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जुलाई 8, 2011

यह भी एक दुनिया है


दिखती है स्टाफ रुम की खिड़की से
सूनी दुनिया
सूने मकान
सूना समुद्र
सूने जंगल
बड़ा खौफनाक मंजर है।

मैं इसे मुर्दों की बस्ती कहता हूँ।

खूबसूरत मकानों से
झांकता नहीं कभी भी
एक भी चेहरा,
जंगलों की ओर
आता-जाता नहीं
एक भी चहचहाता परिंदा।
कभी-कभी
दिखता है कोई जहाज
समुद्र में, आसमान में
पोर्ट और एयरपोर्ट पास ही हैं।

जंगल भी है तो समुद्र में।

जंगलों का सन्नाटा
समुद्र का सूनापन
सरघटी मकानों का
लंबा अहाता…
कैसी तो दुनिया है…
यह भी एक दुनिया है।

खजूर के पेड़ों पर
आ रहे हैं फल
हरे-हरे, छोटे-छोटे
पकेंगे महीनों में
निर्यात होने के लिये
तब कहीं देखेंगे
बाहर की दुनिया
दुनिया की चहल-पहल।

बादाम…
अभी आये नहीं पेड़ों पर
झड़ने के लिये
जमीन पर सूखने के लिये
सुना है-
किस्म ठीक नहीं है।
शायद किस्मत ही ठीक नहीं
रह जायेंगे यहीं
सूनापन सहने के लिये,
कैसी तो दुनिया है…
यह भी एक दुनिया है।

इसी दुनिया के एक हिस्से में
मैं हूँ, लोग हैं, पड़ोसी हैं
भीड़ भी बहुत है शहर में
मगर एक को दूसरा
दूसरे को तीसरा
जानता नहीं।

इस तरह अंजान
झूठ-भरी मुस्कान
कहते हैं खूबी है
विकसित देशों की।

कैसी तो दुनिया है…
यह भी एक दुनिया है।

{कृष्ण बिहारी}

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