Posts tagged ‘Karishma’

मार्च 4, 2011

दोमुँहे…

मैं चूमता हूँ हवाएं
देखता हूँ सितारे
पूजता हूँ सागर
सहेजता हूँ नदियां
सहलाता हूँ लहरें
छूता हूँ मिट्टी
बनाता हूँ सोना
मुझे कोई कुछ नहीं कहता।

लेकिन-
जब देखता हूँ औरत
लिखता हूँ उसके बारे में
तो लोग भूल जाते हैं
अपनी आँखें
बन जाते हैं जबान
मुझे पोर्नोग्राफर और
मेरी रचनाओं को
कहते हैं अश्लील,
चाहते हैं हो जाऊँ
दोमुँहा उनकी तरह
और बकूँ बकवास।

मैं पूछता हूँ
हुजूर!
आप ईश्वर से क्यों नहीं पूछते
लगाते तोहमत
कि दो एक से इंसानों की तकदीर
उसने क्यों पलट दी है
धरती के एक हिस्से को चमन
तो दूसरे को
बनाया क्यों है रेगिस्तान
कहीं बर्फ की चादर
कहीं पर आग की बारिश
कहीं पर टॉरनेडो।
सुबह और शाम के फासले में
जो बदल देता है दुनिया
उसके खिलवाड़ को आप कहते हैं
करिश्मा।

और-
मैं जो सोचता हूँ
कहता हूँ
लिखता हूँ
उसे ईमानदारी से पढ़ने
या सुनने के बाद
चोरी से कहते हैं आप
बहुत घटिया है तुम्हारी सोच
केवल गलाज़त देखते हो
अपना कचरा दूसरों पर फेंकते हो।

हुजूर!
माफ करें मुझे
मुझमें बहती नहीं है गंगा
छटपटाती है वैतरणी
डूबना चाहेंगे?
तो हकीकत में डूबिये
मगर खुदा की कसम
झूठ मत बोलिये
एक बार तो ईमान से कहें
अपनी संतति के लिये
कि दोमुँहे नहीं हैं आप
शायद, बदल जाये यह दुनिया।

मेरे लिये मुश्किल है
बदलना
मैं कर सकता हूँ कोशिश
चलने की जमाने के साथ
मगर हो नहीं सकता हूबहू उस जैसा।

हाँ, उसे लिख सकता हूँ
ईमानदारी के साथ
आप जैसों के लिये
जो गालियाँ बकें मुझे
ताज़िंदगी ऊपर से
और मुझें पढ़ें भीतर से।

{कृष्ण बिहारी}

 

[चित्र : राजा रवि वर्मा]

%d bloggers like this: