Posts tagged ‘Kashi’

जुलाई 21, 2017

माँ – अनोखे रूप

काशी दशाश्वमेघ घाट पर अनेक छोटे-बड़े मंदिर हैं, उन्ही में से एक छोटा- सा मंदिर गंगा में अधडूबा सा है, नौका-विहार करते समय एक मल्लाह  ने मुझे उस भग्न अध डूबे मंदिर की कहानी सुनाई|

एक बुड्ढी विधवा थी, उसका एक बेटा था| बुढ़िया ने मेहनत मजदूरी करके बेटे को पढ़ाया-लिखाया| बेटा बुद्धिमान था, पढ़-लिखकर बड़ा अफसर बन गया|वह अपनी माँ के दिन भूला नहीं , गंगा-तट पर उसने मंदिर बनवाया|

मंदिर बन गया तो माँ से बोला – माँ तूने मेरे लिए इतना किया| मैंने तेरे लिए मंदिर बनवा दिया है, अब तू इधर-उधर मत जा| इसी मंदिर में भगवान की पूजा कर| तूने मेरे लिए इतना किया मैंने भी मंदिर बनवा कर तेरे ऋण से मुक्त हो गया|

कहते हैं कि जैसे ही बेटे ने कहा- मैं तेरे ऋण से मुक्त हो गया वैसे ही मंदिर टूटकर गंगा जी में डूब गया|

मल्लाह ने मुझे बताया – वह यही मंदिर है|

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मेरे स्वर्गीय मित्र डॉ. बिंदु माधव मिश्र की वृद्धा माता बीमार थीं| ९० से ज्यादा की उम्र थी| लोग उनके स्वास्थ्य को लेकर बहुत चिंतित थे| घर भर सेवा में लगा था|

मैं भी उन्हें देखने गया, चरण स्पर्श किया, बोलीं – सोचती हूँ इतने जाड़े में मरी तो बच्चों को बड़ी तकलीफ होगी, किरिया कर्म, सर मुंडाना, सर्दी लग जायेगी|

(विश्वनाथ त्रिपाठी)

साभार: कथादेश, जून २०१७

अगस्त 30, 2016

काशी मगहर… (नईम)

kashimagharकाशी सध नहीं रही
चलो कबीरा!
मगहर साधें

सौदा-सुलुफ कर लिया हो तो
उठकर अपनी
गठरी बांधे
इस बस्ती के बाशिंदे हम
लेकिन सबके सब अनिवासी,
फिर चाहे राजे-रानी हों-
या हो कोई दासी,
कै दिन की लकड़़ी की हांडी?
क्यों कर इसमें खिचड़ी रांधे?

राजे बेईमान
वजीरा बेपेंदी के लोटे,
छाये हुए चलन में सिक्के
बड़े ठाठ से खोटे
ठगी, पिंडारी के मारे सब
सौदागर हो गए हताहत
चलो कबीरा!
काशी साधे नहीं सध रही,
तब मगहर ही साधें
(नईम)

मई 11, 2014

“बनारस” : कवि ‘केदारनाथ सिंह’ ने जैसा देखा

इस शहर में बसन्तbanaras
अचानक आता है
और जब आता है तो मैंने देखा है
लहरतारा या मडुवाडीह की तरफ से
उठता है धूल का एक बवंडर
और इस महान पुराने शहर की जीभ
किरकिराने लगती है

जो है वह सुगबुगाता है
जो नहीं है वह फेंकने लगता है पचखियाँ
आदमी दशाश्वमेघ पर जाता है
और पाता है घाट का आखिरी पत्थर
कुछ और मुलायम हो गया है
सीढ़ियों पर बैठे बन्दरों की आँखों में
और एक अजीब-सी चमक से भर उठा है
भिखारियों के कटोरों का निचाट खालीपन
तुमने कभी देखा है
खाली कटोरों में बसन्त का उतरना!
यह शहर इसी तरह खुलता है
इसी तरह भरता
और खाली होता है यह शहर

इसी तरह रोज-रोज एक अनन्त शव
ले जाते हैं कन्धे
अँधेरी गली से
चमकती हुई गंगा की तरफ
इस शहर में धूल
धीरे-धीरे उड़ती है
धीरे-धीरे चलते हैं लोग
धीरे-धीरे बजते हैं घंटे
शाम धीरे-धीरे होती है

यह धीरे-धीरे होना
धीरे-धीरे होने की एक सामूहिक लय
दृढ़ता से बाँधे है समूचे शहर को
इस तरह कि कुछ भी गिरता नहीं है
कि हिलता नहीं है कुछ भी
कि जो चीज जहाँ थी
वहीं पर रखी है
कि गंगा वहीं है
कि वहीं पर बँधी है नाव
कि वहीं पर रखी है तुलसीदास की खड़ाऊँ
सैकड़ों बरस से

कभी सई-साँझ
बिना किसी सूचना के
घुस जाओ इस शहर में
कभी आरती के आलोक में
इसे अचानक देखो
अद्भुत है इसकी बनावट
यह आधा जल में है
आधा मंत्र में
आधा फूल में है
आधा शव में
आधा नींद में है
आधा शंख में
अगर ध्यान से देखो
तो यह आधा है
और आधा नहीं है

जो है वह खड़ा है
बिना किसी स्तम्भ के
जो नहीं है उसे थामे हैं
राख और रोशनी के ऊँचे-ऊँचे स्तम्भ
आग के स्तम्भ
और पानी के स्तम्भ
धुएं के
खुशबू के
आदमी के उठे हुए हाथों के स्तम्भ

किसी अलक्षित सूर्य को
देता हुआ अर्घ्य
शताब्दियों से इसी तरह
गंगा के जल में
अपनी एक टाँग पर खड़ा है यह शहर
अपनी दूसरी टाँग से
बिलकुल बेखबर!

साभार : ओम थानवी जी, संपादक ‘जनसत्ता

मई 10, 2014

अरविन्द केजरीवाल : Pics – 9 मई रोड शो @ वाराणसी

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मई 7, 2014

मोदी जीते तो काशी हार जायेगा : काशीनाथ सिंह

Kashinath Singh

गुजरात के किसान वाराणसी में वाराणसी, गुजरात के 50 किसानों का एक जत्था मोदी के विकास मॉडल पर हमला बोलने के लिए बनारस पहुंचा है। ये किसान आप प्रत्याशी अरविंद केजरीवाल की सभाओं में वहां के किसानों की बदहाली के बारे में बता रहे हैं। केजरीवाल को बनारस के ग्रामीण इलाकों में समर्थन मिलता दिख रहा है, क्योंकि ग्रामीण उन्हें अपने घर बुलाने लगे हैं। ग्रामीण इलाकों में रोड शो कर रहे केजरीवाल रास्ते में कहीं भी जीप रुकवाकर लोगों से मिलने उनके घरों-झोपडि़यों तक ऐसे पहुंच जा रहे हैं, जैसे पुरानी पहचान हो। अरविंद गांव वालों के बीच बैठकर दिन में लइया चना खाते हैं और रात में किसी ग्रामीण के घर में खाना खाकर आराम करते हैं। अपने बीच किसी नेता को पाकर गांव वाले प्रसन्न हैं। वे उन्हें अपने घर बुलाकर खाना खिला रहे हैं। [दिनेशराय द्विवेदी]

AK kashi manifesto

मई 6, 2014

अरविन्द केजरीवाल‬: जिला अधिकारी@वाराणसी के नाम पत्र

सेवा में,AK@Varanasi
जिला अधिकारी,
वाराणसी, उ0प्र0

महोदय,
आपका 2 मई 2014 का लिखा पत्र मिला। (पत्र संख्या 4542/एस.जी.-नगर-2014) इस पत्र के साथ आपने पुलिस उपाधीक्षक (प्रज्ञान), काशी, की 28 अप्रैल 2014 की रिर्पोर्ट संलग्न की है। उनकी इस रिर्पार्ट पर मुझे घोर आपत्ति है।

उन्होंने अपनी रिर्पार्ट में लिखा है कि मैं ‘‘हिन्दु बाहुल्य तथा भाजपा समर्थित स्थानों’’ पर श्री नरेन्द्र मोदी जी के खिलाफ बोल रहा हूं, जिससे पुलिस को परेशानी हो रही है। तो क्या आपके पुलिस उपाधीक्षक चाहते हैं कि मैं श्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ बोलना बंद कर दूं? काशी का तो अधिकतर इलाका हिन्दू बाहुल्य है। तो क्या पूरे काशी में श्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ बोलना बंद कर देना चाहिए?

जो लोग हिंसा कर रहे हैं, वो लोग हिन्दू नहीं बल्कि भाजपा के गुण्डे हैं। आपके उपाधीक्षक का यह मान लेना कि सभी हिन्दू नरेन्द्र मोदी जी समर्थक हैं- यह सरासर गलत है। आपके उपाधीक्षक का यह मान लेना कि सभी हिन्दू श्री नरेन्द्र मोदी जी के खिलाफ कोई भी बात सुनने पर हिंसा करने लगेंगे- यह बहुत ही खतरनाक है।

हिन्दू धर्म के लोग दुनिया के सबसे शांतिप्रिय लोग हैं। कोई भी हिन्दू हिंसा नहीं चाहता। बल्कि हिन्दू धर्म ‘वसुदैव कुटुम्बकम’ सिखाता है।
28 अप्रैल 2014 की आपके पुलिस उपाधीक्षक की रिपोर्ट साफ-साफ दर्शाती है कि आपके पुलिस उपाधीक्षक घोर नरेन्द्र मोदी समर्थक हैं, भाजपा समर्थक हैं और हिन्दू धर्म के बारे में बहुत ही गलत विचार रखते हैं।

इसी रिपोर्ट में आपके उपाधीक्षक ने लिखा है- ‘‘श्री अरविंद केजरीवाल द्वारा अपने प्रचार-प्रसार के दौरान ऐसे हथकन्डे अपनाए जा रहे हैं, जिससे मीडिया का ध्यान आकर्षण किया जा सके व मीडिया फोकस इन पर बना रहे।’’ आपके पुलिस उपाधीक्षक की टिप्पणी पर मुझे घोर आपत्ति है। क्या अब आपके पुलिस उपाधीक्षक मुझे सिखायेगें कि मुझे चुनाव प्रसार कैसे करना है?

मैं बिना सुरक्षा के जनता के बीच घुस जाता हूं, जनता से हाथ मिलाता हूं, जनता को गले लगाता हूं, जनता के प्रश्नों के जवाब देता हूं। जनता में से कोई भी मुझे घर बुलाता है और यदि मेरे पास समय हो तो मैं उसके घर भी चला जाता हूं। मेरे इसी व्यवहार को आपके पुलिस उपाधीक्षक ‘‘हथकंडा’’ कह रहे हैं। आपको शायद अपने पुलिस उपाधीक्षक को ‘जनतंत्र’ की परिभाषा बतानी होगी कि जनतंत्र हेलिकौपटर और एअर कंडिशन्ड कमरों से नहीं चलता। जनतंत्र गली-मोहल्लों, सड़कों और गांव-गांव में घूमने से चलता है।

AK on Banaras electionमेरा संवाद सीधे काशी की जनता से है। आपकी पुलिस यदि मेरे और काशी की जनता के बीच में आने की कोशिश करेगी तो मैं ऐसी सारी कोशिशों को नाकाम कर दूंगा। आपकी नज़र में यह ‘हथकंडा’ हो सकता है, मेरी नज़र में यही ‘जनतंत्र’ है।

मैंने कभी आपसे अपने लिए सुरक्षा नहीं मांगी। इस पत्र के ज़रिए मैं आपसे निवेदन करता हूं कि आपने अपनी मर्जी से मेरी सुरक्षा में जो पुलिस कर्मी लगाए हैं, उन्हें तुरन्त वापिस ले लिया जाए। इन सभी पुलिस कर्मियों को काशी की जनता की सुरक्षा के लिए लगाया जाए। मुझे सुरक्षा नहीं चाहिए। काशी की जनता मेरी सबसे बड़ी सुरक्षा है। काशी के लोग मुझे बहुत प्यार करने लगे हैं। काशी में मेरा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। बाबा विश्वनाथ जी का मुझ पर आशीर्वाद है, फिर किस बात का डर।

आप काशी की जनता की भाजपा के गुण्डों से सुरक्षा कीजिए, मेरी सुरक्षा की चिन्ता छोड़ दीजिए।

धन्यवाद्,
अरविंद केजरीवाल
राष्ट्रीय संयोजक, आम आदमी पार्टी

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मई 1, 2014

“आप” संकल्प-पत्र @ वाराणसी

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अप्रैल 30, 2014

ध्रुवीकरण के धुरंधर – रवीश कुमार (NDTV)

Muslim tirangaमुसलमान एक तरफ़ जाएगा तो उसके ख़िलाफ़ हिन्दू दूसरी तरफ़ जाएगा। इससे मिलता जुलता विश्लेषण आप टीवी पर ख़ूब सुनते होंगे। मतदान की आती तस्वीरों के साथ टीवी स्टुडियो में बैठे जानकार किस आधार पर यह बात कह रहे होते हैं समझना मुश्किल है। हमारी राजनीति में धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण एक तथ्य है मगर यह मिथक भी है। ध्रुवीकरण सतही और सामान्य व्याख्या का ऐसा औज़ार हो गया है जिसके सहारे जानकार एक मतदाता को साम्प्रदायिक रंग से पेंट कर देते हैं। इसी के साथ एक और मिथक की रचना करने लगते हैं। ‘टैक्टिकल वोटिंग’ का मिथक। क्या अन्य जाति धर्म समूह इस तरह से वोटिंग नहीं करते अगर करते हैं तो क्या वो इस कथित टैक्टिकल वोटिंग के जैसा ही है।

एक साइड मुसलमान तो दूसरी साइड हिन्दू। ऐसा लगता है कि स्टुडियो में बैठे जानकार एक ख़ास समुदाय की तरफ़ इशारा कर रहे हैं कि मुसलमान एकजुट हो रहे हैं । भाजपा के ख़िलाफ़ एकजुट हो रहे हैं लिहाज़ा स्वाभाविक रूप से हिन्दुओं को भी भाजपा के पक्ष में एकजुट हो जाना चाहिए। अख़बारों में भी ऐसी बातें ख़ूब लिखी जा रही हैं। कई बार लगता है कि एक रणनीति के तहत ऐसा किया जा रहा है। मतदान प्रक्रिया का एक अदना सा एक्सपर्ट भी जान सकता है कि कुछेक अपवादों को छोड़ सामान्य रूप से यह बात सही नहीं है। कई बार लगता है कि चुनाव के समय ऐसे विश्लेषणों के सहारे समाज में साम्प्रदायिकता को भड़काने का काम किया जाता है।

क्या हिन्दू हमेशा यह देखकर वोट देता है कि मुसलमान किस तरफ़ वोट दे रहा है या मुसलमान यह देखकर वोट देता है कि हिन्दू किस तरफ़ देता है । इसका वैज्ञानिक आधार क्या है। हर चुनाव में मुस्लिम मतदाता को ब्रांड करने का खेल खेला जाता है। जैसे उसकी अपनी कोई आकांक्षा नहीं है और वो सिर्फ मुसलमान बनकर वोट करता है। अगर ऐसा होता तो यह बात सही होती कि एक आम मुस्लिम मतदाता इमाम बुख़ारी जैसे धर्मगुरुओं के कहने पर ही वोट कर देता। किसी भी चुनाव का आँकड़ा देखेंगे तो यह ग़लत साबित होता है। आम मुस्लिम मतदाता बड़े आराम से मतदान के फ़ैसले में मुल्ला मौलवियों की दख़लंदाज़ी को पसंद नहीं करता। खुलकर बोलता भी है लेकिन मीडिया ऐसे धर्मगुरुओं के बहाने मुस्लिम मतदाताओं का सांप्रदायिकरण करता रहता है।

इसी संदर्भ में एक और बात कहना चाहता हूँ। बाबा रामदेव जैसे कई योग गुरु और धर्मगुरु भी तो किसी पार्टी के लिए वोट मांगते हैं। इमाम बुख़ारी का अपील करना साम्प्रदायिक और बाबा रामदेव या शंकराचार्य का अपील करना राष्ट्रभक्ति। कैसे? मैं दोनों की तुलना नहीं कर रहा लेकिन मूल बात यह है कि सभी प्रकार के मज़हबी नेता चुनाव के वक्त सक्रिय होते हैं। कोई आशीर्वाद के नाम पर इनके पास जाता है तो कोई अपने भाषणों में देवी देवताओं के प्रतीकों का इस्तमाल करके धर्म का इस्तमाल करता है। खुद को ईश्वर का दूत बताना क्या है।

आम मतदाता को इससे सचेत होने की ज़रूरत है। यह भी ध्यान में रखने की बात है कि हमारे तमाम धर्मों के गुरुओं का समाज से गहरा नाता होता है। झट से उनके किसी राजनीतिक आचरण को साम्प्रदायिक क़रार देने से पहले देखना चाहिए कि वे क्यों ऐसा कर रहे हैं। उनका आधार सांप्रदायिक है धार्मिक है या राजनीतिक। अगर विरोध करना है तो एक साथ डेरों, मठों, मस्जिदों की राजनीतिक दख़लंदाज़ी का विरोध कीजिये।

मैं फिर से लौटता हूँ अपनी मूल बात पर। तमाम अध्ययन बताते हैं कि मुस्लिम मतदाता अपनी पसंद के हिसाब से अलग अलग राज्यों में अलग अलग पार्टी और नेता को वोट करता है। मुसलमान एक नहीं कई दलों को वोट करने के साथ साथ बीजेपी को भी वोट करता है। मध्यप्रदेश राजस्थान और गुजरात में भी करता है। हो सकता है कि प्रतिशत के लिहाज़ से कम हो लेकिन आप यह भी तो देखिये कि बीजेपी ने इन राज्यों में लोकसभा के चुनावी मैदान में कितने मुस्लिम उम्मीदवार उतारे हैं। उत्तर प्रदेश में कितने उतारे हैं। पिछले लोक सभा चुनाव में बीजेपी को पचीस छब्बीस प्रतिशत मत मिले थे शेष और पचहत्तर फ़ीसदी मत अन्य दलों को। अगर हिन्दू वोट जैसा कुछ होता तो बीजेपी को पचहत्तर फ़ीसदी वोट मिलते। जो हिन्दू बीजेपी को वोट नहीं करते उनके न करने के आधार क्या हैं। हमारे ये जानकार हिन्दू मतदाताओं के विवेक के साथ भी अन्याय करते हैं। मतदाताओं का अति हिन्दूकरण कर साम्प्रदायिक रंग देते हैं।

चलिये इस बात को एक और तरीके से देखते हैं। हर समुदाय या जाति के लोग अपने उम्मीदवारों को वोट देते हैं। इसी आधार पर कांग्रेस बीजेपी सब अपने उम्मीदवार तय करते हैं। तब भी बीजेपी को हराने के लिए मुसलमान किसी मुसलमान उम्मीदवार को वोट नहीं करता है। वो उसी दल या उम्मीदवार को वोट करेगा जिसके पास पर्याप्त वोट हो। यह वोट कहाँ से आता है। कथित रूप से हिन्दू समाज से ही न। तो यह बात कैसे उचित ठहराई जा सकती है कि हिन्दू एक तरफ़ जाते हैं और मुस्लिम दूसरी तरफ़ । क़ायदे से तो एक दूसरे की पार्टी को हराने के लिए दोनों मिल-जुल कर एक दूसरे के ख़िलाफ़ गोलबंद होते हैं। इसके बाद भी सारे मुसलमान किसी एक व्यक्ति या दल को वोट नहीं करेंगे।

मुसलमानों को कथित रूप से बीजेपी के ख़िलाफ़ पेश किये जाने के बाद भी जानकार जानते हैं कि वे कहीं भी एकमुश्त वोटिंग नहीं करते। यह संभव भी नहीं है। ऐसा होने लगा तो समझिये कि मुस्लिम समाज के भीतर आपसी टकराव ही समाप्त हो जायें। आप भी जानते हैं कि मुसलमानों के बीच अगड़े पिछड़े और दलित मुसलमानों के हक़ को लेकर ज़बरदस्त टकराव है। पिछले दिनों कई राज्यों में जैसे उत्तर प्रदेश, केरल और असम, मुस्लिम दलों का उदय हुआ है क्या ये सभी बीजेपी के ख़िलाफ़ उभरे हैं? नहीं। इनसे चुनौती कांग्रेस सपा बसपा लेफ़्ट को भी मिलती है।

इसीलिए जानकारों को ध्रुवीकरण की बेहद सतही और ख़तरनाक व्याख्या से बचना चाहिए। बनारस में नरेंद्र मोदी जब अपने नामांकन के लिए जा रहे थे तो उस भीड़ में भी कैमरे मुसलमान ढूँढ रहे थे। उनका क्लोज़ अप दिखा रहे थे। मुझे इस बात से आपत्ति है। क्या कैमरे उस भीड़ में शामिल अन्य लोगों को भी उसी निगाह से देख रहे थे। अगर नहीं तो फिर एक या दो मुसलमान की तलाश क्यों हो रही थी। तब भी जब नरेंद्र मोदी के साथ मुख़्तार अब्बास नकवी नज़र आ रहे थे। बीजेपी भले हिन्दुत्व या संघ के कहने पर चले पर उसे मिलने वाला हर वोट इसके लिए नहीं मिलता। बीजेपी के कार्यकर्ता चाहें जितना हिन्दुत्व के रंग रूप में ढल कर आक्रामक हो जायें उनकी पार्टी को मिलने वाला हर वोट हिन्दू वोट नहीं है। ज़्यादातर दलित मतदाताओं को खुद को इस पहचान से जोड़ कर देखे जाने से आपत्ति हो सकती है जबकि हो सकता है कि वो वोट बीजेपी को दें।

हमें जनमत का साम्प्रदायिकरण नहीं करना चाहिए। सांप्रदायिकता और ध्रुवीकरण हमारी राजनीति की ख़तरनाक सच्चाई है लेकिन ऐसा हर जगह किसी एक फ़ार्मूले के तहत नहीं होता कि मुसलमान इधर गए तो हिन्दू उधर चले जायेंगे । कई बार लगता है कि जानकार मुस्लिम मतदाताओं का मज़हबी चरित्र चित्रण करते हुए ग़ैर मुस्लिम मतदाताओं को इशारा कर रहे होते हैं कि उन्हें वोट कहाँ देना चाहिए।

(रवीश कुमार)

अप्रैल 29, 2014

नरेंद मोदी की बनारस से हार का गणित

AKvs Modiबनारस का सियासी समीकरण नरेन्द्र मोदी को नाको चने चबवाने पर मजबूर कर सकता है| हम इस वक़्त बनारस में रहकर काशी की इस दिलचस्प लड़ाई का जायज़ा ले रहे है| इस दौरान हमें मोदी की कई ऐसी बातें मालूम पड़ी जो आपको चौंका सकती है| हम आपके सामने सिलसिलेवार तरीके से ऐसे पहलू रखने जा रहे हैं, जो चक्रव्यूह में फंसे मोदी की हक़ीक़त बेपर्दा कर देंगे|

मोदी ने काशी की लड़ाई में पार पाने के खातिर आनन-फानन में ‘अपना दल’ से समझौता कर लिया| अपना दल की पटेल-कुर्मी वोटरों पर पकड़ है और बनारस में इस तबके की आबादी ढाई लाख के करीब है| ऐसे में मोदी की जीत-हार में यह फैक्टर निर्णायक भूमिका अदा कर सकता है| दिलचस्प बात यह है कि यह समझौता ‘अपना दल’ की युवा अध्यक्ष अनुप्रिया पटेल ने आनन-फानन में बग़ैर अपने काडर की राय लिए कर लिया और बदले में मिर्ज़ापुर की लोकसभा सीट पर बीजेपी के सहयोग से टिकट हासिल कर लिया. जबकि इससे पहले ‘अपना दल’ की बातचीत कांग्रेस के साथ चल रही थी. ऐसे में काडर खुद को बुरी तरह ठगा महसूस कर रहा है. चर्चा गर्म है कि ‘अपना दल’ का यही काडर इस दग़ाबाज़ी का बदला चुनाव में मोदी की हार सुनिश्चित करके ले सकता है|

काशी में भूमिहार वोट तकरीबन सवा से डेढ़ लाख के बीच में है. यह पूरा वोट लामबंद होकर कांग्रेस प्रत्याशी अजय राय के हक़ में गिर रहा है|

काशी की लड़ाई में दलित वोट भी बहुत महत्वपूर्ण है. एक से सवा लाख के बीच का यह दलित वोट-बैंक बीजेपी की तमाम कोशिशों के बावजूद टस से मस होने को तैयार नहीं है|

काशी में चौरसिया समाज के डेढ़ लाख वोट हैं| यादव 70 से 80 हज़ार हैं| पाल, सैनी जैसे दूसरे वोट-बैंक भी दो से ढाई लाख के करीब हैं, जो खांटी तौर पर जाति राजनीति के साथ जा रहे हैं| बीजेपी मज़हब की चाशनी के नाम पर इन्हें अपने खेमे में खींचने की पूरज़ोर कोशिश कर रही है, मगर यह वोट बैंक अपनी जातिय प्रतिबद्धताओं को छोड़ने के लिए तैयार नहीं है|

मुस्लिम वोटबैंक बनारस में तीन से साढ़े तीन लाख के करीब है, जो ध्रुवीकरण की सूरत में बग़ैर बंटे एक तरफा तरीके से मोदी के खिलाफ जाएगें, जो मोदी के राजनीतिक भविष्य के लिए बेहद घातक हो सकता है.

मोदी की सबसे बड़ी चिंता ब्राह्मण वोट बैंक को लेकर है| काशी में ढ़ाई लाख के करीब ब्राह्मण हैं| यह तबका मुरली मनोहर जोशी की उपेक्षा और जातिय स्वाभिमान का उचित प्रतिनिधित्व न मिलने से भड़का हुआ है| इस बात की संभावनाएं है कि इस तबके के वोटों में चुनाव के मौके पर भारी बिखराव हो सकता है|

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अरविन्द केजरीवाल जिस तरीके से मोदी के गुजरात में छाए भ्रष्टाचार की कलई खोल रहे हैं, उसका असर पढ़े-लिखे तबके पर सीधे तौर पर पड़ रहा है. यह तबका अपनी विवेक के आधार पर सही मौके पर सही क़दम उठा सकता है|

मोदी का दो जगह से चुनाव लड़ना भी उनके खिलाफ काम कर रहा है| काशी के मतदाताओं के बीच यह मुद्दा उथल-पुथल पैदा कर चुका है. इस बात की चर्चाएं आम होती जा रही है कि मोदी चुनाव जीतने पर बनारस को चूसे हुए आम की गुठली की तरह फेंक देंगे|

मोदी के लिए राजनाथ फैक्टर भी टेढ़ी खीर बन चुका है| सुत्रों के मुताबिक राजनाथ सिंह अंदर ही अंदर मोदी को काटने में लगे हुए हैं| राजनाथ सिंह को अच्छी तरह से मालूम है कि अगर मोदी बनारस से हार गए तो उनके पीएम बनने की राह में हमेशा के लिए दीवार खड़ी हो जाएगी.

मोदी की काशी से दूरी भी उनके खिलाफ जा रही है. सुत्रों के मुताबिक मोदी के सलाहकारों ने उन्हें समझा दिया है कि उन्हें बनारस में जीत की खातिर पसीने बहाने की कोई ज़रूरत नहीं है. यहां जीत तय है. उन्हें नामांकन छोड़कर बनारस आने की भी ज़रूरत नहीं है. यही वजह है कि मोदी बनारस में दिखाई नहीं पड़ रहे हैं, जबकि पास-पड़ोस के ज़िलों में रैली करके निकल जा रहे हैं. मोदी का यह अति आत्म-विश्वास उन पर भारी पड़ सकता है.

नरेन्द्र मोदी के लिए काशी की लड़ाई किसी वाटर लू से कम नहीं है. अगर मोदी यहां हारे तो उनके राजनीतिक भविष्य को कोई नहीं बचा सकता है| काशी में मोदी के वाटर लू की शुरूआत हो चुकी है|
(Shams Tabrez)

अप्रैल 28, 2014

“आम आदमी पार्टी” को कितनी सीटें? : शरद शर्मा (NDTV)

AKbanaras1कितनी सीटें आ रही हैं ‘आप’ की ?

कितनी सीटें आ रही हैं ‘आप’ की?
पिछले कुछ महीनों से लोग अक्सर मुझसे ये सवाल करते हैं और ये बहुत स्वाभाविक भी है क्योंकि मै आम आदमी पार्टी कवर करता हूँ इसलिये लोग जानना चाहते हैं कि मेरा क्या आंकलन है इस पार्टी को लेकर|

लेकिन बात इतनी सीधी नहीं होती लोग पहले मुझसे पूछते हैं और फिर बिन मांगे अपनी राय भी दे देते हैं…और राय ज़्यादातर ये होती है कि कुछ ना होना केज़रीवाल और उसकी पार्टी का, अब कहानी खत्म है|

मैं मन ही मन सोचता हूँ कि ये लोग पूछने आये थे,
बताने आये थे,
या फिर बहस करने आये थे?

असल में ये लोग केजरीवाल और आम आदमी पार्टी पर अपनी नाराज़गी ज़ाहिर करने आते हैं जिसके अलग अलग काऱण हैं

लेकिन ज़रा सा अपने दिमाग पर ज़ोर डालें तो आप देखेंगे कि आजकल शादी में जाओ तो राजनीति डिस्कस हो रही है, बस में, ट्रेन में, दफ्तर में, गली मोहल्ले में राजनीती पर ही चर्चा चल रही है|
क्या पहले ऐसा होता था?
क्या लोग राजनीती जैसे ऊबाऊ विषय पर अपने दिल की बात बोला करते थे?

एक दौर आया था जब न्यूज़ चैनल्स को देखनेवाले लोगों की संख्या घट रही थी और लोग न्यूज़ चैनल देखने की कोई ख़ास ज़हमत नहीं उठाते थे|
लेकिन आज से तीन साल पहले दिल्ली के जंतर मंतर से जो आंदोलन शुरू हुआ उसने आम लोगों को वापस राजनीती के बारे में बात करने के लिए विवश किया, आम लोग बहुत समय के बाद घर से बाहर निकलकर अपनी ही चुनी हुई सरकार के खिलाफ खुलकर नारे लगाते और टीवी पर बोलते दिखे|

और वहीँ से सरकार के खिलाफ माहौल बनना शुरू हुआ जो आज इस मोड़ पर आ गया है कि लोगों में इस बात पर शर्त लग रही है कि कांग्रेस की सीटों का आंकड़ा तीन डिजिट में जायेगा या दो में ही रह जाएगा|

वहीँ से लोगों में एक बार फिर न्यूज़ चैनल देखने वाले लोगों की तादाद बढ़ी
वहीँ से बहुत से न्यूज़ चैनल…. न्यूज़ और डिबेट दिखाने को मजबूर हो गए वरना याद कीजिये उससे पहले कुछ चैनल्स क्या दिखाया करते थे?
उसके बाद से आजतक चुनाव में पहले से ज़्यादा मतदान हो रहा है और पोलिंग के नए रिकॉर्ड बन रहे हैं|

हाँ ये जनलोकपाल का आंदोलन था जिसने समाज को कुछ नया सोचने और उम्मीद पालने का जज़्बा दिया|

अण्णा हज़ारे इस आंदोलन का चेहरा रहे, जबकि अरविन्द केजरीवाल, प्रशांत भूषण और किरण बेदी इस आंदोलन का दिमाग|
जो उम्मीद इस आंदोलन से आम जनता को बंधी वो समय के साथ टूटती दिखी
अपनी विचारधारा और काम करने के तरीके को लेकर इस आंदोलन के कर्ता धर्ताओं में मतभेद की खबरें आम थी|
और फिर एक दिन सामजिक आंदोलन पोलिटिकल पार्टी की तरफ बढ़ गया और नतीजा हुआ कि ये टीम दो हिस्सों में बंट गई पोलिटिकल और नॉन पोलिटिकल
और लगा कि सब खत्म क्योंकि जब साथ रहकर कुछ न कर पाये तो अलग होकर क्या करेंगे?

लेकिन धीरे धीरे एक उम्मीद फिर दिखाई दी, ये उम्मीद थी अण्णा के अर्जुन कहे जाने वाले अरविन्द केजरीवाल, जिन्होंने आम आदमी पार्टी बनायी और धीरे धीरे दिल्ली के अंदर आम आदमी के मुद्दे इस क़दर उठाये कि बहुत समय के बाद…कम से कम दिल्ली के आम आदमी को गरीब आदमी को किसी पार्टी से या यूँ कहें कि किसी नेता से कुछ उम्मीद हो गयी और इसी उम्मीद की वजह से आम आदमी पार्टी दिल्ली में 70 में से 28 सीटें जीत गयी, कांग्रेस ने बिन मांगे समर्थन दे दिया और देखते ही देखते अरविन्द केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री बन गए|

आम लोगों से बातचीत के आधार पर मैं कह सकता हूँ कि केजरीवाल के शासनकाल में भ्रष्टाचार कम हुआ, बिजली और पानी के दाम भी ज़रूर घटे थे|

लेकिन केजरीवाल के इस्तीफा देने से उन उम्मीदों को धक्का लगा जो लोगों को अपने इस नए नेता से थी , असल में जिसने वोट दिया था और जिसने वोट नहीं भी दिया था सब के सब महंगाई और भ्रष्टाचार से तंग तो थे ही…. इसलिए सब को केजरीवाल से उम्मीद थी …..ये नेता कुछ करके दिखायेगा!

दिल्ली और देश के जिस हिस्से में मैं गया वहां इस पार्टी या इस नेता के लिए बस एक ही नेगेटिव पॉइन्ट दिखता है, एक ही सवाल है कि सरकार क्यों छोड़ी? क्या लोकसभा चुनाव लड़ने का लालच आ गया था मन में ? या लग रहा था कि जैसे मुख्यमंत्री बन गया वैसे ही प्रधामंत्री बन जाऊँगा?

खैर केजरीवाल ने इसके जवाब अपने हिसाब से दिए भी लेकिन जनता कितना उसको कितना समझ पायी है या समझेगी इस पर साफतौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता क्योंकि कुछ लोग नाराज़गी के चलते कह रहे हैं ‘आप‘ की गलियों में ना रखेंगे कदम आज के बाद और एक तबका ऐसा भी है जो कहता कि दिल दुखा है लेकिन टूटा तो नहीं है उम्मीद का दामन छूटा तो नहीं है

वैसे केजरीवाल के काम करने का तरीका हमेशा चर्चा और विवाद में रहा हो लेकिन उनकी ईमानदार आदमी की छवि पर कोई डेंट नहीं है ये सब मानते हैं और उनकी ईमानदारी पर शक़ होता तो लोग उनके इस्तीफे पर कहते कि अच्छा हुआ राहत मिली एक खाऊ मुख्यमंत्री और उसकी सरकार से, जबकि लोग अभी कह रहे हैं कि सरकार नहीं छोड़नी चाहिए थी। मैं सोचता हूँ कि ईमानदारी तो ठीक है लेकिन उसका जनता क्या करेगी अगर आप उसको अच्छा शासन ना दिखा पाएं

खैर अब बात फिर वहीँ आती है कि आप की कितनी सीटें आ रही हैं? तो जवाब ये है कि इस पार्टी का वोटर साइलेंट रहता है इसलिए पार्टी का जनाधार पता लगाना या फिर आंकलन कर पाना बहुत कठिन है। दिल्ली चुनाव से पहले कौन कह रहा था कि केजरीवाल शीला को हराएंगे और वो भी एकतरफा? या केजरीवाल की पार्टी 28 सीटें जीतेगी और केजरीवाल मुख्यमंत्री बन जाएंगे?

और बात आजकल ये भी हो गयी है कि वोटर आसानी से बताता नहीं है की वो किसको वोट देगा या फिर दे चुका है ? क्योंकि वो अपने इलाके के किसी दूसरी पार्टी के नेता, विधायक, सांसद जो शायद उसका दोस्त, जानने वाला, पडोसी वगैरह भी हो सकता है लेकिन वोट उसको नहीं किसी दूसरी पार्टी को देना चाहता है ऐसे में आपको बताकर वो उसका बुरा नहीं बनना चाहता|

यही नहीं आजकल तो हालत ये हो गए हैं की दिल्ली में एक परिवार के सारे वोट एक पार्टी को चले जाएँ ये पक्का नहीं है…… मेरे एक पत्रकार मित्र जो बीजेपी कवर करते हैं उन्होंने दिल्ली में वोटिंग वाले दिन मुझसे पहले तो दिल्ली की स्थिति पर चर्चा करी और फिर बताया कि हालात जैसे दिख रहे थे वैसे असल हैं नहीं , मैंने पूछा क्या हुआ ….. बोले यार हद हो गयी …. मैं बीजेपी को वोट देकर आया हूँ लेकिन मेरे घर के 4 झाड़ू (आप) को चले गए|

मेरे लिए ये कोई अचम्भा नहीं था क्योंकि मैं दिल्ली विधानसभा चुनाव 2013 में देख चुका था कि जो परिवार सालों से बीजेपी को वोट दे रहे थे उसमे इस बार माँ बाप तो कमल का बटन दबाकर आये थे लेकिन बच्चे झाड़ू चलकर आये थे जिसकी वजह से बीजेपी के हाथ से उसके गढ़ शालीमार बाग़, रोहिणी जैसी सीटें निकल गयी थी

इसलिए कोई सीटों का आंकड़ा दिए बिना मैं मानता हूँ कि ये पार्टी 8 दिसंबर की तरह 16 मई को चौंका दे तो मुझे हैरत नहीं होगी .

Sharad Sharma, Journalist NDTV

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