Posts tagged ‘Khara’

जनवरी 29, 2013

दुश्मन आवारा मन

चन्दन के वृक्षों की

खुशबू में डूबा मन

शायद मन राधा है

या फिर है वृन्दावन|

मन में क्या झूम उठी

अंग अंग चूम उठी

तन में फिर यौवन की

आंधी सी घूम उठी|

पागल सा फिरता है

अब तो बंजारा मन

आखिर क्यों इतना है

दुश्मन आवारा मन|

दूर कहीं कली खिली

नयन-नयन धूप ढली

लहरों के पंखों पर

अधरों की प्यास चली|

चलो चलें और छुएं

सागर का खारा मन

अपनी ही चाहत से

हारा बेचारा मन

{कृष्ण बिहारी}

अक्टूबर 1, 2011

अपनी आग में जलते घर

लुटेरों के कमांडर इन चीफ हैं सरकार
पब्लिक प्रोपर्टी के बड़े थीफ हैं सरकार
ये सब पीठ पीछे का गुबार है मालिक
मुहँ आगे आप सबसे शरीफ़ हैं सरकार
………….

तीर सीने के निकाल कर रखना
अमानतों को संभाल कर रखना
वक्त आने पर करना है हिसाब
ज़ख्म दिल में पाल कर रखना
* * *

फेंकने वाले हाथ खुद अपने थे करते भी क्या
कभी सर का लहू देखा कभी पत्थर को देखा
माँ का दूध जब खट्टे रिश्तों में शामिल हुआ
अपनी आग में हमने जलते हुए घर को देखा
* * *

भूल गए हैं हवाओं का एहसान, देख रहे हैं
खुद को मान बैठे हैं आसमान, देख रहे हैं
गुब्बारे कल फुस्स होने हैं फिर कौन देखेगा
अभी तो सब लोग उनकी उड़ान देख रहे हैं
* * *

कहता है खरा सौदा है आओ मुस्कानें बाँटें
रोतों की बस्ती के लिए आराम मांग रहा है
आया कहाँ से है दीवाना कोई पूछो तो सही
आँसू के बदले खुशी का इनाम मांग रहा है

(रफत आलम)

अगस्त 2, 2011

तुम खारे क्यों हो समंदर बाबा?

अपने पैरों पे एतबार हो जायेगा मेरे रास्ते पर चल के देख
तुझे भी काँटों से प्यार हो जायेगा मेरे रास्ते पर चल के देख
मंजिल मिलने की आस को ठुकराने की हिम्मत कर तो सही
जीवन मार्ग खुशगवार हो जायगा मेरे रास्ते पर चल के देख
* * *

क़तरा भर की औकात है मेरी मगर फिर भी
मीठे नदी-तालों को भरती हूँ अपने असर से
इतने बड़े होकर भी आप खारे क्यों हो बाबा!
नन्ही बूँद ने यूँ ही पूछा था कभी समंदर से
* * *

कुछ जवाब हैं जो कभी किसी को नहीं मिलते
सुबह धरती पर पड़ी ओस में छिपे बड़े भेद हैं
सितारों को सुना जाते हैं हँसते हुए कई पागल
मेरी चादर से कहीं ज़्यादा आसमान में छेद हैं
* * *

एक एक पल मांगता है अपने होने की कीमत
ये कहना आसान है के जिंदगी को खेल समझ
दुनियादारों की इस बस्ती में सादा दिल हैं जो
तजुर्बे के पैमाने पर उन लोगों को फेल समझ
* * *

नाउम्मीदी ने उम्मीद की शमा जला रखी है
बीमार-ए-ग़म की तबियत आज अच्छी है
साँसों को आने लगी अपनी माटी की खुशबु
जिंदगी तेरी मंजिल पास आ गयी लगती है

(रफत आलम)

फ़रवरी 11, 2011

साज़ जिंदगी का

 

अंतहीन आसमान
हाथ कब आता है
अंधेरे की कोख से
किन्तु
उजाला उगाता है

बड़ा है समुद्र
बहुत खारा है
तूफ़ान उठता है
किश्तियाँ भी चलाता है

ज़रा सी बूँद है मोती
आंसू का कतरा भी
छोटा सा हीरा कीमती
विषैला भी

छोटे-बड़े का पैमाना
अक्ल का फेर
गलत-सही का ज़िक्र बेमानी
पुण्य क्या पाप क्या
बस फितरत-ए-इंसानी

वक्त एक किस्सा
दुनिया एक कहानी
दिन रात के चक्कर में
जिंदगी है
सांसों की धुन पर बजता
एक अबूझा साज़

(रफत आलम)

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