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अप्रैल 2, 2014

कहो बनारस कैसे हो अब?

कहो बनारस कैसे हो अब?

कैसी हैं लंका की गलियां
दशाश्वमेध का हाल है क्या?
हत्यारे के अभिषेक को गंगाजल तैयार है क्या?
बिस्मिल्ला की शहनाई क्या अब भी बजती है वैसे ही
क्या अब भी हर हर की ध्वनि सुन सब भोले को ही भजते हैं?
क्या अब भी छन्नू मिसिर के शिव नचते हैं मस्त मसानों में?

यह नमो नमो का नारा सुनकर डर तो नहीं लगा तुमको?
ठीकठाक तो है न सब?
कहो बनारस कैसे हो अब?

नींद रात को आती तो है?
कहीं स्वप्न में दंगों वाली आग का धुआँ भरा तो नहीं?
कहीं उम्मीदों वाला सपना इन नारों से मरा तो नहीं?
कहो आज तो कह लो जाने कल ये मौक़ा मिले ना मिले
कहीं सूर्य की पहली किरण में कोई अन्धेरा भरा तो नहीं?

कह दो प्यारे
फिर जाने तुमसे अब मिलना हो कब
कहो बनारस कैसे हो अब?

देखो कैसे डर का बादल घिरता आता है
देखो कैसे गर्जन तर्जन से एक सन्नाटा छाया है
देखो कैसे घर घर में उठती जाती हैं दीवारें
देखो कैसे रंग बदलती गिरगिट सर पे नाच रही है
देखो कैसे एक अन्धेरा धूप निगलता निकल पड़ा है
देखो अजाने डरी हुई हैं और मुअज्जिन डरा हुआ है
कालिख का रंग उनके भोर के सपनों तक में भरा हुआ है

कैसी रंगत रात ने बदली
दिन ने बदले कैसे ढब
कहो बनारस कैसे हो अब?

छोडो प्यारे ऐसा भी क्या चलो घाट पर चलते हैं
खोलो चुनौटी ताल बजाओ मिलकर सुरती मलते हैं
तुम भी यार ग़ज़ब हो ऐसे भी क्या सब मिट जाता है?
अपनी ताक़त इतनी भी क्या कम आगत की पदचाप सुनो
जो आया है धूमधाम से जाएगा चुपचाप सुनो
सुनो मेरी जां चौखम्भे और विश्वनाथ की आवाज़ सुनो

हाथ मिलाओ, साथ में आओ
मिलकर साथ चलेंगे सब
कहो बनारस कैसे हो अब?

(सुखपाल सिंह)

सितम्बर 26, 2011

शोषितों कल का उजाला तुम्हारा

ज़ुल्म की काली घटाओं के पीछे
बंधक है
न्याय-समता-समानता का सूरज।

अश्रु पीने को मजबूर हैं
प्यासे किसान,
मेहनतकश मजदूर हैं भूखे।

रौशनी जागीर बनी
खेतों की लाशों पर उग आये
महलों की।

भूख से मौत,
क़र्ज़दार किसानो की खुद्कुशी
विरासत है फैले दामनों की।

मुफलिसी के पावों में
ज़ुल्मत की ज़ंजीर हैं
अंधेरा गरीब की तकदीर है।

ऐसे क्रंदनमय माहौल में
घोर तम के पीछे से
यहाँ वहाँ कुछ रोशन किरणे,
झिलमिला उठी हैं
झोपडों के टूटे छप्परों पर।

इन्ही नन्हे प्रकाश पुंजों में
कोई सूरज बनकर जागेगा
पस्त-त्रस्त-शोषित लोगों
कल उजाला तुम्हारा होगा।

(रफत आलम)

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