन्याओं के एक झुण्ड ने

सुंदर चित्रों वाली फैशन की किताबें खरीदीं

मैं…खड़ा रहा… गुमसुम…

मैं किताब न खरीद सका…

मेरी जेबें खाली थीं…

भरी जेबों ने वह किताब नहीं खरीदी!

शायद,

उन्हें मनोरंजन की तलाश थी!

Yugalsign1

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