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सितम्बर 6, 2011

कैसे हुई बदनाम कहानी?

शायद कहता नहीं तो रह जाती गुमनाम कहानी
किन्तु मुझे भी ज्ञात नहीं है कैसे हुई बदनाम कहानी,

कुहरे की मैं शाम हो गया
घर-बाहर नीलाम हो गया
तेरे साथ घड़ी भर रहकर
जीवन भर बदनाम हो गया

तेरी-मेरी खास बात थी मगर बन गई आम कहानी
किन्तु मुझे भी ज्ञात नहीं है कैसे हुई बदनाम कहानी,

चर्चित भी मैं खूब हुआ हूँ
गली रही हो या चौराहा
मधुर-मिलन के पहले लेकिन
आना था आया दोराहा

अलग वहाँ से होनी ही थी अपनी वो सरनाम कहानी
किन्तु मुझे भी ज्ञात नहीं है कैसे हुई बदनाम कहानी,

तुम क्या छूटे मंजिल छूटी
दिल टूटा पर प्रीत न टूटी
जैसे किसी सुहागन की हो
यौवन में ही किस्मत फूटी

सब कुछ तो लुट गया मगर शेष रही नाकाम कहानी
किन्तु मुझे भी ज्ञात नहीं है कैसे हुई बदनाम कहानी,

यूँ तो सारा खेल जगत में
विधि का ही बस रचा हुआ है
लेकिन मेरे भोले मन पर
एक प्रश्न यह खिंचा हुआ है

आखिर उजले मन की ही क्यों बन जाती है श्याम कहानी
किन्तु मुझे भी ज्ञात नहीं है कैसे हुई बदनाम कहानी।

{कृष्ण बिहारी}

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जुलाई 7, 2011

कहीं मकान बनाएँ क्या?

तकदीर की तह में उतर जाएँ क्या,
घर जलाके रौशनी को मनायें क्या?

होंटों पर ताले लगे हैं सुनायें क्या,
छुरी तले हैं ज़बाने तो गायें क्या?

बेकसी बता हद से गुजर जाएँ क्या,
जिंदगी के मारे हैं ज़हर खाएं क्या?

वहाँ भी कहीं मौत खड़ी मिलनी है,
जिंदगी तेरे रास्ते पर आयें क्या?

किस्मत कौन सी अपने हाथ में है,
किस्मत के मिले पर पछताएं क्या?

आज तो ज़रा भी दिल में नहीं दर्द,
किसी दोस्त को गले से लगाएं क्या?

कोई तो सूरत हो दिल बहलाने की
जिंदगी बता ताज़ा फरेब खाएं क्या?

हमने सरों पर छतें गिरती देखी हैं,
सोचते हैं कहीं मकान बनाएँ क्या?

(रफत आलम)

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