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नवम्बर 23, 2013

हर आहट पे लगता है कि तुम हो

आ आ के देखनाmera saya-001

हर एक मिनट में

मालूम हो जबकि

नहीं आना है कोई ख़त

समझना

नामवर के आने की

हर आहट को

मेरी बेचैनी का कुछ तो

अंदाजा हो रहा होगा तुझ को भी…

तेरे सुर्ख लबों से टपके

प्यार में डूबे

गीले से कुछ लफ्ज़

समेट रखे हैं मैंने उन फूलों में

जो मैं दे नही पाया तुझे अब तक

आ आ के लौट जाता हूँ फिर

जानता हूँ कि नहीं आने वाला

कोई ख़त अभी…

कभी बता पाया तो ज़रूर कहूँगा

बताने से पहले लेकिन

मेरा खुद जानना भी तो ज़रूरी है

कभी दिखा पाया तो जरूर पेश आऊंगा

मगर पहले मैं ये भी तो जान पाऊं कि…

कौन है तू….

क्या है तू….

क्यूँ तू इतने गहरी है मुझमे

क्या मेरे दिल में है…

अभी तो मैं खुद के हवास

में ही नहीं हूँ…

क्या तुझको बताऊंगा?

हर बार

हर इलज़ाम लेने से

तू इनकार कर देती है|

(रजनीश)

नवम्बर 6, 2013

अब क्यों आओगी तुम?

कुछ थोड़ी सी चीज़ें तुम्हारी

मेरे पास रह गयीं थी

चार पांच तस्वीरें

एक नीली वाली,

एक लाल-काली वाली

एक वो भी जो मुझे बहुत पसंद रही है

वापिस भेज रहा हूँ

विभिन्न भावों वाली

छवियाँ तुम्हारी

जो अलग-अलग जगह

मैंने उतारी थीं

उंन दिनों

जब आँख में तुम छायी रहती थीं|

दिल में तो तुम अब भी अंकित रह जाओगी|

कुछ ख़त भी थे

पीले पड गये थे

इस अरसे में

और उनकी लिखावट से

सब कुछ जा चुका था

हर्फों के माने भी तो वही नहीं रहे

जो तुमने लिखे थे

यहीं बहा दिया उनको|

अब तो जब अदावत का भी ताल्लुक नहीं

तुम्हारी चीजें तुमको वापस कर दूँ

यही अच्छा है

थोडा कुछ और भी है

पर उतारूंगा तो दीवारें नंगी हो जाएँगी

दिल भी सूना हो जाएगा

आना

और अगर चाहो तो वापस ले लेना

लेकिन अब क्यूँ आओगी तुम?

तुम आओगी क्या?

(रजनीश)

सितम्बर 10, 2010

खत-ओ-किताबत के मिटते निशां

पत्र लिखना मनुष्य की एक बेहतरीन पूंजी और कला हुआ करती थी। पत्र चाहे मित्रों को लिखे जायें या करीबी लोगों को, पत्र लेखन का कोई सानी नहीं है। पत्र चाहे मशहूर लेखक एक दूसरे को लिखें या साधारण मनुष्य अपने करीबी लोगों को लिखें, पत्र लिखना अपनी भावनाओं को प्रदर्शित करने का एक बेहतरीन जरिया हुआ करता था।

पत्र केवल व्यक्ति की भावनाओं का ही संप्रेषण नहीं करते बल्कि वे अपने युग के दस्तावेज भी होते हैं।

एस.टी.डी फोन आये और पत्र लेखन की कला पर पहला कुठाराघात हुआ। बहुतायत में लोग लिखने से ज्यादा फोन पर बतियाने में ज्यादा विश्वास रखने लगे। कुछ लोग तो पत्र लिखना ही भूल गये। कुछ लोग अभी तक पत्र लेखन का मोह नहीं छोड़ पाये और इस कला को जिंदा रखे रहे।

भाग्य से तभी इंटरनेट का चलन शुरु हो गया और ई-मेल की सुविधा के जन्म के साथ ही इंटरनेट का उपयोग करने वाले बहुत सारे लोग ई-मेल के रुप में पत्र लेखन की विधा को कायम रखे रहे।

इस बीच पोस्टमैन नामक जीव को कुरियर मैन नामक जीव ने स्थान्तरित कर दिया।

सेल फोन मनुष्य के जीवन में दस्तक दी और बाद में SMS और नेट-चैट जैसी सुविधाओं ने लोगों के लिखने का अंदाज़ ही बदल दिया और शब्द छोटे से छोटे रुप में सुहाने लगे लोगों को। हालत ऐसे हो गये कि गणितीय अंकों ने वर्णमाला के शब्दों में घुसपैठ कर दी और Great अब Gr8  हो गया। चलिये कोई खास बात नहीं है।

इस काल के बाद अस्तित्व में आयीं सोशल नेट्वर्किंग साइट्स जैसे ऑरकुट, फेसबुक और टविटर। और अब यह जानना रोचक होगा कि क्या अभी भी लोग व्यक्तिगत पत्र लिखते हैं अपने करीबी लोगों को?

सोशल नेट्वर्किंग साइट्स निस्संदेह लोगों को एक दूसरे के बारे में सूचनायें देती रहती हैं परन्तु ये निश्चित रुप से वह आनंद प्रदान नहीं कर पातीं जो कि व्यक्तिगत लम्बे पत्रों या ई-मेल के मिलने से प्राप्त होता था।

प्रकृति के इस नियम का निषेध नहीं किया जा सकता कि समय अपने साथ परिवर्तन लाता ही लाता है परन्तु इन सब परिवर्तनों के बीच एक कला के खोने के अहसास को प्रकट तो किया ही जा सकता है। उस खोयी हुयी कला को याद तो किया ही जा सकता है।

शायद समय आ गया है जब लोग घरों  में छोटे बच्चों को रात में सुलाते समय कहानियाँ सुनाते हुये अपनी बात कुछ ऐसे शुरु कर सकते हैं,
” यह उस समय की बात है जब लोग पत्र लिखा करते थे”।

पर वास्तव में तो बच्चों को रात में कहानियाँ सुनाने की कला भी लुप्त हो ही चुकी है।

…[राकेश]

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