Posts tagged ‘Khushboo’

नवम्बर 29, 2013

महकता चहकता फिरता हूँ

महकता बदनwoman-001

रेशम सी छुअन

नज़र भर शफक

शर्म की सिहरन

जिस के देखे को तरसते थे

आज संग चलती है…

रखता  है दहका  के मुझे

तुम्हारा  शीशे सा बदन…

आज कहे बिना रहा नहीं जाता

तुमने पूछा भी कि

मैं क्या सोचता हूँ

पूछा है तो सुनो

जिस किसी शाम

मेरे सपने उगते हैं तुम्हारे कंधो पे

उस शाम की महक में

तुम्हारी साँसे घुल जाती हैं

रात भर बूँद बूँद उतरती है

ये खुशबू मुझमे…

और फिर महकता चहकता रहता हूँ

मैं दिन भर…

Rajnish sign

नवम्बर 20, 2013

ज़िन्दगी ख्वाब क्यूँ न हुयी…

रात की खुमारी,MB-001
तेरे बदन की खुशबू,
नथुनों में समाती मादक गंध
तेरे होठों से चूती शराब…
तेरे सांचे में ढले बदन की छुअन
रेशम में आग लगी हो जैसे
तराशे हुए जिस्म पे तेरे

फिरते मेरे हाथ
वो लरजना
वो बहकना
वो दहकना
वो पिघलना
हाय वो मिलना

अगर वो ख्वाब था तो इतना कम क्यूँ था
अगर वो ख्वाब था तो ज़िन्दगी ख्वाब क्यूँ न हुयी…

(रजनीश)

सितम्बर 13, 2013

आओ हम तुम चन्दा देखें

Moon

लहरों के इन हिचकोलों पर

आज नाव में संग बैठकर

साथी हसीं रात में गाते

आओ हम तुम चन्दा देखें

आओ हम तुम चन्दा देखें …

नर्म हथेली को सहलाएं

भावों में शबनम पिघलाएं

जल में अपने पाँव हिलाते

आओ हम तुम चन्दा देखें

आओ हम तुम चन्दा देखें …

धडकन जब लहरों पर धडके

अधरों पर बिजली सी तड़के

कोई भारी कसम उठाते

आओ हम तुम चन्दा देखें

आओ हम तुम चन्दा देखें …

चन्दन के पेड़ों से लिपटकर

खुशबू के घेरे में सिमटकर

करते कभी महकती बातें

आओ हम तुम चन्दा देखें

आओ हम तुम चन्दा देखें …

देखो रात जा रही है घर से

कोई गज़ल गा रही स्वर से

दामन में ले सुर-सौगातें

आओ हम तुम चन्दा देखें

आओ हम तुम चन्दा देखें …

{कृष्ण बिहारी}

जून 14, 2013

तन्हाई में रो दोगे तुम

बेमौसम जब फूल खिले थे

इन्द्रधनुष के रंग मिले थे

तभी लगा था बहुत जल्द ही

इक दिन मुझको खो दोगे तुम

तन्हाई में रो दोगे तुम…

सुनो अकेले मत होना तुम

बोझ अकेले मत ढोना तुम

मित्र! न ऐसा कर पाए तो

बाग बबूल का बो दोगे तुम

तन्हाई में रो दोगे तुम…

तुमने जो उपहार दे दिया

लेने से इनकार कब किया

मैं सब कुछ स्वीकार करूँगा

मुझे खुशी से जो दोगे तुम

तन्हाई में रो दोगे तुम…

सूख नदी का जल जाएगा

औ’ सागर भी घट जाएगा

खुशबू से जो नाम लिख दिया

उसको कैसे धो दोगे तुम

तन्हाई में रो दोगे तुम…

{कृष्ण बिहारी}

मई 19, 2012

मूर्त होता प्रेम!

मुझे मालूम है,
मैं जानता हूँ,
और मानता भी हूँ
कि मेरे सिर के सब बाल पक कर सुर्ख हो चुके हैं|
परंतु फिर भी,
अपने सर पर तुम्हारी उँगलियों का स्पर्श,
मेरे माथे पर रखा तुम्हारा सर
और मेरे कानों को छूती
तुम्हारी चोटी की महकती खुशबू|
मुझे मालूम है
 जानता हूँ
और मानता भी हूँ
कि अब वह वक़्त बीत गया
मैं अब उन आखों से ओझल भी हो गया
मगर फिर भी
आज भी अपने भावशून्य चेहरे पर
उनकी चमक कौंधती साफ दिखती है ।
मुझे मालूम है,
मैं जनता हूँ
और मानता भी हूँ
कि इस मानवसागर में मेरे सामने खड़ी
यह एक जोड़ी आँखें तुम्हारी नहीं हैं,
लेकिन फिर आभास होने लगता है
 कि अब सब यादें मूर्त होने लगी हैं तेरी सूरत में।
( बकुल ध्रुव )
अक्टूबर 5, 2011

झुकी मूँछ

मुझमें पत्थर पड़े हैं क्या
लोग हीरे के बने हैं क्या

अँधे, बहरे और बस चुप
ये हादसों के बचे हैं क्या

फुटपाथ पर बड़ी है भीड़
कहीं झोपड़े जले हैं क्या

आपको भाती है जिंदगी
हवा महल में बसे हैं क्या

नमक क्यों लाए हो यार
घाव अब भी हरे हैं क्या

जिंदगी-मौत, धुंआ–खुशबु
ये किसी के सगे हैं क्या

माहौल काला सा क्यों है
बस्ती में पेड़ कटे हैं क्या

हाथों के पत्थर किसलिए
शहर में शीशे बचे हैं क्या

भला लगने की बात जुदा
लोग सच में भले हैं क्या

इन्साफ का पता पूछते हैं
आप शहर में नए हैं क्या

मूँछ झुकी कैसे है आलम
बेटी  के बाप बने हैं क्या

(रफत आलम)

अक्टूबर 4, 2011

बेज़ुबान अहसास

यूँ ही भटकते हुए पता नहीं
क्यों लौटा था बरसों बाद
पार्क के उस कोने की ओर
जहाँ खुशबू भरे माहौल में
रंगीन सपने बुने जाते थे कभी।

लकड़ी की बेंच अब वहाँ नहीं है
जिस पर बिखरा करता था
अल्हड़ उमंगों का ताना-बाना।

चहचहाते पंछी कब के उड़ गये
प्रेमगीत गाकर
नीम के मोटे तने पर,
नादान उम्मीदों ने गोदे थे नामों
के पहले अक्षर
सूखा ठूठ बना खडा है वह।

आज भी हवाओं के दामन पर
मंज़र दर मंज़र धुंधलाई हुई कहानियाँ
फव्वारों की इंद्रधनुषी फुहारों में
बिखर रही हैं कतरा कतरा।

खामोशी की भाषा पढ़ने वाली आँखे
अब कहाँ उस अहसास के साथ
जिसके पास केवल बेज़ुबानी बची है।

(रफत आलम)

अगस्त 2, 2011

तुम खारे क्यों हो समंदर बाबा?

अपने पैरों पे एतबार हो जायेगा मेरे रास्ते पर चल के देख
तुझे भी काँटों से प्यार हो जायेगा मेरे रास्ते पर चल के देख
मंजिल मिलने की आस को ठुकराने की हिम्मत कर तो सही
जीवन मार्ग खुशगवार हो जायगा मेरे रास्ते पर चल के देख
* * *

क़तरा भर की औकात है मेरी मगर फिर भी
मीठे नदी-तालों को भरती हूँ अपने असर से
इतने बड़े होकर भी आप खारे क्यों हो बाबा!
नन्ही बूँद ने यूँ ही पूछा था कभी समंदर से
* * *

कुछ जवाब हैं जो कभी किसी को नहीं मिलते
सुबह धरती पर पड़ी ओस में छिपे बड़े भेद हैं
सितारों को सुना जाते हैं हँसते हुए कई पागल
मेरी चादर से कहीं ज़्यादा आसमान में छेद हैं
* * *

एक एक पल मांगता है अपने होने की कीमत
ये कहना आसान है के जिंदगी को खेल समझ
दुनियादारों की इस बस्ती में सादा दिल हैं जो
तजुर्बे के पैमाने पर उन लोगों को फेल समझ
* * *

नाउम्मीदी ने उम्मीद की शमा जला रखी है
बीमार-ए-ग़म की तबियत आज अच्छी है
साँसों को आने लगी अपनी माटी की खुशबु
जिंदगी तेरी मंजिल पास आ गयी लगती है

(रफत आलम)

जुलाई 9, 2011

तुम्हारे बिना : सूना जीवन

हवस के अँधेरे में
मचलते हुए जिस्म
आग से भर जाते हैं
नस-नस जल उठती है
होश-ओ-हवास के परे
ना दिल ना दिमाग
कुछ भी तो
बाकी नहीं बचता।

फिर एक बार
अंगों का अभिशिप्त कंपन
चंद पल साँसों का तूफ़ान
पसीने की सड़न के साथ
तुम्हारे प्यार की खुशबु
लौटा लाता है,
सुला देता है नम आँखों को।

मेरी खो गयी दोस्त!

यूँ ही कट जाती है
किसी अजनबी बिस्तर पर
एक और ज़ख़्मी रात।

(रफत आलम)

फ़रवरी 4, 2011

दिल छेदने से पहले दोस्त गले मिलते हैं (रफत आलम)

खुश्बुओं के सिलसिले हवाओं से मिलते ज़रूर हैं
वो वीराने में लगे हों तो भी फूल खिलते ज़रूर हैं

रात का दिन के साथ निबाह नामुमकिन है मगर
कोई एक मुकाम है जहाँ पर दोनों मिलते ज़रूर हैं

चोटों के निशान तो मर कर ही जाते हैं ऎ दोस्त
वक्त के धागे से ज़ख्मों के मुँह सिलते ज़रूर हैं

मुस्कान के पीछे छिपी पीड़ा की बात यूँ समझिये
काँटों की नोंक पर दीख्त में फूल खिलते ज़रूर हैं

सम्बंध वही मारते हैं जिन पर विश्वास हो बहुत
दिल छेदने से पहले दोस्त गले मिलते ज़रूर हैं

चमन की सुहानी उड़ानों का जब आता है ख़याल
पिंजरे के तारों से परों के ज़ख्म सिलते ज़रूर हैं

महफिलों की रौनक हैं बनावटी गुलदस्ते आलम
खुशबू दे नहीं सकते तो भी ये खिलते ज़रूर हैं

(रफत आलम)

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